आशीष व्यास

इंदौर नगर निगम के अफसर को बल्ला उठाकर मारने वाले भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय को लेकर बीते चार दिन से प्रदेश की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। सार्वजनिक जीवन में नेता पुत्रों के ऐसे आचरण का यह पहला मामला नहीं है। थोड़े दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल के बेटे प्रबल गोलीकांड में फंसे, गिरफ्तारी के बाद जेल भी जाना पड़ा। इसी मामले में भाजपा विधायक जालमसिंह पटेल का बेटा मोनू फरार है। भाजपा विधायक कमल पटेल का बेटा सुदीप भी कांग्रेसियों को धमकाने के मामले में जमानत पर है। स्व-अनुशासन की मिसाल देने वाली पार्टी में महीनेभर के भीतर ही हुए इन घटनाक्रमों ने यह बहस छेड़ दी है कि आखिर नेताओं का आचरण कैसा होना चाहिए?

समाज और राजनीति को करीब से जानने वाले विशेषज्ञ दो महत्वपूर्ण स्थापनाएं बार-बार दोहराते रहे हैं। पहली- 'यह प्रसिद्धि की ही प्रताड़ना है कि व्यक्ति को सदैव उन्नतिशील बना रहना पड़ता है।'

दूसरी- 'कभी-कभी आपको वह जीवन जीना पड़ता है, जिसकी लोग आपसे अपेक्षा करते हैं।'

वैसे तो समाज-राजनीति के जानकारों, दार्शनिकों और आध्यात्मिक गुरुओं ने नेता की व्याख्या की है। मगर वर्तमान परिदृश्य में ईशा फाउंडेशन के जग्गी वासुदेव का मत सटीक बैठता है। उनकी धारणा को संसद और विधानसभाओं में पहुंचे नेताओं से लेकर इंदौर की बल्लेबाजी तक से जोड़ा जा सकता है।

- नेता, यानी नेतृत्व, मुख्य रूप से कार्यों को करने या संभव बनाने का विज्ञान है। लेकिन, हमारे देश में स्थिति उल्टी है। यहां अगर आप काम को होने से रोक सकते हैं, तो आप नेता बन सकते हैं। अगर आप कामकाज ठप करवा सकते हैं, शहर बंद कर सकते हैं, सड़क-रेल रोको जैसे आंदोलन सफल करवा सकते हैं, तो इसका मतलब है कि आप नेता बन सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि देश को रोकने की कला नेता बना रही है!

- आखिर नेता बनने का मतलब क्या है? कोई भी शख्स तब तक खुद को नेता नहीं कह सकता, जब तक कि उसके जीवन में कोई ऐसा लक्ष्य न हो जो उससे भी बड़ा हो। नेता की उपस्थिति इसलिए जरूरी हो जाती है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच नहीं पा रहे हैं। मतलब, एक ऐसा व्यक्ति जो वह देख और कर सकता है, जो दूसरे लोग खुद के लिए नहीं कर सकते।

राजनीति स्थानीय हो या राष्ट्रीय, इस मत पर जितना जनता को सोचना शुरू करना चाहिए, उससे कहीं ज्यादा नेताओं को। क्योंकि, भविष्य की राजनीति में मांग भी अलग होगी और जनता की अपेक्षाएं भी? बहरहाल, घटनाएं जब भाजपा के नेता या नेतापुत्रों से जुड़ी हुई हों, तो सीख, सबक और संदर्भ भी इसी पार्टी का देना ही बेहतर होगा। ऐसे में ग्वालियर में जन्मे पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी से ज्यादा बेहतर किस्से और किसके हो सकते हैं। एक बार सीपीआई के कुछ नेता लोकसभा में अटलजी का विरोध कर रहे थे। बोलने के दौरान वे उन्हें टोक भी रहे थे। तब अटलजी ने कहा कि जो मित्र भाषण के दौरान टोक रहे हैं, वो 'शाखामृग' की भूमिका में हैं। शाखामृग का मतलब किसी को समझ नहीं आया। थोड़ी देर बाद संस्कृत के जानकार और सांसद प्रकाश वीर शास्त्री ने बताया कि शाखामृग का मतलब होता है- बंदर। इसके बाद विपक्षी ज्यादा भड़क गए। लेकिन, तब तक भाषण पूरा हो चुका था। यहां महत्वपूर्ण है- अपनी बात को पूरी तरह से कहना और यदि उसे अनसुना किया जा रहा है तो तरीका बदलकर और बेहतर तरीके से तत्काल उसे स्पष्ट भी कर देना। अटलजी की यह खूबी भी थी कि यदि विषय जटिल हो तो वे मुहावरों और कहावतों के जरिए उसे इतना सरल बना देते थे कि सुनने वालों को भी लगता था कि कोई नई बात हो रही है। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि बगैर विरोध और तंज के राजनीति संभव नहीं है। लेकिन, विरोध का श्रेष्ठ अंदाज क्या हो और आचरण में कैसे लाया जाए, अटलजी का भाषा-ज्ञान इसका सटीक उदाहरण है।

नेताओं के आचरण से लेकर संसद में उनके अलग-अलग अनुभव पर कई किताबें लिख चुके हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार का मानना है- "भारतीय राजनीति में 'नेता' शब्द से सबसे पहले सुभाषचंद्र बोस को संबोधित किया गया था। समझा जा सकता है कि आजादी के पहले इस शब्द के क्या मायने होंगे और सार्वजनिक जीवन में भी इसकी कितनी प्रतिष्ठा होगी। यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि आज यही शब्द कई उदाहरणों-अवसरों पर 'अपशब्दों" की सूची में गिना जाने लगा है!" वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं- 'हमने उम्मीद की थी कि जैसे-जैसे लोकतंत्र का अनुभव बढ़ेगा, सांसद-विधायक भी अनुभवी होंगे, लेकिन परिणाम इससे उलट ही आ रहे हैं। संसद तक में भाषा का जो स्तर गिर गया है, उस पर लगातार गंभीरता से संवाद किया जाना चाहिए।"

दरअसल 'नेता' शब्द आते ही अब एक अलग तरह की छवि बनना-बनाना शुरू हो जाती है। छोटे से लेकर हर किसी के लिए धारणाओं के पैमाने भी गढ़ दिए जाते हैं- नेता यानी भ्रष्टाचार का पर्याय, केवल खुद के फायदे का कायदा देखने वाला व्यक्ति, कानून हाथ में लेने और दबाव-प्रभाव की राजनीति करने वाला चरित्र। इस बात को साबित करने के लिए जिला से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक नेताओं के नाम दर्ज मुकदमे ही काफी हैं। ये आंकड़े केंद्र ने देशभर के हाई कोर्ट से एकत्र कर सुप्रीम कोर्ट में पेश किए थे। कुल दर्ज मामलों में 3816 प्रकरण आपराधिक थे। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने नवनिर्वाचित 542 सांसदों में से 539 सांसदों के हलफनामों का विश्लेषण किया तो पता चला कि 159 सांसदों (29 फीसदी) के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं। ऐसे सांसदों की संख्या दस साल में 44 प्रतिशत बढ़ भी गई है। भाजपा के 303 में से 301 सांसदों के हलफनामे के विश्लेषण में पाया गया कि साध्वी प्रज्ञा सिंह सहित 116 सांसदों (39 फीसदी) के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। वहीं, कांग्रेस के 52 में से 29 सांसद (57 फीसदी) आपराधिक मामलों में घिरे हैं।

अब बात मध्य प्रदेश की। हाई कोर्ट ने मौजूदा सांसद और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए भोपाल में एक विशेष सेशन कोर्ट गठित कर दी है। मध्य प्रदेश के 68 विधायक और 10 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। लगभग 130 आपराधिक मामले लंबित भी हैं। इनमें से 43 विधायक और 2 सांसद ऐसे हैं, जिनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, बलवा, दंगा जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। हाई कोर्ट के निर्देश पर प्रदेश के वर्तमान सांसद और विधायकों से जुड़े लगभग 130 आपराधिक मामलों की प्रारंभिक सूची मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने तैयार करवाई है। ये प्रदेश की अलग-अलग जिला अदालतों में लंबित हैं।

अब एक रोचक जानकारी। सड़क से संसद तक का सफर तय करने की उम्मीद रखने वाले नए-पुराने नेता, अब कक्षाओं में भी नेतागिरी का पाठ पढ़ सकते हैं। पोस्ट ग्रेजुएशन इन पॉलिटिकल लीडरशिप एंड गवर्नेंस का यह कोर्स नौ महीने का है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संस्था रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप (आईआईडीएल) में राजनीति और शासन को चलाने के बारे में अध्ययन के साथ-साथ लीडरशिप मैनेजमेंट, राजनीति, प्रजातंत्र, शासन व पब्लिक पॉलिसी के बारे में पढ़ाया जा रहा है। इसके पाठ्यक्रम में देश की अलग-अलग नीतियों, राजनीतिक दलों का इतिहास-विचारधारा, कॉर्पोरेट गवर्नेंस समेत कई विषयों को विस्तार से समाहित किया गया है।

माननीयों को राजनीतिक शिक्षा देने के ऐसे प्रयास के बीच यह सोचा जाना चाहिए कि धनबल-बाहुबल से जीत व सत्ता तो मिल सकती है, लेकिन पहचान पाने के लिए आदर्शों का अनुसरण करना और फिर ऐसे ही आदर्श स्थापित करना भी आवश्यक है!