रवींद्र कैलासिया, भोपाल। विधानसभा सत्र की बैठकों में उपस्थिति को लेकर ज्यादातर विधायकों में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई दे रही है। कई प्रयासों के बाद भी केवल 10 से 15 फीसदी विधायक ही शत-प्रतिशत बैठकों में शामिल होते हैं। हालांकि इस साल बैठकों में उपस्थिति के आधार पर भत्तों का भुगतान करने की परंपरा शुरू किए जाने से उपस्थिति में इजाफा हुआ है।

विधायकों की कम मौजूदगी के बीच प्रदेश के विकास, जन समस्याओं और राज्य के विषय संबंधी कानूनों को बनाने के लिए जो सार्थक बहस होना चाहिए, उसकी भी कमी महसूस की जाती रही है। इसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सदन के बाहर तो चिंतित दिखाई देते हैं लेकिन भीतर पहुंचते ही सब वही करते हैं जो सदन की कार्यवाही के रिकॉर्ड में पक्ष-विपक्ष के तौर पर वे दर्ज कराना चाहते हैं। सार्थक बहस हो, इसके लिए हर नई विधानसभा गठन के बाद प्रबोधन कार्यक्रम का आयोजन होता है। इसका भी कोई बड़ा असर पूरे पांच साल नहीं दिखाई देता है।

विधि और विधायी विशेषज्ञों का मानना है कि सदन की कार्यवाही एक जैसी होने से नीरस और उबाऊ जैसी हो गई है। इसमें अब बदलाव की जरूरत है जिससे विधायकों में इसके प्रति रुचि पैदा हो। विधायकों को अपनी बात रखने का अवसर कुछ ही मौकों पर ही मिलता है और समय सीमा भी तय होती है। सार्थक बहस के लिए दोनों पक्षों को जिम्मेदारी लेना होगी और अहम का टकराव से बचना होगा। अच्छी उपस्थिति के लिए दोनों पक्षों के नेताओं को अपने साथियों को सदन में हमेशा हाजिर रहने के लिए समय-समय पर प्रेरित करते रहने की भी जरूरत है।

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