अंतत: कांग्रेस में नवचेतना के अंकुर फूट ही गए। सात अगस्त को कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर मृतप्राय कांग्रेस को संजीवनी देने के लिए संगठन, उसकी कार्यप्रणाली और नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन की मांग की। 24 अगस्त को कांग्र्रेस कार्यसमिति की बैठक के पूर्व किसी ने यह पत्र 'लीक कर दिया। इसमें भाजपा के अभ्युदय, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर युवाओं के आकर्षण, कांग्रेस के जनाधार में कमी और नौजवानों के कांग्र्रेस से दूर होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी। पत्र में अनेक सुझाव भी दिए गए थे, जिससे पार्टी अपना खोया हुआ वैभव पुन: प्राप्त कर सके।

वास्तव में कांग्रेस में यह अप्रत्याशित था। सोनिया और राहुल को 'गांधी-ब्रांड पर इतना गुमान था कि वे कल्पना नहीं कर सकते थे कि गुलाम नबी आजाद, वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल, मुकुल वासनिक, मनीष तिवारी, शशि थरूर जैसे वरिष्ठ पार्टी नेता ऐसा कदम उठाएंगे। उनके गुमान का कारण भी वही लोग हैं, जिन्होंने पत्र तो लिखा, लेकिन इसके पहले कभी नेतृत्व को आईना दिखाने की जरूरत नहीं समझी और सोनिया गांधी को 19 वर्षों तक कांग्र्रेस का अध्यक्ष बनाए रखा तथा उनके बाद राहुल को नेतृत्व सौंप दिया। वे राहुल की अयोग्यता को बर्दाश्त करते रहे और नेहरू-गांधी वंश का कांग्रेस नेतृत्व पर एकाधिकार मानने की भूल करते रहे।

अक्सर सुझाव दिए जाते रहे हैं कि कांग्र्रेस को संगठन, विचारधारा और नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहिए और नेहरू-गांधी के रुपहले मिथक से बाहर निकलकर जमीनी राजनीति करनी चाहिए। कांग्रेस का अर्थ सोनिया और राहुल गांधी नहीं हैं। इसका अर्थ देशभर में फैले हजारों कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता हैं। एक कहावत है- जब जागे, तभी सवेरा। ऐसे ही यह नवजागृति कांग्र्रेस के लिए एक नवचेतना और नई आशा का संदेश है। कांग्रेस में इक्का-दुक्का विरोध और पार्टी छोड़ना तो हमेशा ही चलता रहा है, लेकिन ऐसा संगठित, सशक्त और सामूहिक विरोध तो 1948 के बाद पहली बार दिखाई दिया है। उस समय कांग्र्रेस सोशलिस्ट सेंटर के नेता आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, मीनू मसानी आदि ने कांग्रेस द्वारा समाजवादी नीतियां न अपनाने के विरोध में पार्टी छोड़ी थी। वर्ष 1969 में कांग्र्रेस का जो विभाजन हुआ, वह इंदिरा गांधी के विरुद्ध कांग्रेस-सिंडिकेट मोरारजी देसाई, के. कामराज, निजलिंगप्पा, सीबी गुप्ता, नीलम संजीव रेड्डी आदि नेताओं के लामबंद होने से हुआ।

आजाद और सिब्बल की मौजूदा पहल कांग्र्रेस में किसी नए विभाजन का संकेत तो नहीं? देखा जाए तो कांग्रेस नेताओं के पत्र में कोई आपत्तिजनक बात नहीं है। उसमें पार्टी के हित की ही बात कही गई है, लेकिन सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी को वह इसलिए चुभी, क्योंकि उसमें दो ऐसी मांगें हैं जो कांग्र्रेस-संस्कृति पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। एक मांग कांग्रेस आलाकमान संस्कृति को खत्म कर पार्टी में संस्थागत नेतृत्व प्रक्रिया स्थापित करने से संबंधित है, जो कांग्र्रेस में नेहरू-गांधी वंश का एकाधिकार समाप्त करती।

दूसरी मांग राष्ट्रीय से स्थानीय स्तर तक दल में आंतरिक लोकतंत्र की स्थापना से संबंधित है, जिसे समाप्त करने की शुरुआत इंदिरा गांधी ने 1969 में ही कर दी थी। इसके परिणामस्वरूप जून 1975 में जब उन्होंने देश में आपातकाल थोपा, तब कांग्रेसी नेताओं- हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम और युवा तुर्क नेता चंद्रशेखर, कृष्णकांत, मोहन धारिया आदि ने नेतृत्व का विरोध करने के बजाय उससे किनारा कर लिया। आज पार्टी के हित में नेतृत्व के खिलाफ बिगुल बजाने वाले कांग्रेसियों ने हिम्मत का काम किया है। यह काम उन्हें बहुत पहले करना चाहिए था। जनता तो समझने लगी थी कि कांग्र्रेस में ऐसी प्रजाति विलुप्त हो चुकी है।

वर्ष 2005 में कांग्रेस ने युवा नेताओं को प्रशिक्षित करने के लिए चित्रकूट और गोरखपुर में मुझे शिक्षक-प्रशिक्षक के रूप में आमंत्रित किया था। उसमें राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्रीगण, सांसद, विधायक तथा सैकड़ों युवा कांग्रेसी सम्मिलित हुए थे। कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पार्टी ने उस दौरान दिए गए मेरे किसी भी सुझाव पर अमल नहीं किया, लेकिन सूत्र रूप में आज भी यही कहना चाहूंगा कि यदि कांग्रेस राजनीति में वापसी चाहती है तो उसे 1885 के स्थापना-अधिवेशन में कांग्रेसजनों और नेताओं के लिए तय किए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा।

कांग्रेस को यदि कोई बाहरी सीख देता तो नेतृत्व को बुरा लग सकता था, पर जिन्होंने अपना पूरा जीवन कांग्र्रेस को समर्पित कर दिया, यदि वे नसीहत दे रहे हैं तो उसे सकारात्मक ढंग से लेने की जरूरत है। जिस प्रकार पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट आदि को दरकिनार किया गया और अब पत्र भेजने वाले नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है, वह कांग्रेस के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है।

कांग्र्रेस नेतृत्व कुछ भी करे, पर एक बात तो साफ है कि कांग्रेस के अंदर नई कांग्रेस के अंकुर फूट चुके हैं, जिसमें सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व के लिए सीमित स्थान है। चूंकि सोनिया कुछ माह के लिए अंतरिम अध्यक्ष हैं और राहुल गांधी कांग्रेस नेतृत्व से पहले ही पलायन कर चुके हैं, इसलिए नेहरू-गांधी वंश से इतर आए किसी योग्य व्यक्ति को नेतृत्व देने का रास्ता साफ हो सकता है। कुछ कांग्र्रेसियों की अभिलाषा प्रियंका गांधी वाड्रा को नेतृत्व देने की हो सकती है, लेकिन ऐसा करना कांग्रेस के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने जैसा होगा। प्रियंका चुनावों के समय कांग्रेस के नाइट-वॉचमैन की भूमिका में आती हैं। वह इसी रूप में ठीक रहेंगी। भारतीय लोकतंत्र को संचालित करने के लिए देश को भाजपा के अलावा एक राष्ट्रीय दल और चाहिए, पर कांग्रेस के अलावा अन्य कोई दल अभी दिखाई नहीं दे रहा।

पिछले 73 वर्षों में कांग्रेस न केवल कमजोर हुई है, वरन उसमें अनेक विसंगितयां भी घर कर गई हैं। यही डर गांधी जी को था। इसी के चलते उन्होंने सुझाव दिया था कि कांग्रेस को भंग कर उसकी जगह लोकसेवक संघ की स्थापना की जाए, जिससे लोकतांत्रिक स्पर्द्धा के लिए नई-नई पार्टियों को बराबर की जमीन मिले और कांग्रेस को कोई शुरुआती लाभ न मिल सके। इसी शुरुआती लाभ ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया, क्योंकि उसे भ्रम हो गया कि वह तो अपराजेय है, जिससे उसका लगातार संगठनात्मक, विचारधारात्मक और नेतृत्वमूलक क्षरण होता गया। कांग्रेसियों को पार्टी और लोकतंत्र के हित में कांग्रेस में नवचेतना के अंकुरण के इस ऐतिहासिक क्षण को गंवाना नहीं चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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