गत 12 दिसंबर को कर्नाटक के कोलार स्थित विस्ट्रॉन के संयंत्र में हुई तोडफ़ोड़ ने पूरे देश को एक तगड़ा झटका दिया। ताइवानी कंपनी विस्ट्रॉन भारत में एपल के उत्पाद बनाती है। शुरुआती दौर में इसे कंपनी-श्रमिक विवाद के तौर प्रचारित किया गया कि कुछ कर्मचारियों की वेतन कटौती और कुछ अन्य मसलों पर नाराजगी ने हिंसक रूप ले लिया। यह तोडफ़ोड़ बहुत अप्रत्याशित और आम विरोध-प्रदर्शन से काफी अलग थी जिसमें कंपनी के कर्मियों के अलावा बाहर से लाए गए लोग भी शामिल थे। इसमें न केवल संयंत्र की मशीनरी को नुकसान पहुंचा, बल्कि तैयार फोन भी लूट लिए गए। नुकसान के सही आकलन की तस्वीर आना अभी शेष है, लेकिन इसके कारण संयंत्र से फिलहाल उत्पादन रुक गया है। साथ ही विस्ट्रॉन के साथ एपल का अनुबंध भी खतरे में पड़ गया है। हालांकि विस्ट्रॉन को जल्द ही इस गतिरोध के दूर होने की उम्मीद है और इस दिशा में कंपनी ने प्रयास करने भी शुरू कर दिए हैं। इस प्रकरण की परिणति चाहे जो हो, लेकिन ऐसे दौर में जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से निकलकर भारत को अपना विनिर्माण केंद्र बनाने पर विचार कर रही हैं, उस स्थिति में यह घटना बहुत गंभीर है। शासन-प्रशासन को इससे सबक लेकर और सतर्क रहने की दरकार है।

विस्ट्रॉन ने 3,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार कोलार संयंत्र में इसी साल जुलाई से काम शुरू किया है। ऐसे में यह बात भी गले नहीं उतरती कि महज तीन महीने पुराने कर्मचारी ऐसे हिंसक विरोध पर उतारू हो जाएंगे। विस्ट्रॉन के अलावा फॉक्सकॉन और पेगाट्रॉन नाम की उसकी दो हमवतन कंपनियां भी देश में एपल के उत्पाद बना रही हैं। फॉक्सकॉन का संयंत्र चेन्नई के बाहरी इलाके श्रीपेरुंबुदूर में है। उसने अगले तीन वर्षों में भारत में 7,000 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला किया है। इसी तरह पेगाट्रॉन ने भी भारत में अपने परिचालन विस्तार के लिए 1,099 करोड़ रुपये जारी किए हैं। कोरोना काल में इन कंपनियों द्वारा चीन छोड़कर भारत आने का अपना महत्व है। अमेरिका तथा दूसरे कई देशों के साथ चीन के बिगड़ते रिश्तों की वजह से भी कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से किनारा कर रही हैं। ये तीनों कंपनियां भी उनमें शामिल हैं। चूंकि विस्ट्रॉन जैसी कंपनी द्वारा भारत में अपना संयंत्र लगाने से चीन की आंखों में किरकिरी स्वाभाविक है तो उसके संयंत्र में तोडफ़ोड़ के पीछे चीनी षड्यंत्र से इन्कार नहीं किया जा सकता। मामले की आगे बढ़ती जांच से भी कुछ ऐसे ही संकेत मिले हैं।

कर्नाटक पुलिस की आरंभिक जांच में इस हिंसा के तार कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लोगों और संगठनों से जुड़ते दिख रहे हैं। इसमें वामपंथी विचार से जुड़े ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्र्रेस (इंटक) और माकपा की छात्र इकाई स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानी एसएफआइ के नाम सामने आए हैं। इंटक ने तो विस्ट्रॉन में हिंसा का समर्थन करते हुए कर्मचारियों के साथ अपनी एकजुटता का एलान भी किया। पुलिस ने कोलार तालुका की एसएफआइ इकाई के अध्यक्ष श्रीकांत को इस मामले में गिरफ्तार भी किया है। फेसबुक-ट्विटर पर उसके समर्थन में वामपंथी खेमे का अभियान भी शुरू हो गया है। एसएफआइ और उसके मातृ संगठनों का चीन के प्रति झुकाव किसी से छिपा नहीं रहा। एसएफआइ देश के कई विश्वविद्यालयों विशेषकर जेएनयू जैसे संस्थानों में खासा सक्रिय है। वर्ष 2016 में जेएनयू में हुए कुख्यात 'भारत तेरे टुकड़े होंगेÓ वाले आयोजन में उसकी भी गहन संलिप्तता थी। यह संगठन माओवादी हिंसा का भी समर्थक है। समय-समय पर इसके प्रमाण मिलते रहे हैं। 29 जून 2008 को ओडिशा की बालीमेला झील में माओवादियों की हिंसा के शिकार हुए 38 जवानों की शहादत के बाद ऐसी खबरें आई थीं कि एसएफआइ सदस्यों ने जेएनयू में उसका जश्न मनाया था।

कम्युनिस्टों से जुड़े ये संगठन अक्सर आर्थिक गतिविधियों में गतिरोध पैदा करते रहे हैं। एटक बीते कुछ वर्षों के दौरान देश में परिचालन कर रही जापानी कंपनियों मारुति सुजुकी और होंडा की फैक्ट्रियों में हड़ताल कराकर काम ठप करा चुका है। उस कदम को भी चीन की शह पर जापानी उद्यमों को हतोत्साहित करने वाली कवायद माना गया था। हैरानी की बात यही है कि भारत में तो चीन समर्थक कम्युनिस्ट नेता और संगठन श्रमिक अधिकारों के नाम पर उत्पादन ठप करने से लेकर हिंसा तक का सहारा लेते हैं, लेकिन चीन में श्रमिकों के भारी उत्पीडऩ पर हमेशा से मौन रहे हैं। यदि चीन में विस्ट्रॉन जैसी हिंसा होती तो उसके कुसूरवार लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता। विस्ट्रॉन संयंत्र में हुई हिंसा के पीछे चीनी हाथ को कोई और नहीं, बल्कि उसका सरकारी मीडिया ही सही साबित करने पर तुला है। इस प्रकरण के तुरंत बाद चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने बेसुरा राग अलापना शुरू कर दिया। उसने कहा कि यह घटना दर्शाती है कि भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सुरक्षित नहीं, लिहाजा उन्हें चीन छोड़कर भारत जाने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। उसने कहा कि भारत में सुरक्षा की खराब स्थिति के कारण विस्ट्रॉन को ऐसे हमले का शिकार होना ही था। उसने झट से एक बीजिंग के एक विशेषज्ञ का हवाला देते हुए लिख डाला कि भारत में भले ही नाम को सस्ता श्रम हो, लेकिन असल में उत्पादन क्षमता, सामथ्र्य और गुणवत्ता में मामले में स्थितियां खराब हैं। इसी कारण चीन से वहां गईं कई कंपनियां वापस चीन लौट रही हैं। इसी अखबार की चीफ रिपोर्टर चिंगचिंग चेन ने अपने विस्ट्रॉन पर हमले का हवाला देते हुए उस फॉक्सकॉन कंपनी का मजाक उड़ाया जो हाल में अपनी आइफोन फैक्ट्री को चीन से भारत ले गई है।

वास्तव में चीन और उसके सरकारी भोंपुओं के साथ ही भारत में बैठे उसके एजेंटों की असल टीस यही है कि एपल जैसी विश्व की सबसे लोकप्रिय कंपनी के उत्पाद अब बड़े पैमाने पर भारत में ही बनने लगेंगे। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का चीन छोड़कर भारत के प्रति बढ़ता आकर्षण भी उन्हें कचोट रहा है। ऐसे में भारत को चीन के साथ ही देश में सक्रिय उसके एजेंटों से भी सावधान रहना होगा। इसके लिए शासन-प्रशासन और श्रमिकों की आपूर्ति करने वाली एजेंसियों को सही तालमेल बैठाना होगा ताकि भविष्य में ऐसे संघर्ष न हों। तभी हम उन उद्यमों के लिए आदर्श परिवेश बनाने और उन्हें संदेश पहुंचाने में सक्षम होंगे कि भारत उनके लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सेंटर फॉर हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन हैं)

Posted By: Arvind Dubey