हाल ही में क्रिकेट का एक किस्सा चर्चा में आया। मप्र के जलज सक्सेना को बीसीसीआई ने पिछले चार वर्षों में तीसरी बार देश का सर्वश्रेष्ठ हरफनमौला खिलाड़ी चुना, लेकिन चयनकर्ताओं को अब तक जलज में टीम इंडिया का हिस्सा बनने जैसी प्रतिभा नहीं दिखाई दी!

परिश्रम और प्रतिभा सफल हो जाए, यह दावे से इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसके बाद भी बहुत से किस्से-कहानियां और नियमकायदे बताए-सुनाए जाते हैं। इसी दौरान खेल से जुड़ी दो उपलब्धियां भी सामने आई हैं। पहली - मणिपुर से।

यहां देश का पहला खेल विश्वविद्यालय खोलने की मंजूरी मिल गई है। छह दिन पहले ही राष्ट्रपति की इस घोषणा ने देशभर के खिलाड़ियों में नई उम्मीद जगाई है। दूसरी - मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले से। यहां 'रम्वानु चालो" एक अभियान की तरह गति पकड़ रहा है।

रम्वानु चालो, मतलब खेलने चलो। दो राज्यों में चल रही इन कोशिशों को खेल-खिलाड़ियों के बेहतर होते आज-कल से जोड़कर देखा जा सकता है! दरअसल, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में मप्र की भागीदारी बहुत ज्यादा नहीं रही। बावजूद इसकेयहां की जड़ों-जमीन से कुछ खेल बड़ी शिद्दत से जुड़े हुए हैं।

हॉकी, कुश्ती और क्रिकेट के सहारे अलग-अलग दौर में मप्र ने नाम कमाया, विदेशी धरती पर पदक-प्रतिष्ठा भी मिली, लेकिन उस जीत को स्थायी बनाए रखने के लिए कोई फॉर्मूला नहीं गढ़ा गया! यही वजह रही कि इन खेलों में प्रदेश कभी चमकता रहा, कभी फीका पड़ गया!

तो क्या मप्र में खेल प्रतिभाएं नहीं हैं? नहीं, ऐसा बिलकुल भी नहीं है! सच यह है कि प्रदेश ने ही उन्हें संभालने-संवारने में देर कर दी! जबलपुर में तीरंदाजी अकादमी के खिलाड़ियों को मिले मेडल देखकर तो यही लगता है।

केवल दो साल में ही इस अकादमी के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 07 स्वर्ण (दो अंतरराष्ट्रीय-पांच राष्ट्रीय स्तर) और लगभग 12 रजत-कांस्य पदक जीते हैं! खेल मैदान पर डटे 'दुश्मनों" को हराने के लिए सेना छोड़कर अकादमी में आए मुख्य तकनीकी सलाहकार और कोच रिछपाल सिंह के प्रशिक्षण ने प्रदेश को मुस्कान किरार जैसी खिलाड़ी दी है।

दो साल पहले तक जिसे न तो तीरंदाजी की कोई खास जानकारी थी और न ही विशेष लगाव, उस स्कूली छात्रा ने पिछले महीने तुर्की के अंटालिया में आयोजित वर्ल्ड कप (स्टेज-02) में न सिर्फ भारत का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि रजत पदक भी जीता।

यह पहला मौका था जब मप्र से किसी लड़की ने तीरंदाजी में यह खिताब हासिल किया। मुस्कान ही नहीं, शिवांश अवस्थी, अमित यादव, प्रीतेश चौधरी और यशश्री उपाध्याय जैसे कम से कम 25 खिलाड़ी तीरंदाजी के जरिए लक्ष्य भेद रहे हैं! यदि दो साल के प्रशिक्षण-समर्पण में यह बदलाव है तो सोचिए, सालों- साल की साधना का फल कैसा होगा?

पूछा तो यह भी जाना चाहिए कि इस 'नए खेल" की ओर अब तक मध्य प्रदेश का ध्यान क्यों नहीं गया था? हालांकि इसे नया खेल कहना भी सही नहीं है क्योंकि मप्र के आदिवासी बहुल इलाकों में तीरंदाजी वर्षों से जीवन का हिस्सा है।

गलती यह है कि हमने उसे कभी ताकत के तौर पर देखा ही नहीं। इसी कमी को पाटने में जुटे राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी और झाबुआ के खेल अधिकारी जलज चतुर्वेदी कहते हैं - 'आदिवासी क्षेत्रों के बच्चे तीरंदाजी, लंबी दौड़ व कराते जैसे खेलों में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, इसीलिए अब यह प्रयास शुरू हुआ है। हालांकि सबसे बेहतर तीरंदाजी ही है।

तभी प्रदेश में तीन फीडर सेंटर बनाए गए हैं - झाबुआ, मंडला और भोपाल। इन तीनों स्थानों से खिलाड़ियों का चयन कर जबलपुर की तीरंदाजी अकादमी में प्रशिक्षण दिया जा रहा है।" लेकिन, चिंता बढ़ाती चुनौतियां भी साथ हैं। यदि प्रदेश के 51 में से केवल एक, झाबुआ जिले की ही बात की जाए तो 2551 सरकारी स्कूलों में से मात्र 35 में ही खेल शिक्षक (पीटीआई) हैं! कोई नहीं है, इसलिए फिलहाल सामान्य शिक्षकों को प्रशिक्षित कर भावी खिलाड़ियों को पहचानने का काम किया जा रहा है।

स्वाभाविक है अपेक्षित परिणाम तो नहीं मिलेंगे लेकिन एक अच्छी शुरुआत जरूर की गई है। सीहोर स्थित प्रदेश के एकमात्र आवासीय खेल विद्यालय के प्राचार्य आलोक शर्मा भी मानते हैं कि मप्र में काफी संभावनाएं हैं। पिछले एक साल में 10वीं से 12वीं तक पढ़ने वाले 115 विद्यार्थियों में से 13 राष्ट्रीय व 35 राज्य स्तरीय पुरस्कार जीत चुके हैं।

वे कहते हैं - 'प्रदेश को अच्छे खिलाड़ी चाहिए तो अच्छे प्रशिक्षक व बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करना होगा। 50 फीसदी क्षमता है तो 50 प्रतिशत प्रशिक्षण भी जरूरी है।" खेल-खिलाड़ियों पर करीब से नजर रखने वाले विशेषज्ञों का सुझाव है कि देश में हर खेल के लिए 'कोचिंग-पॉलिसी" बनाई जाना चाहिए।

क्योंकि, कई राज्य अलग-अलग क्षेत्रों में काफी कुछ अच्छा भी कर रहे हैं। जैसे महाराष्ट्र में खेल अकादमी के साथ 'खेल- स्कूल" खोले गए हैं। यहां बच्चे खेल के साथ पढ़ाई भी करते हैं! मध्य प्रदेश में भी 18 खेल अकादमियां हैं। उम्मीद की जाना चाहिए कि परंपरा निभा रहा प्रदेश का खेल प्रबंधन नए प्रयोगों के साथ नई शुरुआत करेगा!

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