कुछ साल पहले की बात है, जब पिछली सरकार में एक मंत्री से मैंने पूछा कि शिक्षा के लिए आपका क्या दृष्टिकोण है? उन्होंने जवाब दिया कि हम ज्यादा से ज्यादा स्कूल खोलेंगे। उनकी बात को बीच में रोकते हुए मैंने कहा कि क्या अधिक स्कूल खोलने से मस्तिष्क के कपाट भी खोले जा सकेंगे? इसी संवाद ने उस नई शिक्षा नीति के बीज बो दिए, जो बीते दिनों सामने आई। जब मैं प्रकांड विद्वान प्रो. मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में भाजपा का चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने की कवायद से जुड़ा था, तो हमने इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. जोशी चूंकि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री भी रह चुके थे, इसलिए इस मामले में उनका नजरिया एकदम स्पष्ट था। उनका मानना था कि कोठारी आयोग के बाद हमने शिक्षा नीति को समग्रता से नहीं देखा। ऐसे में हालिया घटनाक्रमों का उचित विश्लेषण कर हमें नई शिक्षा नीति तैयार करनी चाहिए। इस प्रकार चुनाव में नई शिक्षा नीति का वादा किया गया, जो अब पूरा भी हो गया।

वर्ष 1986 में आई नीति के करीब साढ़े तीन दशक बाद देश को नई शिक्षा नीति मिली है। यह नीति शीर्ष नेतृत्व के दृढ़-संकल्प और एक भागीरथ प्रयास का परिणाम है। यह भारत को विश्व शक्ति बनाने की राह पर ले जाएगी और उसकी बुनियाद ज्ञान पर आधारित होगी। यह नीति शैक्षणिक ढांचे में व्यापक बदलाव करने वाली है। शिक्षा में गवर्नेंस, डिलीवरी और उसके वित्त-पोषण के लिहाज से यह पारिभाषिक, संस्थागत ढांचे से लेकर परिचालन के स्तर तक परिवर्तन एवं कायाकल्प करने वाली है।

जहां तक प्रभाव के दृष्टिकोण से बड़े बदलाव की बात है, तो मुझे सबसे अहम पहलू यही लगता है कि हमने शिक्षा में ठहराव को समाप्त किया है। नई नीति व्यावसायिक शिक्षा के साथ ही सहगामी पाठ्यक्रम के लिए आधार तैयार करती है। इतना ही नहीं कला, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान में विकल्पों की भरमार के साथ ही क्रेडिट ट्रांसफर के साथ ही मल्टीपल एंट्री और एग्जिट की पेशकश भी करती है। यानी छात्रों को पाठ्यक्रम बदलने की सुविधा मिलेगी और उसमें पिछले पाठ्यक्रम में की गई उनकी मेहनत जाया भी नहीं होगी। नई शिक्षा नीति में नए दौर के कौशल सिखाने को भी शामिल किया गया है। मिसाल के तौर पर मिडिल स्कूल में कोडिंग को एक भाषा के रूप में शामिल करने से नई पीढ़ी की रचनात्मक संभावनाओं को नए पंख लगेंगे। रचनात्मक सोच, तर्कशक्ति निर्णयन और नवाचार को शामिल कर भारतीय शिक्षा दुनिया में संभवत: सबसे बेहतरीन व्यवस्था की पांत में शामिल हो जाएगी।

नई शिक्षा नीति में स्वतंत्रता और लचीलेपन का भी उचित समावेश है। पाठ्यक्रम निर्माण और क्रियान्वयन के लिए इसमें संस्थानों और अकादमिक वर्ग को अधिक छूट दी गई है। मान्यता प्राप्त कॉलेज प्रणाली अब अतीत की बात हो जाएगी। शिक्षकों को अपने हिसाब से पढ़ाने की आजादी होगी। अध्ययन के तौर-तरीके भी ऐसे अनुभव आधारित ही अधिक होंगे, जिससे सीखने की प्रक्रिया में सहभागिता बढ़ेगी। इससे अध्ययन सामग्री को रटने के बजाय वास्तव में ज्ञान का हस्तांतरण अधिक प्रभावी रूप में संभव हो सकेगा। स्वमूल्यांकन के साथ व्यापक एवं वृहद रिपोर्ट कार्ड छात्रों को गहन आत्म-विश्लेषण की ओर अग्रसर कर उनके भीतर व्यापक बदलावों का आधार बनेगा। दिग्गजों के प्रेरक वीडियो न केवल बच्चों पर से पढ़ाई का बोझ घटाएंगे, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े आदर्श व्यक्तित्वों के जरिये उन्हें प्रेरणा भी मिलेगी। नई शिक्षा नीति को हमने लचीला तो बनाया है, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया है कि उससे कोई समझौता न हो।

चाहे स्कूली शिक्षा हो या कोई डिग्री, उसे हासिल करने के बाद विद्यार्थी की सक्षमता बढ़नी चाहिए। इसीलिए मिडिल स्कूल में व्यावसायिक शिक्षा का प्रावधान किया गया है। इसका तात्पर्य यह है कि हम विभिन्न् क्षेत्रों में कौशल संवर्द्धन और क्षमता निर्माण को ध्यान में रखते हुए शिक्षा को प्रासंगिक बना रहे हैं। इसके माध्यम से कौशल अर्जित करने के बाद कोई पढ़ाई के दौरान कमाई भी करने में सक्षम हो सकेगा। सक्षमता आकलन से शिक्षा और सार्थक बनेगी। साथ ही मौजूदा सैद्धांतिक शिक्षा ढांचे के कारण अधबीच में ही पढ़ाई छोड़ने वालों की समस्या का भी समाधान होगा। दो वर्षीय डिप्लोमा, दीर्घावधिक डिग्री कोर्स, एकेडमिक क्रेडिट बैंक और क्रेडिट स्कोर के साथ एमओओएस यानी मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेज जैसे नवाचारी कदम इसीलिए उठाए गए हैं।

सरकारी एवं निजी संस्थानों के लिए एकसमान मानक सुनिश्चित करने से हम बेहतर नतीजों की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि अब सभी के लिए मैदान एकसमान होगा। शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया में परिवर्तन, उनके कार्यकाल की निगरानी और शिक्षकों के लिए उपलब्ध प्रशासनिक दायित्वों की व्यवस्था ऐसे क्रांतिकारी बदलाव हैं, जो अच्छी प्रतिभाओं को अकादमिक जगत की ओर आकर्षित करेंगे।

जहां तक अवसंरचना के पैमाने की बात है तो प्रत्येक जिले में उच्च शिक्षा संस्थानों और डिजिटल शिक्षा वाली क्लस्टरिंग अप्रोच के साथ जिला स्तर पर आत्मनिर्भरता जिलों और तहसील-तालुका के बीच मौजूदा खाई की भरपाई करने का काम करेगी। विज्ञान, गणित और कला का मिश्रण छात्रों में उत्सुकता का भाव इतना बढ़ा देगा कि इससे आजीवन सीखने की तत्परता बढ़ेगी। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन शोध-अनुसंधान को एक नया क्षितिज देगा। साथ ही किसी संस्थान के संचालन में पूर्व छात्रों की भूमिका भी शैक्षणिक तंत्र को समग्र एवं सकारात्मक रूप में प्रभावित करेगी।

मैं हमेशा से नौकरशाही को शिक्षा से दूर रखने के विचार का हिमायती रहा हूं और मुझे खुशी है कि नई शिक्षा नीति में भारतीय शिक्षा सेवा यानी आइईएस को दूर रखने के विचार को मान लिया गया है। वर्ष 1966 से प्रत्येक समिति ने इसकी सिफारिश की। इस विचार पर प्रहार आसान नहीं था, लेकिन मुझे खुशी है कि इसमें सफलता मिली। नई शिक्षा नीति के उम्दा विचार को वास्तविकता में बदलने के लिए हमें नौकरशाही के स्तर पर आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने की दरकार होगी। भारत के शैक्षणिक तंत्र में नई शिक्षा नीति निश्चित रूप से एक ऊंची छलांग है। हालांकि काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे किस रूप में लेकर कैसे लागू किया जाता है? कुल मिलाकर जब एक अभिभावक के रूप में मैं इस नीति पर नजर डालता हूं तो उत्साह एवं उल्लास महसूस करता हूं। आयुष्मान भारत के जरिये एक स्वस्थ भारत की सशक्त बुनियाद रखने के बाद पीएम मोदी ने शिक्षा के अगले मोर्चे को बखूबी साधने का काम किया है, जो आत्मनिर्भर भारत के लिए एक आधार और आश्वासन है।

(लोक नीति विशेषज्ञ लेखक राष्ट्रीय शिक्षा नीति समिति के सदस्य भी रहे हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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