संस्कृत, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाओं की वंशज होने के कारण हिंदी का भारतीय संस्कृति में तो महत्व था ही, अब कुछ वर्षों से वह भारतीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। अनेक विधानसभाओं का चुनाव जिताने के साथ अब लोकसभा चुनाव की जीत का माध्यम भी वह है। समूचे देश में वह समझी जाती है और मतदान को दिशा देने में समर्थ है।

पिछले लोकसभा चुनाव में वह जीत का प्रमुख कारक रही है। उन राजनेताओं को भी, जो हिंदी में बोलना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, हिंदी में बोलने के लिए विवश होना पड़ा।

हिंदी की अंतर्निहित शक्ति को महात्मा गांधी ने बहुत पहले भांप लिया था। उनके सान्न्ध्यि में रहने वाले अनेक राजनेता भी उनसे सहमत थे। राममनोहर लोहिया ने तो हिंदी के लिए मैदानी संघर्ष भी किया था। संस्कृति की अपेक्षा राजनीति की गति शिप्र होती है। इसलिए उम्मीद कर सकते हैं कि अब हिंदी का प्रचलन अधिक तेज गति से होगा। राजनीति के पदचिह्न तो जरूर उथले रहेंगे, किंतु संस्कृति उन्हें गहराई देती हुई चलेगी। आज हिंदी देश की अघोषित राष्ट्रभाषा है।

हिंदी की राजनीतिक हैसियत का ही यह कमाल है कि उसका समर्थन ही नहीं, उसका विरोध भी चुनाव में जीत दिलाता है। इसीलिए तमिलनाडु में पिछले सात दशकों में हिंदी विरोध के मुद्दे को सदैव जिंदा रखा गया है। नई शिक्षा नीति के मसौदे का त्रिभाषा सिद्धांत कहीं नहीं कहता कि हिंदी पढ़ना अनिवार्य है। मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. के. कस्तूरीरंगन ने स्पष्ट किया है कि त्रिभाषा सिद्धांत अत्यंत लचीला है। राज्य और यहां तक कि स्कूल भी तय कर सकते हैं कि उनके छात्र कौन-सी तीसरी भाषा पढ़ेंगे। त्रिभाषा सिद्धांत में छात्रों को मातृभाषा और अंग्रेजी के साथ कोई भी एक आधुनिक भारतीय भाषा पढ़नी है। अगर तमिलनाडु के छात्र तमिल और अंग्रेजी के साथ उड़िया पढ़ना चाहते हैं तो पढ़ सकते हैं। उन्हें ही तय करना है कि उनका भविष्य किस तीसरी भाषा के पढ़ने से संवरेगा। लोग नादान नहीं हैं कि वे तीसरी भाषा हिंदी न चुनें। हिंदी का विरोध कहीं होता नहीं है, कराया जाता है। जितना कराया जाता है, उससे ज्यादा दिखाया जाता है।

कई साल पहले प्रसिद्ध साहित्यकार बालकवि बैरागी का अपने कुछ मित्रों के साथ चेन्न्ई जाना हुआ। टैक्सी ड्राइवर बोला, 'नो हिंदी! आइदर तमिल ऑर इंग्लिश।" बैरागी जी ने इंग्लिश बोलकर टैक्सी कर ली। रास्ते में उन्होंने अपने साथियों से कहा, 'यार, मध्य प्रदेश में ड्राइवरों के इतने सरकारी पद खाली हैं, पर्याप्त आवेदन ही नहीं आए।" ड्राइवर ने टैक्सी को धीमा किया, पीछे मुड़कर पूछा, 'साहब, आवेदन कब तक कर सकते हैं? मेरा भाई अच्छी ड्राइविंग जानता है।"

क्या हम हिंदी भाषी लोग खुद हिंदी विरोधी नहीं हैं? क्या हमें अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं चाहिए पड़ते? क्या हमारी प्रादेशिक सरकारें गांवों तक में अंग्रेजी माध्यम स्कूल खोलने का सपना नहीं देखतीं, दिखातीं? क्या हमें अपने प्राचार्यों, शिक्षकों से यह सुनने को नहीं मिलता कि 'अरे, हिंदी में क्या पढ़ना-पढ़ाना?" क्या हिंदी को आलू-प्याज कहकर पाठ्यक्रम में उसकी उपस्थिति और गंभीरता को सस्ता और कामचलाऊ साबित नहीं किया जाता? क्या हमारे हिंदी के शिक्षक समर्पण भाव से पढ़ा रहे हैं? क्या वे ईमानदारी से पढ़ा रहे अपने विभागीय सहयोगी का उपहास उड़ाते हुए यह नहीं कहते कि इन्हें तो पढ़ाने का बड़ा शौक है?

हमारा हिंदी बोलना तो फिर भी थोड़ा गनीमत है, किंतु लिखना? क्या हमारी पत्र-पत्रिकाओं, बाजारों में लगे साइन बोर्ड, दफ्तरों, शिक्षण संस्थाओं, निमंत्रण व सम्मान पत्रों, सूचनाओं, टेलीविजन विज्ञापनों में हिंदी वर्तनी की टांग नहीं तोड़ी जा रही है? क्या हमारे प्रतिष्ठित हिंदी अखबारों तक में ऐसे मनमाने शब्दार्थ परिवर्तन नहीं मिलते, जो हमारी लापरवाही के द्योतक हैं? और जिनसे हिंदी सीख रहे अहिंदी भाषाभाषी असमंजस में पड़ जाते हैं? उदाहरण के लिए क्या हिंदी के अधिकांश अखबार आरोपी (आरोप लगाने वाला, वादी) शब्द का प्रयोग आरोपित (जिस पर आरोप लगाया गया हो) के अर्थ में नहीं कर रहे हैं? शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं, पर स्वाभाविक व टिकाऊ परिवर्तन वह होता है, जो जनता के बीच से आता है, वह नहीं जो प्रकाशनों की लापरवाही से जन्मा होता है और कृत्रिम होता है। 'उसने बीच चौराहे पर मेरी हिंदी कर दी", जैसे प्रयोगों में क्या हम हिंदी को गाली के अर्थ में प्रयोग करने का दुष्कर पाप नहीं कर रहे हैं?

हिंदी भाषागत अपनी अनेक गलतियों को हम बोलियों के माथे मढ़ने के भी आदी हो गए हैं। अहिंदीभाषियों से उम्मीद करने से पहले हम खुद से ही उम्मीद क्यों नहीं करते? अशुद्ध वर्तनी अशुद्ध उच्चारण को और अशुद्ध उच्चारण अशुद्ध वर्तनी को जन्म देता है। क्या हमें इस दुष्चक्र को तोड़ने की दिशा में भी सक्रिय नहीं होना चाहिए?

हिंदी के सिर जीत का सेहरा ही नहीं बंधता, हार का ठीकरा भी फूटता है। अगर नेताओं को लगता है कि उनके बयान से गलत संदेश जा रहा है, तो उन्हें यह कहते देर नहीं लगती कि 'ऐसा उनके हिंदी न जानने के कारण हुआ!" लेकिन क्या यह शर्मनाक नहीं है कि इस देश में अपने सत्तर साला राजनीतिक जीवन के बावजूद वे हिंदी नहीं जानते? खैर, 'जो हुआ सो हुआ", अब तो हिंदी सीख लीजिए। जनता में रहेंगे तो हिंदी अपने-आप आ जाएगी। सच तो यह है कि ऐसे तमाम लोग हिंदी जानते हैं, पर यह बताने में कि उन्हें हिंदी आती है, उन्हें निम्न-मध्यवर्गीयता की गंध आती है।

हिंदी अपने आंतरिक बलबूते पर आगे बढ़ी है। संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी ने उसे दास बनाने की कोशिश की। कई क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी की समान-धर्मा उर्दू ने भी उस पर आंखें तरेरीं। आज हिंदी की ही कई बोलियां उसके साथ मुंहजोरी कर रही हैं। लेकिन वह अपनी विनम्र दृढ़ता और जरूरी लचीलेपन के साथ गंगा की तरह सतत प्रवाहमान है। वह जानती है कि संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों से आए शब्दों का उसमें सहज समाहन और गति देगा। इसलिए वह उन्हें सदैव स्वीकार करती रही है। राजनीति ने तो हिंदी का लोहा मान लिया है, पर अब हमें भी हिंदी के अपने घर को ठीक कर लेना चाहिए। जब हम हिंदी बोलने, लिखने और पढ़ने में लापरवाही और कोताही नहीं बरतेंगे, तब और सिर्फ तब हिंदी का गौरव स्थापित होगा।

हमारे संविधान के दो निर्णय दूरदर्शी न होने से गलत रहे। पहला, कश्मीर को विशेष दर्जा देने का। दूसरा, सिंहासन पर बैठी हिंदी के बजाय अंग्र्रेजी से राजकाज चलवाने का। पहला सुधर गया है। दूसरा सुधरने में उस गौरव की निर्णायक भूमिका होगी, जो हम हिंदी को देंगे।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद् हैं)