विक्रम सिंह

पिछले दिनों बिहार के मुंगेर जिले में प्रतिमा विसर्जन के पूर्व हिंसा का जो तांडव हुआ, वह अप्रत्याशित था। लोगों पर पुलिस का बल प्रयोग पूर्णतया अवांछित था। बताया जाता है कि पुलिस कॢमयों ने आयोजकों से यह आग्रह किया गया था कि वे डीजे, लाउडस्पीकर आदि न बजाएं, क्योंकि निर्वाचन के दौरान इन सब चीजों पर प्रतिबंध रहता है। आयोजकों ने भी पुलिस-प्रशासन की बात मानते हुए उनका इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने परंपरा के विपरीत सादगी के साथ मूॢत विसर्जन का निर्णय लिया। शासन-प्रशासन यह चाहता था कि निर्वाचन प्रक्रिया के चलते प्रतिमा विसर्जन का काम जल्द से जल्द हो। लिहाजा शहर के दीन दयाल चौक के पास आयोजकों से दुर्गा प्रतिमा आगे ले जाने के लिए अनुरोध किया गया। यह रात लगभग 11 बजे की बात है। इस पर आयोजकों ने कहा कि पहले बड़ी दुर्गा माता की प्रतिमा का विसर्जन होगा, उसके बाद ही वे आगे बढ़ेंगे। तब तक वहां किसी प्रकार का कोई तनाव नहीं था, लेकिन किसी बात को लेकर दोनों में वाद-विवाद हुआ, फिर पुलिस द्वारा पहले लाठीचार्ज हुआ और उसके बाद गोली चली। पुलिस का कहना है कि गोली उपद्रवियों की ओर से चलाई गई, परंतु सीआइएसएफ के अनुसार गोली स्थानीय पुलिस की ओर से चली। एक कांस्टेबल की तरफ से 13 राउंड फायरिंग की गई, जिसमें एक युवक की जान चली गई।

यह संतोष का विषय है कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक लिपि सिंह और जिलाधिकारी का स्थानांतरण हो गया और नए अधिकारियों ने अपना काम संभाल लिया, लेकिन यदि इस दुखद घटना की समीक्षा की जाए तो कह सकते हैं कि इससे बचा जा सकता था। वास्तव में प्रत्येक थाने में एक त्योहार रजिस्टर होता है। उसमें हर त्योहार का लेखाजोखा होता है कि किस मार्ग से अनुमानित लोग जाएंगे? मार्ग में कोई अवरोध होगा या नहीं और अगर होगा तो उसका निस्तारण कैसे किया जाएगा? जुलूस के मध्य और आगे -पीछे किस प्रकार पुलिस बल की नियुक्ति की जाएगी? वायरलेस स्टेशन कहां-कहां रहेंगे आदि का खाका पहले से ही तैयार कर लिया जाता है। इस प्रकार एक अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था के अनुरूप ही देश भर में इस प्रकार के जुलूस निकाले जाते हैं, परंतु मुंगेर में जिस प्रकार की त्रुटिपूर्ण पुलिस व्यवस्था दृष्टिगोचर हुई, उससे स्पष्ट है कि कदाचित त्योहार रजिस्टर और पुलिस के पूर्वाभ्यास में कहीं कोई त्रुटि अवश्य थी, जिसके कारण इस प्रकार की दुखद घटना घटित हुई। दुर्भाग्य से अब इस पूर्वाभ्यास की कमी हर जगह दिखने लगी है और इसके दुष्परिणाम भी रह-रह कर सामने आने लगे हैं।

सवाल है कि पुलिस को गोली चलाने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? गोली चलाने के पहले कई बार चेतावनी दी जाती है। चेतावनी के बाद आंसू गैस का प्रयोग होता है। अगर भीड़ तब भी तितर-बितर नहीं होती तो पुन: चेतावनी दी जाती है और वाटर कैनन आदि का इस्तेमाल किया जाता है। अगर इससे भी भीड़ नहीं हटती तो पुन? चेतावनी दी जाती है और लाठी चार्ज किया जाता है। लाठी चार्ज में भी इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कमर के नीचे प्रहार किया जाए, जिससे प्रदर्शनकारियों के सिर, सीने आदि पर चोट न लगे। यदि तब भी भीड़ नियंत्रित नहीं होती है तो पुन: तीन बार चेतावनी देकर रबर बुलेट से फायरिंग की जाती है। इसके उपरांत पुन: तीन बार चेतावनी देकर फायरिंग की जाती है। इसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि फायरिंग कौन अधिकारी या कर्मचारी करेगा, कितने राउंड करेगा और कमर के नीचे फायरिंग की जाएगी। यहां तो ऐसा प्रतीत होता है कि लाठीचार्ज और गोली चलाने का निर्देश एकसाथ दिया गया।

मुंगेर की घटना की जांच के लिए आयुक्त की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया गया है। इस जांच का आदेश निर्वाचन आयोग द्वारा किया गया है, लेकिन खेद का विषय है कि अधिकारियों के स्थानांतरण और जांच के आदेश विलंब से हुए, जो कि तत्काल हो जाने चाहिए थे। इस घटना पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी जोर-शोर से चल पड़ा। विरोधी दलों ने यह कहना शुरू कर दिया कि सत्तारूढ़ दल के शीर्ष स्तर से गोली चलाने के आदेश दिए गए, लेकिन यह अत्यंत भ्रामक और मिथ्या आरोप है, क्योंकि गोली चलाने या उपयुक्त बल प्रयोग करने का अंतिम निर्णय घटनास्थल पर मौजूद वरिष्ठतम मजिस्ट्रेट या वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी का होता है। इसमें अन्य किसी के हस्तक्षेप का न तो कोई औचित्य है, न ही आवश्यकता। राहत की बात है कि मुंगेर में स्थिति नियंत्रण में आ गई, लेकिन पूरे घटनाक्रम में पुलिस से जो त्रुटि हुई है उससे कई सवाल उठते हैं। यदि त्योहार रजिस्टर और अन्य स्थानीय अभिसूचनाओं के आधार पर स्थानीय पुलिस द्वारा एक वृहद पूर्वाभ्यास कर लिया जाए, कर्मचारियों-अधिकारियों को पूर्वाभ्यास के बाद भलीभांति प्रशिक्षित कर दिया जाए तथा बल प्रयोग एवं उसके संबंध में वांछित प्रक्रिया से सभी को अवगत कराया जाए और दंगा नियंत्रण योजना के अंतर्गत की जाने वाली कार्रवाई के अनुरूप ही न्यूनतम बल प्रयोग सुनिश्चित किया जाए तो कदाचित जो मुंगेर में हुआ, वही नहीं होता। इस घटना से न केवल बिहार को, बल्कि पूरे देश के पुलिस-प्रशासन को सीख लेने की जरूरत है। पुलिस से यदि कोई गलत निर्णय हो गया है तो उसे स्वीकार करने में कोई हानि नहीं है, बल्कि उसे छिपाने और अपनी गलतियों पर परदा डालकर उसकी जिम्मेदारी किसी और पर मढऩे से स्थिति और खराब ही होती है। इससे लोगों की नजरों में शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता कम होती है। उम्मीद है कि भविष्य में इस घटना को लेकर एक श्वेत पत्र जारी किया जाएगा और समस्त पुलिस बलों और पुलिस महानिदेशकों को इससे अवगत कराते हुए यह अपेक्षा की जाएगी कि मुंगेर में जो भूल हुई, उसकी पुनरावृत्ति न हो।

(लेखक उत्तर प्रदेश के डीजीपी रहे हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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