जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित एक जनहित याचिका का जवाब देते हुए बीते दिनों केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि परिवार नियोजन के लिए देश में लोगों को विवश नहीं किया जा सकता। केंद्र के इस उत्तर पर उन लोगों को निराशा हुई जो एक लंबे अर्से से जनसंख्या नियंत्रण कानून बनने की प्रतीक्षा कर रहे थे। यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून की जरूरत क्यों है? जबकि विगत कुछ वर्षों के आंकड़े दर्शा रहे हैैं कि जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई है। दरअसल जनसंख्या के संतुलित आकार का सीधा संबंध देश के विकास से जुड़ा है। ऐसे में यह गंभीर चिंतन और मनन का विषय है कि भारत में जनसंख्या का आकार क्या होना चाहिए जिससे सामाजिक-आॢथक उन्नति की तमाम बाधाएं पार की जा सकें। यह सर्वविदित है कि जनसंख्या की निरंतर बढ़ोतरी के चलते सरकार के अधिकतम प्रयासों के बावजूद भी नागरिकों को न्यूनतम जीवन गुणवत्ता प्रदान कर पाना संभव नहीं हो पा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के आॢथक और सामाजिक मामलों के विभाग के अंतर्गत जनसंख्या प्रकोष्ठ ने 'द वल्र्ड पॉपुलेशन प्रोस्पेक्ट्स : द 2017 रिवीजनÓ रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि भारत की आबादी 2025 तक चीन से आगे निकल जाएगी। यह चिंता का विषय इसलिए है कि हमारे पास कृषि योग्य भूमि दुनिया की लगभग दो प्रतिशत और पीने योग्य पानी चार प्रतिशत ही हैैं, लेकिन जनसंख्या 20 प्रतिशत।

उल्लेखनीय है कि 1976 में संसद के दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा के बाद 42वां संविधान संशोधन विधेयक पारित हुआ था और संविधान की सातवीं अनुसूची में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन का प्रावधान किया गया था। 42वें संशोधन द्वारा केंद्र और राज्य सरकारों को जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने का अधिकार दिया गया, परंतु इस अधिकार का उपयोग आज तक किसी राज्य में नहीं किया गया है। बाद में वर्ष 2000 में जस्टिस वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित 11 सदस्यीय संविधान समीक्षा आयोग ने संविधान में अनुच्छेद-47ए जोडऩे और जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने का सुझाव दिया था। अनुच्छेद-47ए उन परिवारों को शिक्षा, रोजगार और कर कटौती में छूट देने की बात करता है जिनके दो बच्चे हैैं। यह जिन दंपती के बच्चों की संख्या दो से ज्यादा है उन्हें सरकारी लाभों से भी वंचित करने का प्रस्ताव रखता है। क्या इस सच्चाई से मुंह मोड़ा जा सकता है कि देश में जिस दर से जनसंख्या बढ़ रही है (चाहे आज उसकी गति धीमी क्यों न हो), उसके चलते आने वाले कुछ वर्षों में संसाधनों की असंतुलित खपत और बढ़ जाएगी। परिणामस्वरूप गुणवत्तापूर्ण जीवन चुनौती बन जाएगा।

संसाधनों के साथ-साथ क्षेत्रीय असंतुलन भी चिंता का विषय है। जहां दक्षिण और पश्चिम भारत में जन्म दर कम है वहीं उत्तर तथा पूर्वी भारत, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में अधिक। सामान्य से दिखने वाला यह क्षेत्रीय अंतर कई बार संघर्ष की स्थितियों को तब उत्पन्न कर देता है जब किसी क्षेत्र में कम विकास और अधिक जनसंख्या के चलते वहां के लोग उन राज्यों की ओर प्रवास कर जाते हैं जहां विकास अधिक और जनसंख्या कम है। ऐसी स्थिति में उन राज्यों से विरोध के स्वर उभरने लगते हैं जहां कम जनसंख्या है, क्योंकि कम जनसंख्या वाले राज्य शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जीवन मानकों पर अधिक निवेश कर पाते हैं, जो कि उच्च जीवन स्तर के महत्वपूर्ण घटक हैैं। प्रवासियों की अधिक संख्या उनके राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाती है वहीं राज्य के मूल निवासी स्वयं के हितों को लेकर असुरक्षित महसूस करने लगते हैैं। एक बात और, जो देश बहुभाषी और बहुधाॢमक नहीं हैैं वे जनसंख्या वृद्धि दर के मामले में क्षेत्रीय और संसाधन संबंधी विषमताओं को दृष्टि में रखते हैैं, परंतु जो देश बहुभाषी हैं और जहां विभिन्न नस्ल के लोग रहते हैैं वहां सभी संप्रदायों में एक संतुलन बनाए रखना आवश्यक हो जाता है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में किसी एक धर्म विशेष की जनसंख्या में वृद्धि उन संप्रदायों में असंतोष भी उत्पन्न करती है, जिनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम है। इन तमाम बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए देश को एक मध्यमार्ग अपनाने की आवश्यकता है। इस संबंध में एक ऐसा नियामक अपेक्षित है जो जनसंख्या नियंत्रण से कहीं अधिक जनसंख्या स्थिरता पर विचार करे। इसके लिए एक सकारात्मक नियंत्रण व्यवस्था को भी स्थापित करने की जरूरत है। जिन दंपतियों के दो बच्चे हैैं उन्हेंं रोजगार और शिक्षा में प्राथमिकता मिले। साथ ही बैंक कर्ज कम ब्याज दरों पर और धन निवेश पर अधिक ब्याज मिले।

बहरहाल जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में हम इंडोनेशिया का सुहार्तो मॉडल भी अपना सकते हैैं। एक मुस्लिम देश होते हुए भी वहां की सरकार ने धर्मावलंबियों के विरोध के बावजूद जन-जागरण की मुहिम चलाई। महिलाओं तक पैठ बनाकर उन्हें कम संतान के महत्व को बताने के लिए अथक प्रयास किए गए। इंडोनेशिया की सरकार ने नेशनल फैमिली प्लानिंग कोऑॢडनेशन बोर्ड बनाया और उसमें इंडोनेशिया के सबसे बड़े मुस्लिम समूह मोहम्मदियों को शामिल किया। सरकार ने अपने प्रचार-प्रसार अभियान में दूरदराज के गांवों में जाकर घर-घर गर्भनिरोधक गोलियां बांटीं। नतीजतन इंडोनेशिया में 1970 में प्रत्येक महिला के औसतन जहां 5-6 बच्चे थे वहां 2010 में यह अनुपात 2.6 रह गया। इसमें कोई दोराय नहीं कि लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में किसी को भी उसके परिवार के आकार को सीमित रखने के लिए विवश करना उचित नहीं है, परंतु इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि जो लोग जनसंख्या वृद्धि के नकारात्मक पक्षों की अवहेलना कर रहे हैं, उन्हें उनके कृत्यों के लिए सचेत न किया जाए। जब बात देशहित की हो तो यथोचित निर्णय आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य हो जाता है।

(लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैैं)

Posted By: Arvind Dubey

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