आशीष व्यास

आइए, आज 59 साल पीछे चलते हैं। वर्ष 1960 की बात है। देश में भूदान आंदोलन का ज्वार उठ रहा था। आचार्य विनोबा भावे देशभर में घूम-घूमकर सहमति के स्वर तलाश रहे थे और व्यापक रूप में प्रचार-प्रसार भी कर रहे थे। इसी परिक्रमा को पूरा करते हुए वे इंदौर आए और 23 जुलाई से 24 अगस्त, एक महीने इंदौर में ही रहे। उस दौरान 'नईदुनिया' ने भी एक अभियान चलाया और जनता से भूदान मांगा। विनोबा भावे के हाथों स्थापित विसर्जन आश्रम में 22 साल मंत्री रहे किशोर भाई की स्मृतियों में वह दौर आज भी ताजा है। वे बताते हैं - 'विनोबा जी मुरैना, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी होते हुए इंदौर आए थे। भूदान आंदोलन का प्रभाव इतना ज्यादा था कि इंदौर से जाते-जाते शहर और ग्रामीण अंचल के लोगों ने उनकी झोली में 85 हेक्टेयर जमीन डाल दी। इंदौर से जब वे आगे बढ़े तब तक मध्य प्रदेश उन्हें 31,500 हेक्टेयर जमीन दे चुका था। यह ऐसी विदाई थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।' क्या आज कोई यह मान सकता है कि यही वह इंदौर या प्रदेश है, जहां खुले हाथों से भूदान हुआ। यह सवाल केवल इसलिए कि, अब यहां जमीनों पर लूट-खसोट की इतनी कहानियां हैं कि प्रदेश के हर चमकते हिस्से पर झूठ-धोखाधड़ी की कई परतें चढ़ गई हैं!

दरअसल, 'जमीन' आज भी सामंतवादी मानसिकता का पर्याय है। समाज में जैसे-जैसे सभ्यता समाप्त होती गई, जमीनों पर कब्जे होते चले गए। जिसने सबसे ज्यादा भूमि हथियाई, वही बड़ा जमींदार बन गया और आगे चलकर संभवत: उन्हीं जमींदारों ने गद्दी हथियाकर खुद को 'राजा' बता दिया। धीरे-धीरे समाज बदला, लोग नियम-कानून समझने लगे, तो जमीन हथियाकर 'बड़े' हो जाने की लालसा ने संगठित अपराध का रूप ले लिया। इस आधार पर कहा जा सकता है कि छोटे से बड़ा जमीन घोटाला इसी योजना या संस्कार की देन है। देश के बड़े जमीन घोटालों में मप्र का नाम उस स्तर पर भले ही सामने नहीं आया हो, लेकिन यहां आम लोगों की छोटी-छोटी जमीनें कुछ खास कारणों से दांव पर लगती रही हैं। बीते 30 साल में हाउसिंग सोसायटी और लैंड रिकॉर्ड में हेराफेरी से लेकर डरा-धमकाकर अवैध कब्जे तक का कारोबार तेजी से फला-फूला है। यही वह दौर है जब कांग्रेस और भाजपा सरकार ने बारी-बारी से पांच बार 'ऑपरेशन' चलाया, लेकिन घाव है कि भर ही नहीं रहा है या यूं कहें इसे ठीक ही नहीं होने दिया जा रहा है।

सरकार फिर सक्रिय है!

मध्य प्रदेश में एक बार फिर 'ऑपरेशन क्लीन' के जरिए जमीनों से जुड़े विवाद सामने आ रहे हैं। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर जैसे अन्य शहरों में भी मकान-दुकान खाली करवाने से लेकर अवैध कब्जे हटाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने भी अफसरों को फ्री-हैंड देने का दावा किया है। इसके बाद सक्रिय हुए पुलिस-प्रशासन की मौजूदा कार्रवाई निर्णय तक पहुंचे या नहीं, सरकारी रिकॉर्ड जरूर फिर से अपडेट हो जाएगा। कुछ नए नाम जुड़ जाएंगे, कुछ सफेदपोश बाहर आ जाएंगे और फिर नई शिकायतों के साथ फाइलों का पुलिंदा थोड़ा और मोटा हो जाएगा। शायद इसीलिए, लोगों के मन में फिर कुछ सवाल उठने लगे हैं। और, उठे भी क्यों नहीं? भोपाल में विधानसभा सत्र चलता रहा और जमीनों के विवाद को लेकर वहां मरघट-सी शांति रही! न कांग्रेस इस कार्रवाई का श्रेय ले रही है और न ही भाजपा विरोध कर रही है। यह 'सौहार्द' कुछ ऐसे 'संशयों' को जन्म दे रहा है, जहां से तालमेल के राजनीतिक समीकरण नए अर्थों की तलाश शुरू करते हैं!

तो क्या कभी पारदर्शिता नहीं आ सकती?

अब जमीनों के 'खेल' रोकने के लिए सामने आए दो किरदारों पर नजर डालते हैं। एक सरकार और दूसरा जनता के प्रतिनिधि हैं। साथ ही हैं, इस व्यवस्था के छोटे से हिस्सेदार। लेकिन, दोनों ने गलत के खिलाफ, सही आवाज उठाई और दो बड़े जमीन घोटाले को जांच के दायरे में ला दिया।

एक छोटी शिकायत से रुका बड़ा अपराध!

पहले किरदार हैं ओमप्रकाश यादव। ये हरियाणा के मानेसर जमीन घोटाले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ने वाले पूर्व सरपंच हैं। मानेसर, नखड़ोला और नौरंगपुर, तीन गांव के 250 से ज्यादा किसानों को अधिग्रहण का डर दिखाकर 400 एकड़ जमीन निजी कंपनियों को बेच दी गई। यह 'खेल' 2004 से चल रहा था। व्यवस्था के जंजाल पर बात करते हुए वे बताते हैं- 'जब सेक्शन-4 का नोटिस आया, तो मैं समझ गया था कि गड़बड़ है। मगर, सबूत और तथ्य जुटाने में समय लगा। साल 2015 में मानेसर थाने में केस दर्ज करवाया। 1600 करोड़ रुपए की जमीन सरकार ने 100 करोड़ रुपए में खरीदकर बेची थी। यानी, किसानों को 1500 करोड़ रुपए का नुकसान था। पुलिस, सीबीआई, कोर्ट, ईडी के चक्कर काटते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे। आखिरकार, मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सहित 33 लोगों के खिलाफ चार्जशीट फाइल हुई। सुनवाई अभी भी चल रही है। सभी किसान लगातार लड़े और मिलकर लड़े, अभी और लड़ाई बाकी है।'

एक ही फॉर्मूला, सामने गलत होते हुए देखें, तुरंत कार्रवाई करें

रॉबर्ट वाड्रा की डीएलएफ और लैंडफिल प्रोजेक्ट की जमीन हरियाणा कैडर के आईएएस अशोक खेमका ने रद्द कर दी थी। कड़े फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले खेमका के 27 साल में 53 तबादले हो चुके हैं। उनका मानना है - 'सिस्टम को साफ करने के लिए कोई नियम बाधक नहीं होते। भ्रष्टाचार रोकने का कोई सीधा फॉर्मूला नहीं है। ऐसा कोई जादुई नियम-कायदा भी नहीं है कि एकाएक पूरी व्यवस्था बदल जाए और सबकुछ साफ-सुथरा हो जाए। इंतजार मत कीजिए, सामने गलत होते हुए दिख रहा है, तो तुरंत कार्रवाई कीजिए। फिर इसके लिए भी तैयार रहिए कि इसकी भी प्रतिक्रिया हो सकती है। आवाज उठेगी, तो उससे आने वाले समय में व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश जरूर बनेगी।'

मिसाल बनें ये कोशिशें

मध्य प्रदेश की जनता ने एक बार फिर साहस किया है, एक बार फिर शासन की सोच-समझ पर विश्वास भी किया है। इस बात का कि, सरकार, पुलिस और प्रशासन ने मिलकर जो विशेष प्रकोष्ठ तैयार किया है, वहां प्रमाणों के साथ पहुंच रही शिकायतें सांस लेती रहेंगी। अवैध कब्जों की कहानियां कुछ ऐसी शिक्षाओं के साथ खत्म होंगी, जिन्हें मिसाल के रूप में हमेशा प्रस्तुत किया जाता रहे। 'ऑपरेशन क्लीन' के साथ, प्रदेश सरकार भूदान में मिली जमीनों से बची हुई 9500 हेक्टेयर भूमि की स्थिति भी पता करवा सकती है। यह पूरी जमीन अभी भी अवितरित है। मप्र भूमि सुधार आयोग के अध्यक्ष इंद्रनील शंकर दाणी का मानना है - 'वर्ष 2017 में आयोग ने सरकार को पहली रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें बताया गया था कि ऐसी जमीनें छह जिलों में हैं। शिवपुरी, गुना, मुरैना में 1000 हेक्टेयर से ज्यादा और छतरपुर, सिवनी, नरसिंहपुर में 100 हेक्टेयर के करीब। इसके अलावा बुरहानपुर में भी 18 हेक्टेयर जमीन है।' वे मानते हैं - 'हो सकता है यह जमीन भी माफिया की भेंट चढ़ गई हो। या, यहां भी किसी तरह का स्थायी-अस्थायी अतिक्रमण हो गया हो। हो सकता है, कोई सरकारी प्रोजेक्ट ही चल रहा हो। लेकिन, मौके पर एक बार जांच जरूर होना चाहिए।'

दरअसल, जमीनों को अतिक्रमण से बचाने के लिए कड़े नियम-कानून पहले से ही बने हुए हैं। बस, समय-समय पर उनका उपयोग जरूरी है। किया तो यह भी जा सकता है कि सरकार हर जिले में कीमती और सार्वजनिक उपयोग की जमीनें चिन्हित कर ले। फिर मौका-मुआयना हो कि उस पर अतिक्रमण है या नहीं। जैसे सड़क, चरनोई, पार्क, ग्रीन बेल्ट आदि की जमीनें। सबसे पहले इन्हें मुक्त करवाकर सुरक्षित किया जाए, इससे भविष्य में होने वाली कई गड़बड़ियां रुक जाएंगी।

जुमले-जुगाली और अल्पमत-अंतर्विरोध के साथ सत्ता स्वीकार करने वाली कमल नाथ सरकार एक वर्ष पूरा कर चुकी है। गांव-कस्बों से लेकर बड़े शहरों-राजधानी तक, यह पहला और निर्णायक अवसर है जब सरकार के होने का असर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। यदि यह उपस्थिति बनी रही, तो कोई संदेह नहीं कि ये प्रयास लंबे समय तक स्मृतियों के तरकश में तीर बनकर जमीन से जंग करते रहेंगे।

Posted By: Ravindra Soni

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