आचार्य विनोबा भावे ने 18 अप्रैल 1951 को जब पोचमपल्ली से भूदान आंदोलन की शुरुआत की थी तो वह महात्मा गांधी की सामाजिक विरासत का निर्वहन कर रहे थे। 13 वर्षों तक वह देशभर में सतत भ्रमण करते रहे। बाद के वर्षों में गांधी के राजनीतिक वारिस स्वयंभू भारत भाग्यविधाता बन गए और हमारे सामाजिक आंदोलन धीरे-धीरे नेपथ्य में चले गए। राजनीति या सत्ता ही सब कुछ नहीं है। बहुत से मसले हैं, जिनका रास्ता बगैर राजनीति के बेहतर तरीके से निकल सकता है और निकलता है। आजादी के दौर में ऐसे भी बड़े नेता रहे हैं, जिन्होंने आजादी के संघर्ष में अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई और फिर आजाद भारत की राजनीति से किनारा कर सामाजिक कार्यों की दुनिया में रम गए। आजादी के बाद जो सत्ता में आए, उन्होंने परिवर्तन या इंकलाब के उत्साह को क्रांति में तब्दील होने से रोक लिया, क्योंकि वे क्रांतियों के नेता नही थे। क्रांति की परिवर्तनकारी शक्ति का ज्वार उन्हें उठाकर न जाने कहां पटक देता। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, नानाजी देशमुख ऐसे नेताओं में थे जिन्होंने राजनीति में बेहद अहम भूमिका का निर्वहन करने के बाद अपनी क्षमताओं को सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनकारी विकासोन्मुख आंदोलन की भूमिका बनाने में लगाया। एक समय जयप्रकाश नारायण को नेहरू जी का वारिस माना गया था। नेहरू के कैबिनेट में योगदान के आमंत्रण पर उन्होंने उनके सामने 14 मांगों की सूची प्रस्तुत की जो संविधान, प्रशासन, बैंक राष्ट्रीयकरण, विधिक सुधार आदि से संबंधित थी। बात नहीं बनी। उन्होने कैबिनेट मंत्री का पद अस्वीकार कर दिया। 1954 में वह सर्वोदय आंदोलन से जुड़ गए। 1974 में इंदिरा गांधी के अधिनायकवाद के विरुद्ध संघर्ष के आपत्तिकाल में उनका पुन: पदार्पण होता है और वह देश की दूसरी आजादी के अभियान के मसीहा बने।

आचार्य नरेंद्र देव आजादी के आंदोलन में समाजवादी विचारों के प्रति अति सक्रिय भूमिका का निर्वहन करते हैं, लेकिन आजादी के बाद राजनीति से किनारा कर जाते हैं। वह शेष जीवन शिक्षा जगत से जुड़े रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आए नानाजी देशमुख भारतीय जनसंघ को उत्तर प्रदेश में स्थापित करने वाले नेताओं में से रहे। चरण सिंह, राममनोहर लोहिया, चंद्रभानु गुप्त के स्तर की राजनीतिक भूमिका का निवर्हन करने वाले नानाजी ने 1977 की जनता सरकार में कैबिनेट मंत्री बनना स्वीकार नहीं किया। 1980 में 60 वर्ष के होते ही वह सक्रिय राजनीति से बाहर होकर सामाजिक कार्यों से जुड़ गए। पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश और फिर बुंदेलखंड को उन्होंने अपनी कर्मस्थली बनाया और सामाजिक, शैक्षणिक एवं अन्य रचनात्मक कार्यों से जीवनभर जुड़े रहे। 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर के बाद गांधीजी ने राजनीति छोड़कर सामाजिक आजादी की मुहिम को प्राथमिकता दी। सामाजिक आजादी के बगैर राजनीतिक आजादी अर्थहीन है। हमारा समाज गुलाम न रहा होता तो देश की राजनीतिक गुलामी संभव नहीं थी। आखिर उन सक्षम नेताओं को सामाजिक दायित्वों का क्षेत्र आकर्षित क्यों नही कर रहा है, जो अपनी राजनीतिक पारी खेल चुके हैैं? क्या सत्ता की मृग मरीचिका ही सब कुछ है? ऐसे नेता जिन्होंने अपने समय में अपने दल को, देश को बुलंदियों तक पहुंचाया, अपनी राजनीतिक भूमिका समाप्त होने के बाद सामाजिक, धार्मिक सुधार के मुद्दों को तो उठा ही सकते हैं।

सामाजिक परिवर्तन के मोर्चे पर अभी भी वृहद आंदोलन की आवश्यकता है। यदि कोई राम के प्रति अनुराग रखता रहा है तो राजनीति के बाद राम के सामाजिक सरोकारों को तो लक्षित कर ही सकता है। भगवान राम का जीवन स्वयं में सामाजिक समन्वय का सर्वोत्तम उदाहरण है, लेकिन आखिर कितने नेता ऐसे हैं, जो वनवासियों के सामाजिक उत्थान के मुद्दों को उठा रहे हैं? कोई झारखंड, मणिपुर, गढ़चिरौली में जाकर क्यों नहीं बसा? किसी ने स्वास्थ्य, स्वच्छता की प्रधानमंत्री की पहल को दक्षिण, पूर्वोत्तर के सुदूर ग्रामों तक ले जाने का बीड़ा क्यों नहीं उठाया? जो नेता जीवन भर जिस भारतीय संस्कृति की राजनीति करते रहे, वे उसे सशक्त कर मिशनरियों के मुकाबले खड़ा करने के लिए सांस्कृतिक आंदोलन का नेतृत्व क्यों नहीं करते? देश ने तमाम नेताओं को मंत्री, कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल बनाकर सिर माथे पर बैठाया, लेकिन उन्होंने उस गरीब शोषित वर्ग को शिक्षित, जाग्रत करने के सामाजिक दायित्व को नहीं निभाया जो उनके भाषणों का मुख्य विषय हुआ करता था। आखिर ऐसे नेताओं ने अशिक्षित, कुपोषित, विभाजित, अविकसित, शोषित भारत के उत्थान हेतु क्या किया है? यहां उद्देश्य सरकारों से टकराने का नही, बल्कि सरकार की सीमाओं से आगे जाकर समाधान खोजने का है।

समाज के बहुत से क्षेत्र यथा शिक्षा, कृषि, पशुपालन, पर्यावरण, जल संरक्षण, नगरीकरण, कौशल विकास आदि में स्थानीय सामुदायिक नेतृत्व के विकास की आवश्यकता है। सामाजिक-आर्थिक दायित्वों का निर्वहन कर सकने वाले सक्षम नेतृत्व को विकसित किया जाना कितना आवश्यक है, यह आज कदम-कदम पर महसूस होता है। आज आम जनता को बैकिंग सुविधाओं, कम्प्यूटर शिक्षा, सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूक करने की बेहद आवश्यकता है, लेकिन कोई नेतृत्व देने वाला नही हैं। हमारे स्वीकार्य जननेता जब सामाजिक, सांस्कृतिक या शैक्षणिक विकास के दायित्वों की दिशा में चलेंगे, तो उनकी लोकप्रियता पुनर्जीवित होकर सामाजिक लक्ष्यों को सफलता की दिशा में बहुत दूर तक ले जाएगी। मसलन, यदि मुलायम सिंह या शरद पवार अपने क्षेत्रों में सहकारिता आंदोलन खड़ा करने का अभियान चलाएं तो ग्रामीण भारत उनका योगदान हमेशा याद रखेगा। इसी प्रकार भाजपा में सक्षम नेतृत्व का विशाल भंडार है। वह भी ऐसे ही काम कर सकता है। बात सिर्फ मन बनाने की है। सक्षम नेतृत्व का लाभ समाज को मिले तो सामाजिक परिवर्तन का मार्ग सुगम हो जाएगा। सामाजिक एकीकरण राष्ट्र की आवश्यकता है। समाज जातियों, वर्गों में विभाजित है। राजनीति विभाजन बढ़ाती जा रही है। हमने देखा है कि हमारे धार्मिक नेतृत्व ने जातिभेद के समापन की दिशा में अभी तक किसी उत्साहजनक भूमिका का निर्वहन नहीं किया है। सामाजिक एकता का कार्य न होना राष्ट्रीय एकता के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। जातियां कभी आवश्यक रही होंगी, लेकिन आज वे सामाजिक प्रगति की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं। सामाजिक एकता का यह लक्ष्य एक महान सामाजिक नेतृत्व की प्रतीक्षा कर रहा है। ऐसा नहीं कि सफलताओं की कहानियां नहीं हैं। जलपुरुष कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह आज जल संरक्षण एवं नदियों के पुनर्जीवन का चेहरा बन चुके है। अनिल जोशी हिमालयी पर्यावरण विकास के प्रतीक हैं। अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध सफल आंदोलन का संचालन किया है, लेकिन हमारे पास राजनीति छोड़कर सामाजिक क्षेत्र में आया कोई नाम नहीं है। अपने समय में राजनीति में विराट व्यक्तित्व रखने वाले आज यदि सामाजिक एकीकरण की मुहिम में अपने को समर्पित करें तो यह सेवा बहुत बड़ी होगी। आखिर सामाजिक बराबरी और समरसता के लक्ष्य तक पहुंचने का दायित्व किसके हवाले है? क्या यह आजादी का एजेंडा नहीं था? अपनी राजनीतिक पारी के बाद भी राजनीति से लौ लगाए बैठे नेताओं को चाहिए कि वे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन के आंदोलन के सारथी बनें।

(लेखक पूर्व सैनिक व पूर्व प्रशासक हैं)