आगामी 10 जुलाई को नई सरकार का पहला आम बजट पेश करने जा रहे वित्त मंत्री अरुण जेटली के सिर पर फिलवक्त तलवार की तरह दो सवाल लटके हुए हैं और विडंबना यह है कि उनका जवाब न तो उनके पास है और न ही किसी और के पास। जबकि हकीकत यह है कि इन सवालों के जवाबों के आधार पर ही आगामी आठ माह तक बजट का आकलन किया जाता रहेगा। पहला सवाल है, इस साल देश में मानसून की स्थिति कैसी रहेगी? और दूसरा सवाल है, इराक संकट के चलते तेल की कीमतें किस हद तक उछलेंगी?

वर्ष 1996, 2004 और 2009 में बनने वाली सभी नई सरकारों के सामने यही समस्या थी कि वे अपने पहले बजट के माध्यम से अपनी साख कैसे बनाएं। जुलाई 1991 में पेश किए गए बजट को यहां अपवाद माना जा सकता है। प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के नेतृत्व में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा पेश किए गए इस बजट के बाद ही देश में लाइसेंस राज का समापन हुआ और आर्थिक उदारीकरण के दौर की शुरुआत हुई। उस समय यह स्थिति निर्मित हो गई थी कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो गया था। देश में निर्मित राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति (वीपी सिंह और चंद्रशेखर की अल्पकालिक सरकारें और राजीव गांधी की हत्या) के कारण अप्रवासी भारतीयों ने अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया था और देश के पास महज इतना ही विदेशी मुद्रा भंडार शेष रह गया था, जिससे 15 दिनों तक देश की आयात की जरूरतें पूरी की जा सकें।

निश्चित ही, तब से अब तक के 23 सालों में बहुत कुछ बदल चुका है और अब हमारी स्थिति इससे कहीं बेहतर है। लेकिन इसके बावजूद हम आज देश के सामने मुंह बाए खड़ी आर्थिक चुनौतियों को हलके में नहीं ले सकते। आज सबसे बड़ी चुनौती तो कमजोर मानसून की है। देश की 60 फीसद कृषि-भूमि की सिंचाई नहीं हो सकी है। इसका यह मतलब है कि यदि इस साल औसत से कम या अनियमित वर्षा हुई तो इससे निर्मित होने वाली सूखे की स्थिति का सीधा असर खाद्य सामग्रियों की कीमतों पर पड़ेगा। प्याज की कीमतों में उछाल से शायद इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। आज देश की जीडीपी में कृषि का योगदान भले ही 15 फीसद से भी कम हो, लेकिन देश की लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। यही कारण है कि आज देश के वित्त मंत्री से लेकर एक मामूली किसान तक, सभी इंद्रदेव के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं।

चिंता की दूसरी वजह का नाता विदेशी मुद्रा की आवक और जावक से है और यह देश के चालू खाते के घाटे को और बढ़ा सकती है। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि मानसून की ही तरह इस दूसरी वजह पर भी किसी का नियंत्रण नहीं है। यह है कच्चे तेल की कीमतें। इस मामले में भारत की स्थिति इसलिए भी चिंतनीय है क्योंकि आज वह अपनी कुल जरूरत के लगभग 80 फीसद कच्चे तेल का आयात करने पर मजबूर है। भारत के कुल आयात का एक-तिहाई हिस्सा तेल आयात से जुड़ा है। साथ ही समूची दुनिया की एक-तिहाई तेल जरूरतें पश्चिम एशिया में स्थित खाड़ी क्षेत्र पूरी करता है। इराक में जारी गृहयुद्ध के हाल-फिलहाल में खत्म होने की कोई संभावनाएं नजर नहीं आ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें पहले ही उछलकर 115 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। यदि इराक-संकट इसी तरह जारी रहा, तो कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता कि दुनिया में तेल की कीमतें कहां जाकर थमेंगी।

भारत इस मायने में तनिक भाग्यशाली रहा है कि हाल के सालों में कच्चे तेल की कीमतों में ज्यादा इजाफा नहीं हुआ है। यही कारण था कि सरकार पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण-मुक्त कर सकी और हाल के महीनों में हाईस्पीड डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी कर सकी। कुछ हफ्ते पहले तक ऐसा लगता था कि यदि भारत के इस सर्वाधिक उपयोग किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पाद (डीजल) की कीमतों में एक या दो रुपए की बढ़ोतरी होती है तो वह कमोबेश अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुरूप हो जाएगा। लेकिन अब जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, डीजल पर सबसिडी में कटौती करने की सरकार की योजना निकट भविष्य में साकार होती नजर नहीं आ रही।

सरकार ने प्राकृतिक गैस की कीमतों में बढ़ोतरी करने के अपने फैसले को भी तीन माह के लिए मुल्तवी कर दिया है। इसका यह मतलब है कि बिजली उत्पादन के साथ ही उर्वरकों के उत्पादन पर भी सबसिडी बढ़ सकती है। जेटली को अपने बजट के गणित में इन तमाम बातों का समावेश करना होगा। साथ ही यदि वे सार्वजनिक क्षेत्र की ऑइल मार्केटिंग एवं रिफाइनिंग कंपनियों और उर्वरक कंपनियों को मुहैया कराई जाने वाली सबसिडी को मुल्तवी करने की पिछली सरकार की प्रवृत्ति को समाप्त करना चाहते हैं तो उनके लिए वित्तीय घाटे पर लगाम लगाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

यही कारण है कि वित्त मंत्री के सामने विकल्प बहुत कम हैं और गुंजाइशें बहुत सीमित।

(लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)