भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य का विभाजन कर भारतीय संघ के साथ उसके संबंधों को नए सिरे से तय किया है। इस कवायद से वह ऐसे स्याह क्षेत्र में दाखिल हो गई है जिसकी छाया भारतीय राष्ट्र-राज्य के लचीलेपन को चुनौती देने जा रही है। पहले बात संवैधानिक संदिग्धता की। इस प्रक्रिया में अनुच्छेद तीन की मूल भावना की अनदेखी और अनुच्छेद 370 की समाप्ति के साथ और भी कुछ संवैधानिक पहलुओं का मखौल उड़ाया गया है। भारतीय संघ में विलय से पहले जम्मू-कश्मीर 1939 में अपनाए गए अपने संविधान से संचालित होता था। जब तक राज्य ने अपना संविधान नहीं अपनाया तब तक यही व्यवस्था कायम रही। महाराजा हरि सिंह ने भी जो विलय की संधि की थी, उसके सातवें पैराग्र्राफ के अनुसार भारतीय संघ भविष्य में भी राज्य पर कुछ ऐसा थोप नहीं सकता। हालांकि और भी रियासतों ने ऐसे ही कई समझौते किए थे, लेकिन पाकिस्तान के साथ संघर्ष के चलते जम्मू-कश्मीर की स्थिति खासी जटिल हो गई। इसीलिए संविधान सभा ने भारतीय संघ के साथ कश्मीर के संबंधों को नया क्षितिज देने के लिए विलय की संधि से परे जाते हुए 17 अक्टूबर, 1949 को अनुच्छेद 370 के रूप में एक विशेष प्रावधान किया। भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के स्थायी एकीकरण के लिए 31 अक्टूबर, 1951 को एक चुनी हुई संविधान सभा का गठन हुआ। यह 17 नवंबर, 1956 तक अस्तित्व में रही, जहां इसके द्वारा स्वीकृत संविधान 26 नवंबर, 1957 को लागू हुआ। इस संविधान के अनुच्छेद तीन ने राज्य को भारत में अविभाज्य रूप से जोड़ते हुए कहा कि यह भारत का अभिन्न् अंग होगा।

अब जब सरकार ने राज्य को दो भागों में बांट दिया है तो अविभाजित जम्मू-कश्मीर के संविधान का क्या होगा? कोई भी उस संविधान को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। फिर 12 भागों और 147 अनुच्छेदों वाले इस संविधान में स्वयं को समाप्त करने वाला कोई प्रावधान भी नहीं है। यहां तक कि भारतीय संसद भी इसे निरस्त नहीं कर सकती, क्योंकि इसका निर्माण भी भारतीय संविधान की तर्ज पर एक चुनी हुई संविधान सभा द्वारा किया गया था। अगर कोई यह दलील दे कि राज्य के विभाजन के साथ ही यह संविधान भी समाप्त हो गया, तब यह तर्क भी उतनी मजबूती से दिया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में भारत और जम्मू-कश्मीर के रिश्ते भी उसी पड़ाव पर पहुंच जाने चाहिए जहां विलय की संधि के वक्त थे।

अब जरा सियासी मोर्चे पर स्याह परिदृश्य की पड़ताल कर ली जाए। अगर 1947 की बात करें तो उस वक्त कश्मीर की आबादी का एक बड़ा तबका स्वायत्तता, स्वशासन, आजादी और पाकिस्तान के साथ विलय का हिमायती था। कश्मीर की राजनीति में चार धाराएं आज भी हैं। ये धाराएं एक-दूसरे से मिली हुई भी हैं और एक-दूसरे को काटती भी हैं। लिहाजा हरेक तबके के लिए आजादी के मायने भी अलग हैं। स्वतंत्रता के समय से ही कश्मीर घाटी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्र्रेस और नेशनल कांफ्रेंस यानी नेकां जैसे भारतीय संघ के ध्वजवाहक भी रहे हैं। समय के साथ पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी जैसे राजनीतिक धड़े भी इसमें शामिल होते गए। 1990 के दशक में आतंकी गतिविधियों में जबर्दस्त तेजी के दौर में मुख्यधारा के दलों के तमाम नेता और कार्यकर्ता मौत के घाट उतार दिए गए, मगर ये दल फिर भी अड़े रहे। इस दौरान 1996 से 2019 के बीच राज्य में चार विधानसभा और सात लोकसभा चुनाव संपन्न् हुए। इससे भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में उनकी आस्था बढ़ी। राज्य के विभाजन ने दोनों क्षेत्रीय दलों नेकां और पीडीपी के लिए एक तरह से संभावनाएं खत्म कर दी हैं। कश्मीर के लिए जो राजनीतिक मुख्यधारा सोची गई, वह यकायक गायब-सी हो गई। यह भी एक विडंबना है कि राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों डॉ. फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को नजरबंद रखा गया है। महबूबा मुफ्ती तो हाल तक भाजपा की गठबंधन सहयोगी रही हैं। राजनीतिक मुख्यधारा को इस तरह नकारने के निकट भविष्य में बहुत गंभीर नतीजे देखने को मिलेंगे।

अब सुरक्षा से जुड़े स्याह परिदृश्य पर चर्चा की जाए। सुरक्षा से जुड़ी एक मान्यता यह है कि अगर किसी अलगाववादी मुहिम को जनसमर्थन हासिल होता है तो उस पर अंकुश लगाना एक तरह से असंभव होता है। उन लोगों के दिलों को जीतकर ही इसमें कामयाबी हासिल की जा सकती है। अगर आप आम जनता और अलगाववादियों के बीच की कड़ी को नहीं तोड़ पाते तो अलगाववाद और जोर पकड़ता है। पंजाब में अलगाववाद के खिलाफ लंबी लड़ाई में निर्णायक पड़ाव तभी आया, जब 1992 में चुनी हुई सरकार सत्ता में आई, भले ही बहुमत का आंकड़ा खास न रहा हो। उसी तर्ज पर फिलहाल नगालैंड में दशकों से चले आ रहे अलगाववाद को खत्म करने के लिए वार्ता हो रही है। यह उचित नहीं कि दिल्ली और श्रीनगर के बीच राजनीतिक दीवार को गिराकर कश्मीर को सीधे नई दिल्ली से संचालित किया जाए।

अब सामरिक दृष्टिकोण से भी इसे देखना होगा। पाकिस्तान न केवल कश्मीर, बल्कि इस समूचे क्षेत्र में फिर से प्रासंगिक हो गया है। तालिबान के साथ अपने समझौते को सफल बनाने के लिए अमेरिका को अब पाकिस्तान की कहीं ज्यादा जरूरत है। इस बीच ईरान का मसला भी गर्म है। ऐसे में पाकिस्तान अमेरिका की योजनाओं के केंद्र में होगा। अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता होने की स्थिति में कश्मीर में आतंकी दस्तक की आशंका भी और गहरा जाएगी। आईएस भी यहां अपनी नजरें जमाए हुए है। ऐसे मोड़ पर कश्मीरियों को अलग-थलग करने के बजाय सरकार को उन्हें साथ लेकर चलने की जरूरत है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और उत्तरी हिस्सों को वापस लेने से जुड़ा भारत का मामला पूरी तरह विलय की संधि और संसद के दो संकल्पों पर टिका हुआ है। जम्मू-कश्मीर संविधान के अनुच्छेद चार के अनुसार, 'राज्य के शासक की संप्रभुता के अनुसार इसमें वे सभी क्षेत्र आते हैं, जो 15 अगस्त, 1947 तक इसका हिस्सा रहे। इसी तरह 1994 और 2012 के दो संकल्पों का भी यही सार है कि विभाजन का एकमात्र अधूरा एजेंडा जम्मू-कश्मीर के उन हिस्सों को वापस लेना है जो पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जाए हुए हैं और जिन्हें उसने चीन को भी हस्तांतरित किया। मूल जम्मू-कश्मीर राज्य को समाप्त करने से ये दावे भी संदिग्ध हो जाते हैं। अब किसी द्विपक्षीय या बहुपक्षीय वार्ता में भारत यह दावा नहीं कर सकेगा कि वह विलय की संधि के अनुसार जम्मू-कश्मीर के सभी हिस्सों पर नियंत्रण चाहता है। जम्मू-कश्मीर पर मोदी सरकार के इस कदम से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का पक्ष कमजोर हुआ है। यही वजह है कि लोकसभा में इस मसले पर बहस के दौरान मैंने गृहमंत्री को बताया कि जम्मू-कश्मीर में ब्लैक एंड ह्वाइट के बीच फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्र्रे वाली स्थिति है।

(लेखक कांग्रेस के लोकसभा सदस्य एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)