भारतवर्ष अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। यह महोत्सव अगले साल 15 अगस्त तक चलेगा, तब देश को स्वतंत्र हुए 75 साल हो जाएंगे। यह उस प्रतिज्ञा को याद दिलाता है, जो सारे देश ने एकजुट होकर गुलामी का प्रतिकार करने के लिए ली थी। इस महोत्सव को शुरू करने के लिए 12 मार्च की तिथि इसलिए चुनी गई कि इसी दिन 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध निहत्थे नमक सत्याग्रह का आरंभ हुआ था, जो अपने ढंग का अकेला था और सारे विश्व का ध्यान आकृष्ट कर सका था। उस दिन समूचे राष्ट्र ने सारे भेदों को भुलाकर मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व अॢपत करने की ठानी थी। आज देश स्वतंत्रता की दीपशिखा को संजोने के लिए कृत संकल्प है और नए दमखम के साथ आगे की जय यात्रा के लिए तत्पर हो रहा है, पर यह तत्परता और जज्बा निरी भौतिक सत्ता से कहीं अधिक भारत के भाव से उपजता है, जो समाज के रक्त और मज्जा में जाने कब से घुला मिला हुआ है। आजादी का क्षण भारत के असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, समर्पण और बलिदान की अमर गाथाओं को अपने में संजोए हुए है।

यह सही है कि अतीत में अखंड भारत दो-दो बार विभाजित हुआ है और अब कम से कम तीन राष्ट्र राज्य के रूप में विश्व राजनीति के खाते में दर्ज हो चुका है, परंतु यह भी सही है कि भारत और भारतीयता का विचार हजारों साल की सभ्यता और संस्कृति की यात्रा के बीच पुष्पित-पल्लवित हुआ है। वेद मंत्र अपने मूल रूप में आज भी जीवंत हैैं। भारत सिर्फ भूगोल और इतिहास न होकर एक जीवंत अस्तित्व को व्यक्त करता है, जिसमें विचारों के साथ जीवन के अभ्यास भी शामिल हैं। यह अस्तित्व अखंड, अव्यय, सकल और समग्र जैसे शब्दों के साथ पूर्णता की और ध्यान खींचता है। यह दृष्टि सब कुछ को, सबको देखने पर जोर देती आ रही है। जैसा कि गीता में कहा गया सभी प्राणियों में विद्यमान एक अव्यय भाव को देखना और भिन्न-भिन्न पदार्थों में बंटते हुए देखकर भी अविभक्त देखना ही सात्विक ज्ञान है। इसके पीछे निश्चय ही यह अनुभव रहा होगा कि सबको सबकी जरूरत पड़ती है और कोई भी पूरी तरह से निरपेक्ष नहीं हो सकता। समावेश करने की तीव्र आकांक्षा मनुष्य, पशु-पक्षी, तृण-गुल्म सबके बीच सदैव रही है।

गौरतलब है कि महात्मा गांधी समेत सभी नए-पुराने चिंतकों ने सीमित आत्म या स्व के विचार को अपरिपक्व और नाकाफी पाया है। इसीलिए ब्रह्म का विचार हो या सत्, रज और तम की त्रिगुण की अवधारणा, इन सबमें अपने सीमित स्व या अहंकार (स्वार्थ) के अतिक्रमण की चुनौती को प्रमुखता से अंगीकार किया गया है। अहंकार ही अपने पराए का भेद चौड़ा करते हुए प्रतिस्पर्धा और संघर्ष को जन्म देता है। यही प्रवृत्ति आगे बढ़कर अपने परिवेश और पर्यावरण के नियंत्रण और दोहन को भी जन्म देती है। विश्लेषण और विविधता से एक बहुलता की दृष्टि पनपती है। बहुलता की प्रतीति एकता की विरोधी नहीं होती है। एक विचार के रूप में भारत विविधताओं को देखता-पहचानता हुआ एकत्व की पहचान और साधना में संलग्न रहा है। इस विराट भाव की अभिव्यक्ति स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और महॢष अरविंद के चिंतन में प्रकट हुई। इन सबने विकास, प्रगति और उन्नति की कामना में पूर्व की परंपरा को आत्मसात करते हुए उसमें जोड़कर आगे बढऩे पर बल दिया है, न कि उसे ज्यों के त्यों स्वीकार किया। इस सिलसिले में कालिदास की बात उल्लेखनीय है कि 'सब पुराना ही अच्छा है और नया खराब है, ऐसा सोचना बुद्धिमानी नहीं है। विचारवान लोग जांच-परखकर ही अच्छे का ग्रहण करते हैं और बुरे का त्याग करते हैं।Ó

मनुष्य की उत्कृष्टता धर्म की प्रधानता में है, जो उसे धरती के अन्य प्राणियों से अलग करता है। अन्यथा पशुओं और मनुष्यों में भूख, प्यास, निद्रा और मैथुन की प्रवृत्ति समान रूप से परिलक्षित होती है। जीवन लक्ष्यों के रूप में परिगणित मनुष्य के सभी पुरुषार्थों में धर्म केंद्रीय है और सबको धारण करता है। धर्म को अपनाने से अभ्युदय और नि:श्रेयस की सिद्धि होती है। अर्थ और काम के पुरुषार्थ हमें कार्य में संलग्न करते हैं और संसार का ताना बाना रचते हैं, पर ये उच्छृंखल न होकर धर्म के सापेक्ष होते हैैं। मोक्ष के पुरुषार्थ का अभिप्राय मोह या आसक्ति के क्षय से है। इस तरह जीवन में भोग और त्याग का संतुलन जरूरी होता है। त्याग की आवश्यकता पूरे समाज के समावेश को ध्यान में रखने के लिए है। तभी सर्वोदय का स्वप्न साकार हो सकेगा।

संसार के संसाधन सीमित हैैं और उनमें बहुत से ऐसे हैं, जो पुनर्नवीकृत नहीं हो सकते अर्थात उनका निरंतर क्षरण होता रहेगा। इस तरह जीवन और सृष्टि की परिस्थिति की स्वाभाविक दशा है कि हम निरंकुश न होकर अपने संसाधनों का समुचित दोहन करें। भारत एक आधुनिक राष्ट्र के रूप पिछले सात दशकों में अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए लोकतंत्र के मार्ग पर अटल रहा है और यदि कभी स्खलन हुआ तो उसका प्रतिकार भी किया है। इस विशाल देश की समस्याएं जटिल हैं और साथ-साथ विश्व परिदृश्य भी बदलता रहा है। अपनी सफलताओं और कमियों से सीख लेते हुए एक समर्थ राष्ट्र बनाने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन आज एक साथ कई मोर्चों पर कार्य आवश्यक हैैं। इनमें आमजनों का जीवन स्तर ऊपर उठाना, औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना, राजनीतिक सत्ता का विकेंद्रीकरण करना, जन स्वास्थ्य के स्तर की उन्नति, नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता और सुभीता, प्रशासन में पारदर्शिता, सांस्कृतिक संसाधनों और विरासत को सुरक्षित कर समृद्ध करना प्रमुख हैं। देश ने कोविड महामारी के दौरान और टीकाकरण के क्रम में जिस क्षमता का परिचय दिया है, उसने वैश्विक नेतृत्व का दर्जा दिलाया है। देश ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना से अपनी नीतियों को नए रूप में ढालने का काम शुरू किया है। शिक्षा नीति का जो ढांचा स्थापित किया जा रहा है, उससे देश को बड़ी आशाएं हैं। यह सब संवेदनशील नौकरशाही और आधार संरचना में सुधार के साथ आचारगत शुद्धता की भी अपेक्षा करता है। स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव हमें इसी का आमंत्रण देता है।

(लेखक शिक्षाविद् हैैं)

Posted By: Arvind Dubey

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