उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर कार्यपालिका के काम में हस्तक्षेप करते हुए जहां एक ओर कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगा दी, वहीं दूसरी ओर इन कानूनों की समीक्षा के लिए एक समिति भी गठित कर दी। न्यायालय की ओर से ऐसे कदम उठाए जाने के संकेत पहले ही मिल गए थे, लेकिन इसकी उम्मीद कम थी कि वह कृषि कानूनों पर अमल को रोक देगा। यह सही है कि उच्चतम न्यायालय को इसकी जांच-परख का अधिकार है कि कोई कानून संविधानसम्मत है या नहीं, लेकिन यह ठीक नहीं कि वह किसी कानून की वैधानिकता परखे बिना उसके अमल को रोक दे। जहां तक कृषि कानूनों की समीक्षा के लिए समिति बनाने की बात है, ऐसी समिति बनाने की पेशकश सरकार ने भी की थी। किसान नेताओं ने उस पेशकश को तो ठुकराया ही, उच्चतम न्यायालय की ओर से गठित समिति को भी खारिज कर दिया। यह एक तरह से उच्चतम न्यायालय का निरादर है। बीते दिनों इस समिति के एक सदस्य भूपिंदर सिंह मान ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वह पंजाब के हितों के साथ खड़े हैं। यह वही किसान नेता हैं, जिन्होंने पिछले महीने कृषि मंत्री से मिलकर कृषि कानूनों की वकालत की थी। साफ है कि वह उस दबाव में आ गए, जो पंजाब में उनके खिलाफ बनाया गया।

लोकतंत्र में किसी संगठन या समूह का सरकार के किसी फैसले से असहमत होना बड़ी बात नहीं। असहमति को बातचीत के जरिये दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यह तभी संभव है जब असहमत समूह अडिय़ल रवैया न अपनाए। यह अडिय़लपन ही है कि किसान नेता कृषि कानूनों को वापस लेने की अपनी मांग पर अड़े हैं। किसान नेताओं की ओर से यह जो माहौल बनाया गया है कि नए कृषि कानून किसानों का अहित करने वाले हैं, उसका ही परिणाम है किसान आंदोलन। यह आंदोलन मुख्यत: इस दुष्प्रचार पर आधारित है कि किसानों की जमीनें छिन जाएंगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था खत्म कर दी जाएगी। ध्यान रहे कि एमएसपी की व्यवस्था तब शुरू की गई थी, जब देश में अन्न की कमी रहती थी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के लिए अन्न का भंडारण करना सरकार की जिम्मेदारी थी। आज न केवल अन्न के भंडार भरे रहते हैं, बल्कि किसी संकट की स्थिति में सरकार आसानी से अन्न का आयात भी कर सकती है। उसके पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भी है। पंजाब और हरियाणा के किसानों को एमएसपी इसलिए रास आती है, क्योंकि सरकारी एजेंसियां गुणवत्ता पर ध्यान दिए गए बगैर हर तरह के अनाज की खरीद कर लेती हैं। वे ज्यादातर खरीद पंजाब और हरियाणा के किसानों से करती हैं। जैसा हर सरकारी सिस्टम में होता है, एमएसपी के तहत अनाज की खरीद में भी भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया है। यह विचित्र है कि आज जब अनाज खरीद की विसंगतियों को दूर करने की आवश्यकता है, तब किसान नेता एमएसपी को कानूनी रूप देने की मांग कर रहे हैं। आखिर जो काम करने की जरूरत पिछले कई दशकों में नहीं पड़ी, उसे अब क्यों किया जाना चाहिए? हालांकि सरकार एमएसपी पर लिखित आश्वसान देने को तैयार है और यह किसी से छिपा नहीं कि उसे पीडीएस के लिए अनाज की खरीदारी करनी ही होगी, फिर भी किसानों को यह कहकर गुमराह किया जा रहा है कि सरकार एमएसपी खत्म करने की तैयारी कर रही है। चूंकि किसान आंदोलन ने तूल पकड़ लिया है इसलिए नए कृषि कानूनों में कुछ ऐसा फेरबदल किया जा सकता है कि एमएसपी के तहत पीडीएएस के लिए खरीदे जाने वाले अनाज की मात्रा तय कर दी जाए। ऐसा करते समय अनाज की पैदावार और उसकी गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

किसान नेताओं और खासकर पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं ने अपनी मांगों को मनवाना प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। अब तो इसके भी संकेत मिल रहे हैं कि वे अपनी जिद पूरी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। गणतंत्र दिवस को बाधित करने की धमकियों से यह आशंका बढ़ गई है कि किसान आंदोलन हिंसक हो सकता है। सरकार को इसे लेकर न केवल सतर्क रहना होगा, बल्कि यह भी देखना होगा कि इस मसले की आड़ लेकर विपक्ष कहीं उसे अस्थिर करने की कोशिश न करे। कांग्रेस और वाम दल किसानों को जिस तरह उकसाने में लगे हुए हैं, वह कोई शुभ संकेत नहीं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि खुद मुख्य न्यायाधीश यह कह चुके हैं कि हम अपने हाथ खून से नहीं रंगना चाहते। एक तथ्य यह भी है कि उच्चतम न्यायालय के समक्ष अटार्नी जनरल की ओर से यह कहा गया है कि किसान आंदोलन में खालिस्तानी तत्व घुसपैठ कर रहे हैं। उनकी ओर से पेश हलफनामे को देखकर उच्चतम न्यायालय को ऐसे निर्देश जारी करने चाहिए, जिससे स्थितियां नियंत्रण में बनी रहें। किसान नेता कुछ भी कहें, उनके आंदोलन में कुछ अवांछित तत्व सक्रिय दिख रहे हैं। किसान आंदोलन से उपजे हालात बेकाबू नहीं होने देने चाहिए, भले ही इसके लिए सरकार को कोई बीच का कोई रास्ता निकालना पड़े। हालात बेकाबू होने की आशंका इसलिए है, क्योंकि कुछ किसान नेताओं ने नक्सली नेताओं सरीखा अडिय़ल रवैया अपना लिया है। पहले वे सरकार की सुनने को तैयार नहीं थे, अब सुप्रीम कोर्ट की भी नहीं सुनना चाहते। हालांकि उन्हें देश भर के किसानों का समर्थन हासिल नहीं, फिर भी वे ऐसा ही जता रहे हैं। वे यह भी जाहिर कर रहे कि सरकार उनकी बातें मानने को बाध्य है।

सरकार को इसका आभास होना चाहिए कि यदि किसान आंदोलन लंबा खिंचा अथवा वह हिंसक घटनाओं से दो-चार हुआ तो उसके खिलाफ माहौल बनाने वालों का काम और आसान ही होगा। इसे देखते हुए सरकार की साख को नष्ट करने वाली रणनीति की राजनीतिक काट निकालना आवश्यक है। हो सकता है कि ऐसे किसी उपाय को विपक्ष अपनी जीत माने, लेकिन यह ध्यान रहे कि जनता यह जान रही है कि किसान नेता किस तरह मोहरा बने हुए हैं। बीच का रास्ता निकालना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि इस वर्ष पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं और अगले वर्ष उत्तर प्रदेश जैसै बड़े राज्य का विधानसभा चुनाव है। यदि किसान आंदोलन के चलते कुछ अप्रिय घटना घटित होती है तो फिर उसका असर सारे देश के किसानो पर पड़ सकता है और यह स्थिति भाजपा के राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है।

Posted By: Arvind Dubey

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