कांग्र्रेस के दिग्गज नेता राहुल गांधी ने बीते दिनों यह स्वीकार किया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल गलत था। बहुत समय बाद और आधे-अधूरे मन से की गई यह स्वीकारोक्ति भी आपातकाल और उससे जुड़े काले कारनामों की कालिख को साफ नहीं कर पाएगी। एक अमेरिका विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ राहुल गांधी के हालिया संवाद के दौरान आपातकाल को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों की गहराई से पड़ताल आवश्यक है, क्योंकि उसमें स्वाभाविक रूप से आपातकाल के प्रभाव को कमतर बताने का प्रयास हुआ। उन्होंने दावा किया कि आपातकाल गलत जरूर था, लेकिन कांग्र्रेस पार्टी ने देश के संस्थागत ढांचे पर कब्जा करने का कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा यह उनकी पार्टी की सोच और दर्शन में ही नहीं है। राहुल गांधी ने यहां तक कहा कि हम चाहें तो भी ऐसा नहीं कर सकते। ऐसे में राहुल गांधी के इन बयानों की उस भयावह आपातकाल के आलोक में पड़ताल करना आवश्यक है जिसने देश के गतिशील लोकतंत्र को फासीवाद में बदल दिया था।

इसके लिए कुछ तथ्यों की परख करनी होगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून, 1975 को इंदिरा गांधी के लोकसभा निर्वाचन को न केवल अवैध घोषित किया, बल्कि उन पर चुनाव लडऩे के लिए छह वर्ष का प्रतिबंध भी लगा दिया। इंदिरा गांधी को सुप्रीम कोर्ट से रियायत की उम्मीद थी, लेकिन वहां भी उन्हें मामूली सी राहत मिली। वह लोकतांत्रिक संस्थाओं और परंपराओं को ताक पर रखकर अपनी सत्ता कायम रखने पर अड़ी थीं। इसके लिए उन्होंने संविधान के उस अनुच्छेद 352 का सहारा लेने से भी गुरेज नहीं किया जो सरकार को 'किसी आंतरिक अस्थिरताÓ की स्थिति में आपातकाल लगाने की शक्ति प्रदान करता है। इस प्रकार 25 जून, 1975 की रात को उन्होंने आपातकाल लगाने का फैसला किया। अवैध होते हुए भी इस प्रस्ताव पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने बिना झिझक हस्ताक्षर कर दिए, जो असल में इंदिरा गांधी के कृपापात्र थे। इसके बाद इंदिरा सरकार ने लोकतंत्र के प्रत्येक स्तंभ को कमजोर करना आरंभ कर दिया।

इसकी शुरुआत राष्ट्रपति कार्यालय से ही हुई। अहमद तो 'रबर स्टैंपÓ राष्ट्रपति के नाम से ही प्रसिद्ध ही थे। उनके पास जो प्रस्ताव भेजा जाता उस पर उनके हस्ताक्षर महज औपचारिकता भर होते थे। आपातकाल जैसे विध्वंसक फैसले को तो कैबिनेट की स्वीकृति नहीं मिली थी, फिर भी राष्ट्रपति ने उस पर मुहर लगा दी। उन्होंने इस अनैतिक कृत्य का विरोध नहीं किया। उस दौरान केंद्रीय कैबिनेट का भी पूरी तरह मखौल उड़ाया गया। इंदिरा गांधी ने सुबह छह बजे कैबिनेट की बैठक आहूत कर उसे घटनाक्रम की जानकारी दी। विरोध का एक स्वर तक नहीं फूटा। तब तक दुनिया जान गई थी कि प्रधानमंत्री अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को जेल में ठूस रही हैं। किसी भी मंत्री ने एक सवाल नहीं उठाया।

न्यायपालिका जैसी संस्था भी आपातकाल के कोप से न बच सकी। इंदिरा गांधी ने जून 1975 से पहले ही फासीवादी प्रवृत्ति दिखानी शुरू कर दी थी। अप्रैल 1973 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता को दरकिनार कर जस्टिस एएन रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया। अनदेखी के शिकार तीनों जज उस ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में 7-6 के बहुमत से लिए गए फैसले वाली पीठ का हिस्सा थे, जिसने यह निर्णय सुनाया था कि संसद भले ही संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसके मूल ढांचे से छेड़छाड़ का उसे कोई अधिकार नहीं। राहुल गांधी सहित हम सभी उसी ऐतिहासिक फैसले के कारण खुली हवा में सांस ले रहे हैं और हमारा संविधान अभी तक अक्षुण्ण बना हुआ है। इंदिरा गांधी को वह लोकतंत्र हितैषी फैसला रास नहीं आया और उसके अगले ही दिन उन्होंने शीर्ष अदालत की व्यवस्था में बदलाव का फैसला कर लिया।

मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था। आपातकाल के दौरान अटॉर्नी जनरल नीरेन दे ने मशहूर बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में दलील दी थी कि जब तक राष्ट्रपति का आदेश जारी है तब तक नागरिकों को अनुच्छेद 21 के तहत मिला प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का मूल अधिकार निरस्त रहेगा। जस्टिस रे और तीन अन्य न्यायाधीशों ने सरकार के सुर में ही सुर मिलाया। केवल जस्टिस खन्ना ने विरोध जताया। राजनीतिक कैदियों की रिहाई का विरोध करते हुए जस्टिस बेग ने तो यहां तक कहा कि इस मामले में शिकायत का कोई तुक नहीं, क्योंकि जेल में उनकी बहुत अच्छी देखभाल हो रही है और सरकार उनके साथ 'मातृत्व भावÓ से पेश आ रही है। यही कारण रहा कि जस्टिस खन्ना से कनिष्ठ होने के बावजूद इंदिरा गांधी ने जस्टिस बेग को ही मुख्य न्यायाधीश बनाया। तब इंदिरा गांधी ने न्यायपालिका की शक्ति को सीमित करने के लिए 42वां संविधान संशोधन भी पारित करा लिया, जिसमें अनुच्छेद 368 के तहत संसद द्वारा संविधान संशोधन की शक्ति को असीमित कर दिया गया था। इतना सब हुआ, फिर भी राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्र्रेस संस्थानों पर 'काबिजÓ होना नहीं जानती।

उस काल में संसद भी पूरी तरह शिथिल रही। उसने संविधान की आत्मा पर प्रहार करने वाले कुछ संशोधनों को पारित किया। उनमें 42वां संशोधन सबसे शर्मनाक था, जिसे न्यायपालिका की शक्ति को सीमित करने के उद्देश्य से मूर्त रूप दिया गया। प्रेस को भी आपातकाल की तपिश झेलनी पड़ी थी। आपातकाल लगाए जाने वाली रात को अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, ताकि लोग अगले दिन आपातकाल की खबर न पढ़ सकें। प्रेस परिषद भंग कर दी गई। तमाम स्वतंत्र पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया या वे प्रताडऩा के शिकार बने। राजनीतिक विरोधियों की मीसा के तहत कैद में रखा हुआ था। उनका मामला देखने के लिए नवीन चावला को विशेष अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था। आपातकाल की जांच के लिए गठित शाह आयोग ने चावला को एक 'तानाशाह और निर्दयीÓ अधिकारी करार देते हुए उन्हें किसी भी सार्वजनिक पद के लिए अयोग्य बताया। जो राहुल गांधी यह राग अलाप रहे हैं कि उनकी पार्टी संस्थानों पर कब्जा करना नहीं जानती, उनकी पार्टी की सरकार के दौरान वही चावला न केवल कई अहम पदों पर रहे, बल्कि उन्हें देश का मुख्य चुनाव आयुक्त तक बनाया गया। संस्थानों पर 'काबिजÓ होने से जुड़ी कांग्र्रेस की तथाकथित अक्षमता को उजागर करने की इससे उम्दा मिसाल और कोई नहीं हो सकती। ऐसे में राहुल गांधी वे बयान कहां टिकते हैं कि उनकी पार्टी संस्थानों के स्वरूप को बिगाडऩे की तिकड़में नहीं जानती।

(लेखक लोकतांत्रिक विषयों के जानकार हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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