आशीष व्यास

'प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है। प्रजा के हित में उसे अपना हित दिखना चाहिए। जो स्वयं को प्रिय लगे, उसमें राजा का हित नहीं है। उसका हित तो प्रजा को प्रिय लगे उसमें है।' - अर्थशास्त्री कौटिल्य के संस्कार-सरोकार और सार्थक संदेश को स्वीकार करते हुए शुरू हुई मप्र के बजट की रूपरेखा अंतत: किसानों पर ही केंद्रित रही। या, यूं भी कह सकते हैं कि किसानों के जरिए राजनीतिक वनवास समाप्त करने वाली कमलनाथ सरकार अपने पहले बजट में किसानों का कर्ज चुकाते हुए नजर आई। गांव-गरीब-किसान कल्याण को यदि कृषि के माध्यम से परखने का प्रयास करें तो 22 हजार 736 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान सरकार की दिशा और गति को स्पष्ट करता है। वैसे भी पूरे प्रदेश में मेघ अमृत की बूंदें बरसा रहे हैं। हरियाली सम्मोहन का मंत्र सिद्ध कर रही है। धरती अन्न्पूर्णा होने की तैयारी में है। सावन दस्तक दे रहा है। वित्त मंत्री तरुण भनोत का पहला बजट भी इसी तरह की अनुभूतियों से भरा है। आर्थिक संकट के ग्रीष्मकाल के बाद बादल आल्हाद की वर्षा कर रहे हैं। इसी तरह इस बजट में न नए करों की बिजली कड़क रही है, न निराशा के तूफान उम्मीदों के पेड़ गिरा रहे हैं। इस मानसून को देखकर कोई भी यह आशंका व्यक्त नहीं कर सकता कि आगे चलकर फसल सूखे की शिकार होगी! उम्मीद इतनी है कि सागर (बकौल वित्तमंत्री-केंद्र ने प्रदेश को दिए जाने वाले बजट में 2700 करोड़ रुपए की कटौती की है) ने पानी देने से इनकार कर दिया है, फिर भी मेघ हैं कि बरसने पर आमादा हैं!

कांग्रेस के वचन-पत्र और एक दिन पहले आए आर्थिक सर्वे की पृष्ठभूमि में इस बजट को समझा जाए तो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में प्रदेश की हालत शर्मनाक रूप से खराब है, उसे सुधारने की दिशा में सरकार एक-एक कदम आगे बढ़ना चाहती है। लेकिन, यह सुधार कहां और कैसे होगा, यह समझने में श्रम करना होगा! प्राथमिक शिक्षा के लिए बजट तो निर्धारित किया गया, लेकिन सरकारी स्कूलों में योग्य शिक्षकों की कमी कैसे पूरी हो, निजी स्कूलों के शिकंजे में पल-बढ़ रही जेब काटती शिक्षा, कैसे गरीबों का अधिकार बने- यह प्रश्न इस सरकार में भी अनुत्तरित है। प्राथमिक शिक्षा की तरह ही उच्च शिक्षा भी धीरे-धीरे निजी हाथों की तरफ बढ़ रही है और गरीबों की पहुंच से दूर हो रही है। सरकारी विश्वविद्यालयों में संसाधनों की कमी भी सदा बनी रहती है। तीन नए विश्वविद्यालय खुलेंगे, लेकिन उनमें से एक छिंदवाड़ा में होगा- क्यों, का जवाब सभी को पता है। लेकिन, शिक्षा जगत को आश्वस्ति तब मिलेगी, जब यह विवि उच्च शिक्षा का 'छिंदवाड़ा मॉडल" बनकर देश-दुनिया में नाम कमाए। इसी तरह ग्वालियर में खुलने वाले डेयरी और फूड प्रोसेसिंग कॉलेज भी दूसरे शिक्षा केंद्रों की तरह केवल डिग्री बांटने वाले संस्थान भर न रह जाएं। चिकित्सकों की भर्ती तो हो जाएगी, लेकिन सरकार उन्हें ऐसे गांवों में कैसे लेकर जाएगी, जो कुपोषण की सूची में प्रदेश को सबसे ऊपर रखे हुए हैं! योग्य चिकित्सक निजी प्रैक्टिस और निजी अस्पतालों में सेवाएं देना चाहते हैं, सरकार उन्हें कैसे अपने मिशन में शामिल करेगी?

एक बात तो साफ है- युवाओं को रोजगार अपने पुरुषार्थ से ही हासिल होगा। व्यापार-व्यवसाय के जरिए ही वह अपनी उष्मा-ऊर्जा को उर्ध्वगामी बना सकता है। सरकार केवल नए क्षेत्रों के दरवाजे खोलकर तरुणाई की मदद करेगी। चंदेरी और महेश्वर की साड़ियां, धार का बाग प्रिंट कपड़ा, भोपाल के बटुए, छतरपुर-टीकमगढ़ के पीतल उत्पाद, रतलामी सेंव, मुरैना की गजक, सागर की चिरौंजी बर्फी, बुंदेलखंड की मावा जलेबी और मालवा के चूरमा-लड्डू और बाटी, बनाना आपको ही पड़ेगी, सरकार इमेज बिल्डिंग-ब्रांडिंग करके अपने वादे पूरे करेगी!

उद्योगपति मुख्यमंत्री की लघु उद्योगों की चिंता बहुतेरे लोगों को सुकून जरूर देगी। गायों और पुजारियों पर वित्त मंत्री की कृपा-दृष्टि से वैचारिक खूंटे से बंधे लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि यह कमल की सरकार है या कमलनाथ की, लेकिन यह कांग्रेस का हिंदुत्व प्रेम और केसरिया काट है! और, धर्म निरपेक्षता इस तरह से है कि हज कमेटियों को भी अनुदान मिलेगा। भाजपा सरकार जिस तरह इंदौर में उद्योगपतियों को बुलाकर निवेश का निवेदन करती थी, वैसा ही नई सरकार भी करेगी। लेकिन, औद्योगिक विकास की इच्छा-अपेक्षा के साथ पुराने प्रश्न फिर नए उत्तरों की तलाश करेंगे कि ये वचन-वादे कागजों से जमीन तक जाने में कितना समय लेंगे? तीन शहरों से हवाई सफर शुरू करने का प्रस्ताव भी लुभाता है, लेकिन केंद्र इसे कितनी गंभीरता से लेता है, यह भविष्य के राजनीतिक समन्वय पर निर्भर करेगा!

बहरहाल, नए बजट में नई सरकार के सपने सुहाने हैं, यह व्यावहारिक धरातल पकड़े, तो कुछ बात बने! यह मानसून की पकी फसल को घर तक पहुंचाए, तो मायूस चेहरों को कुछ मुस्कान मिले।