आशीष व्यास

कोरोनाकाल में यह विवेचना-विश्लेषण मुश्किल है कि इन दिनों पलायन का वेग ज्यादा है या संक्रमण का। क्योंकि, महामारी के विस्तार और लंबे लॉकडाउन से, श्रमवीरों की स्थिति और अर्थव्यवस्था में उनके योगदान से जुड़े कई भ्रम टूट चुके हैं। रोजगार से सरोकार का दावा करने वाली राजनीति भी इसी दौर में ढेर सारे अनदेखे-अनछुए अध्याय पढ़ चुकी है। यह सबक भी सीखा जा रहा है कि श्रम-शक्ति की समस्याओं से संवाद के लिए राज्य सरकारों के पास फिलहाल कोई निर्णायक नीति नहीं है। पलायन का यह कारवां जो कहानियां सुनते-सुनाते हुए जा रहा है, उसे देख-सुनकर लगने लगा है कि वे शायद ही अब जल्दी काम पर लौटना चाहें! यदि इसे सच मान लिया जाए तो सामने आ रहा स्वाभाविक सवाल है - क्या उनके अपने प्रदेश में, उनके अपने भविष्य के लिए कोई योजना है? ऐसा कोई प्रस्ताव, जो फिलहाल प्रवासी कामगारों को राहत दे दे। इस जरूरत के साथ कि पलायन के बाद, अब रिवर्स-पलायन को नापने का कोई पैमाना भी खोजा जाना चाहिए। इसकी आवश्यकता भी स्पष्ट है - घर आए या आ रहे अधिकांश मजदूर अब वापस नहीं जाना चाहते हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि प्रदेश में लगभग 30 लाख मजदूर लौटेंगे। इसीलिए, पूछा जा रहा है कि पलायन रोकने की क्या कोई पुख्ता योजना है?

श्रमिक भी नहीं चाहते पलायन!

मप्र के मजदूर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश सहित 17 राज्यों में पलायन करते हैं। पलायन को लेकर ही प्रदेश के 10 जिलों में शोध संस्थानों ने सर्वे शुरू किया है। इसमें बुंदेलखंड-बघेलखंड के गांवों से लेकर चंबल, महाकोशल का एक बड़ा इलाका शामिल है। सर्वे से निकलकर सामने आई प्रारंभिक जानकारी थोड़ा हैरान करने वाली, या यूं भी कह सकते हैं कि उम्मीद बढ़ाने वाली है। 55 प्रतिशत श्रमवीरों का कहना है कि वे पलायन करना ही नहीं चाहते हैं। वे चाहते हैं कि प्रदेश में ही रहकर कुछ काम करें। करीब 27% का कहना है कि मौजूदा हालात में फिलहाल वे निर्णय लेने की स्थिति में ही नहीं हैं। 18% मजदूर अपने कार्यक्षेत्र में लौटना चाहते हैं। आदिवासी बाहुल्य झाबुआ-आलीराजपुर में यह सिलसिला शुरू भी हो गया है। हालांकि तुलनात्मक रूप से संख्या अभी बहुत कम है, लेकिन आसान परिवहन ने उन्हें दो राज्यों का नागरिक बना दिया है। इस आदिवासी क्षेत्र की एक बड़ी आबादी होली के पहले भगोरिया उत्सव मध्य प्रदेश में मनाती है और दीपावली गुजरात में। एक सवाल यह भी है कि इतनी बड़ी संख्या में यदि मजदूर प्रदेश में ही रहना चाहते हैं तो उनके लिए रोजगार और राशन की क्या व्यवस्था है? जहां तक मजदूरी के भुगतान का मसला है, इसी सर्वे में श्रमिकों ने बताया कि उन्हें 300-400 रुपये दैनिक मजदूरी मिलती है। इसकी तुलना में यदि 250 रुपये की दिहाड़ी भी मिल जाए, तो वे अपने घर रहकर जीवन यापन कर लेंगे।

प्रारंभिक प्रशिक्षण से ही दक्ष हो जाएंगे हमारे कामगार

जैसे हर प्रदेश के मजदूरों की एक विशेषता होती है, वैसे ही मध्य प्रदेश के कामगारों की भी कुछ खूबियां हैं। ये कंस्ट्रक्शन साइट, मार्बल या संगमरमर का काम और कपड़ा उद्योग के लिए बहुत उपयोगी हैं। यदि 30 लाख मजदूर, जो दूसरे राज्यों के आर्थिक विकास में भागीदारी निभाते हैं, वे अपने गांव-प्रदेश में रहकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में योगदान नहीं कर सकते हैं? ग्रामीण जनजीवन में बदलाव और विकास के साथ अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव को करीब से देखने वाले विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मजदूरों के कौशल के हिसाब से मध्य प्रदेश को कुछ विशेष क्षेत्र विकसित करना चाहिए। हैंडलूम उद्योग, कपड़ा उद्योग, ग्रामीण पर्यटन और कृषि-फूड प्रोसेसिंग के साथ लुप्त होता हर्बल उद्योग। प्रारंभिक प्रशिक्षण के बाद प्रदेश के कामगार ही पूरी दक्षता के साथ जिम्मेदारी निभा सकते हैं।

सालों के अनुभव को प्रयोग में बदलने का समय

38 साल के कार्यकाल में से 28 साल ग्रामीण विकास और आजीविका के क्षेत्र में काम कर चुके आइएएस रवींद्र पस्तोर ने लंबा समय रीवा, जबलपुर, उज्जैन संभाग में बिताया है। वे कहते हैं - 'कोरोना के दौरान पलायन का जो दृश्य उभरकर आया है, वह सामान्य पलायन नहीं है। इसे ऐसे समझिए कि मध्य प्रदेश की लगभग एक करोड़ की आबादी, दूसरे राज्यों में रहती है। अवसर के साथ पलायन (अपॉर्चुनिटी माइग्रेशन) अच्छा होता है और रोजगार के साधन न होने पर किया गया पलायन (डिस्ट्रेस माइग्रेशन) संबंधित प्रदेश की जनता के लिए खराब है। शत-प्रतिशत पलायन रोकना असंभव है। यह व्यक्ति और समाज के विकास में भी बाधक है। वैसे भी मध्य प्रदेश में परिवारों के पास जमीन की औसत उपलब्धता 1.17 हेक्टेयर है। बंटवारे के बाद एक परिवार के लिए यह पर्याप्त नहीं है, इसलिए सिर्फ खेती के भरोसे पलायन करने वाली आबादी को प्रदेश में रोककर नहीं रखा जा सकता है। इसके लिए वैकल्पिक योजनाएं चाहिए। जो मजदूर वापस आए हैं, वे अपने साथ तीन विशेषताएं लेकर लौटे हैं। पहला - कौशल, दूसरा - व्यापार की बुनियादी समझ और तीसरा - महत्वाकांक्षा।' इस आधार पर कहा जा सकता है कि पलायन रोकने और अपने श्रम का उपयोग, अपने प्रदेश में करने के लिए इन्हीं तीन बिंदुओं को ध्यान में रखकर रोजगार उपलब्ध करवाना होगा। जैसे -

  • मध्य प्रदेश में कृषि श्रमिकों की जरूरत हमेशा बनी रहती है। कटाई, निंदाई, गुढ़ाई जैसे कामों के लिए हैंड-टूल विकसित कर, उन्हें इस काम के लिए रोका जा सकता है।
  • प्रदेश के मालवा-निमाड़ इलाके के 42 हजार हेक्टेयर में आलू, 32 हजार हेक्टेयर में प्याज, 22 हजार हेक्टेयर में मिर्च का रकबा है। सब्जियां और टमाटर सहित सोया और मूंग भी बड़े इलाके में बोया जाता है। यहां फसल के साथ फल-सब्जियों से जुड़ी हुई छोटी-छोटी फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई जाएं। इलाके की खेती, प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों की तुलना में 70 प्रतिशत उन्न्त है, इसलिए मजदूरों को स्थानीय आवश्यकता के अनुसार कुशल बनाया जाए।
  • कोरोना संक्रमण के दौरान एक राज्य से दूसरे राज्य तक सड़कों पर चलते हुए जो श्रमिक दिखे, उनके लिए कोई जिम्मेदार सामने नहीं आया। इसकी बड़ी वजह थी मुकद्दम प्रथा (ठेकेदार के जरिए एक मुश्त, श्रमिकों का सौदा तय करना)। मजदूरों का पंजीयन करवाना चाहिए, ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल सके। प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की जा रही पहल प्रशंसनीय है। शर्त यह जरूर रहे कि इसका क्रियान्वयन सतही न रहे।

रोजी-रोटी की निश्चिंतता, राशन कहीं से भी ले सकें

समग्र एप की संरचना तैयार करने वाली आइएएस डॉ. अरुणा शर्मा लंबे समय तक मप्र में पदस्थ रहीं। ग्रामीण विकास के क्षेत्र में लंबे समय तक सक्रिय रहीं डॉ. शर्मा का मानना है - 'यदि पलायन रोकना है तो सरकार को हर घर को चिन्हित कर रोजी-रोटी की व्यवस्था करना पड़ेगी। जैसे पुदीने की खेती के साथ-साथ खांसी और खराश दूर करने वाले मेंथॉल का छोटा प्लांट भी पास में लगा लिया जाए। प्रदेश में बड़ी संख्या में वनोपज मिलते हैं। उसके लिए एक्सपोर्ट मार्केट तलाशना होगा। कोरोना संक्रमण के दौरान भोजन न मिलने के डर से भी बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। इससे सबक लेकर मध्य प्रदेश सहित सभी राज्यों को यह व्यवस्था करना चाहिए कि श्रमिक देश में कहीं से भी अपने हिस्से का राशन ले सकें।'

मध्य प्रदेश सरकार ने एक कॉल सेंटर शुरू करवाया था। जहां से व्यापारियों-उद्योगपतियों से संपर्क कर समझा जाता था कि उन्हें किस तरह के श्रमिक चाहिए। इसके बाद अपेक्षाओं के आधार पर श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया जाता था। ऐसे प्रयोग भी पलायन रोकने में बहुत सहयोगी होते हैं। क्योंकि, सार्थक प्रयासों की ऐसी ही श्रृंखला अब हमारी श्रम-शक्ति का सम्मान बढ़ा पाएगी।

Posted By: Ravindra Soni

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