आशीष व्‍यास

सुनना यानी लिसनिंग। इसे लेकर कई दार्शनिकों के अपने-अपने वचन-कथन हैं। जैसे, जितना बोलो उससे ज्यादा सुनो, सुनने वाला ही अच्छा बोल सकता है। इन बड़े-बड़े दर्शन के पीछे नहीं भी झांके, तो भी एक आसान सी व्याख्या है - हमारे पास दो कान और एक जीभ है, इसलिए सुनना ज्यादा और बोलना कम चाहिए, लेकिन उलझन इसी बात को लेकर है कि अब कहीं किसी को सुना ही नहीं जा रहा है! चूंकि सुना नहीं जा रहा है, इसलिए हर कोई सिर्फ बोल रहा है। संभवत: यही कारण है कि बोलने और सुनने के बीच में जो 'सुलझ" जाना चाहिए, वह 'उलझता" ही जा रहा है!

अब इस संदर्भ के साथ कांग्रेस के प्रवक्ता रहे संजय झा की धारणाओं को भी समझने का प्रयास कीजिए। बीते दिनों एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा - 'मध्य प्रदेश में पार्टी ने 15 साल बाद किसी तरह सत्ता में वापसी की, लेकिन सवा साल के अंदर उसे इसलिए सत्ता गंवानी पड़ गई कि पार्टी नेतृत्व को ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे प्रभावी नेता से बात करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई।" दूसरे अर्थों में कह सकते हैं कि पार्टी में सुनवाई नहीं होने की वजह से सिंधिया परंपरागत विचारधारा को ध्वस्त करते हुए, पंजे की पकड़ से बाहर हो गए। मध्य प्रदेश में 'महाराज" की उपेक्षा और अन्य राज्यों में कांग्रेस की हालत जैसे मसलों पर अपनी वैचारिक आहुति देने वाले संजय झा से भी पार्टी ने परहेज कर लिया। अब उनका भी तर्क यही है कि ना शिकायतों को समझा गया, ना ही सुझावों को सुना गया! बताया जाता है कि बैंकर, कई मल्टीनेशनल कंपनियों की बागडोर संभालने वाले और लेखक रह चुके संजय झा कांग्रेस आलाकमान के जरिये ही पार्टी में आए थे! लेकिन, फिर भी उन्हें सुना नहीं गया।

हालांकि, कांग्रेसियों के किस्से-कहानियों में यह सभी चर्चाएं एक पक्षीय हैं। बावजूद इसके, क्यों नहीं सुना गया? कितना सुना जाना चाहिए? किस हद तक सुनना फायदेमंद है और किस सीमा के बाद सुनना खतरनाक होता है, इसका कोई खाका हाल-फिलहाल ना बोलने वाले के पास है और ना सुनने वालों को इससे कोई सरोकार है।

एक बार फिर से लौटते हैं विशेषज्ञों की मान्यताओं और उनसे जुड़े मतलबों की तरफ। इस दावे से कोई दिक्कत नहीं है कि जो शीर्ष पर है, उसे सुनना ही चाहिए। क्योंकि, जो नहीं सुनता है, एक समय बाद लोग उससे बोलना बंद कर देते हैं। जैसे ही बोलना बंद होता है, समूची व्यवस्था गूंगी-बहरी हो जाती है! मध्य प्रदेश की जनता तो दो-दो बार यह प्रमाणित भी कर चुकी है। पहली बार दिग्विजय सिंह के समय और दूसरी बार शिवराजसिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए। माना जाता है कि दिग्विजय सिंह ने सरकारी कर्मचारियों की नहीं सुनी और शिवराज ने किसानों की। किसान और कर्मचारी के रूप में जन-मन में गहरी पैठ रखने वाले इस व्यापक वर्ग ने फिर किसी की नहीं सुनी। उम्मीदें टूटीं तो असहयोग को नए अर्थ दे दिए और मजबूत जनाधार वाली सरकारों को राजनीतिक वानप्रस्थ के लिए विवश होना पड़ा! सरकारें बोलती रहीं, लेकिन फिर किसी ने कुछ भी नहीं सुना। बहुत स्वाभाविक है कि संवादहीनता की यही स्थिति संवेदनशीलता में कमी लाती है, कम होती संवेदनाएं आश्चर्यजनक रूप से समस्याएं बढ़ाती हैं, फिर समस्या हल नहीं करने वाली सरकारें समाप्त हो जाती हैं!

अब फिर चुनाव आने वाले हैं। कोई संदेह नहीं है कि यदि किसी राजनीतिक लहर पर सवार होकर यह चुनाव लड़े गए तो जय-पराजय के परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। भाजपा-कांग्रेस के बीच प्रतिष्ठा की यह लड़ाई जब निर्णायक दौर में पहुंच जाएगी, तब संभव है कि दोनों ही दलों को गहराई-गंभीरता से इस बात का अनुभव हो कि यदि जनता को नहीं सुना गया तो जीत के सभी जतन अनसुने कर दिए जाएंगे।

बिजली बिल : संकट का नया चेहरा!

दो सरकारों के नीति-नियंताओं के बीच फंसी जनता इन दिनों बढ़े हुए बिजली बिल से परेशान है। 'कोरोना का डर" घर पर रखकर लोग बिजली दफ्तरों में मारे-मारे फिर रहे हैं। आरोप है कि झूठे आंकड़ों के आधार पर दोगुनी हुई बिल-राशि कम करवाने के लिए लोग सुरक्षित शारीरिक दूरी, मास्क, सैनिटाइजर जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं को भूलकर घर से बाहर निकल आए हैं। हैरान जनता की परेशानी इसलिए भी जायज है कि 500 का बिल 5000 और 1000 का आंकड़ा 10,000 हो चुका है! अकारण-अचानक बिल में आया यह उछाल आम आदमी के दर्द को नए दायरों में ले जा रहा है। परेशानियों की यह परिधि कुछ गांव या जिलों तक नहीं है। अब लगभग पूरे प्रदेश से ही असहमतियों की अर्जियां लगाई जा रही हैं। राजनीतिक गलियारों में भी बहस छिड़ चुकी है कि सरकार बदलते ही बिजली महंगी हो गई! करीब आते जा रहे उपचुनाव में बिजली राजनीतिक मुद्दा बनकर सूबे का मंसूबा नहीं बदल दे, शायद इसलिए सरकार संवाद आयोजित कर रही है। राहत के लिए शिविर लगाने की परंपरा भी शुरू हो चुकी है, लेकिन आम आदमी अभी तक तो आहत ही नजर आ रहा है। दरअसल, प्रदेश में सरकारी ढर्रे का रवैया ही ऐसा है कि आसानी से सुनवाई संभव नहीं होती। कोई भी निश्चिंत नजर नहीं आ रहा है कि जो इस महीने कम हुआ है वह अगले महीने बढ़कर नहीं आएगा। इसीलिए, बार-बार पूछा जा रहा है कि घर-घर लगे मीटर से एक-एक यूनिट की खपत का हिसाब रखने वाली सरकार के पास ऐसा कोई फॉर्मूला क्यों नहीं है, जिससे जनता की परेशानी का आसान हल निकाला जा सके।

स्कूल फीस : परेशानी की नई परिभाषा!

कोरोना ने यदि किसी को सबसे ज्यादा परेशान किया है तो वे हैं अभिभावक। साल शुरू होने से पहले ही घर बैठे बच्चों की चिंता के साथ-साथ उनके लिए स्कूल फीस भी बड़ी समस्या बन गई है। महामारी के दौर में भी अभिभावकों के मोबाइल पर स्कूल फीस देने के आग्रहभरे आदेश आ रहे थे! वैसे भी हर साल बेहताशा बढ़ती स्कूल फीस को नियंत्रित करने के लिए मध्य प्रदेश के पालक लंबे समय से संघर्षरत हैं। वर्ष 2014-15 से वे संगठित होकर फीस रेग्यूलेटरी कमेटी बनाने की मांग कर रहे हैं। विधानसभा में प्रायवेट बिल भी आ चुका है। साल 2018 में सरकार एक गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर चुकी है, लेकिन कानूनी दांव-पेंच में उलझकर 'खुली-छूट" का यह मसला, अब 'खुली-लूट" में बदल गया है। स्कूल भले ही नहीं लग रहे हैं, लेकिन फीस की मांग की जा रही है। विवाद कोर्ट तक पहुंच गया है। स्कूल संचालकों का कहना है कि फीस नहीं मिली तो शिक्षकों को वेतन कैसे देंगे? पालकों ने भी सुझाव दे डाला कि शिक्षकों की सूची और वेतन का विवरण सौंप दें, भुगतान हम कर देंगे। समायोजन के इस सिद्धांत से पालकों पर दबाव नहीं आएगा और स्कूलों का खर्च भी निकल जाएगा।

रेत-रहस्य : दिक्कतों का नया दायरा!

सबसे बड़े निर्माण उद्योग की अहम कड़ी है रेत। यह इन दिनों मांग और पूर्ति के अंतर का नया आधार बन गई है। रेत कारोबार एक संगठित अपराध के रूप में स्थापित हो चुका है, राजनीतिक नुमाइंदों की खुली भागीदारी ने लाभ के इस गणित को नाक का सवाल बना लिया है, बेलगाम माफियाओं पर नकेल कसने का दुस्साहस अब किसी के पास भी नहीं है - यह सबकुछ इतनी बार दोहराया जा चुका है कि शब्दों ने अर्थ के साथ अब भाव भी बदल लिया है! इसलिए, समस्या से इतर अब समाधान की बात करते हैं। हाल ही में रेत एसोसिएशन ने मांग रखी है कि एनजीटी के आदेश पर 30 जून से लगने वाली रोक को इस बार लागू नहीं किया जाए, सरकार तत्काल कोई कदम भी उठाए। कोरोना के कारण उपलब्धता की कमी है, मनमाने दाम वसूले जा रहे हैं, लेकिन अवैध परिवहन ईमानदारी से हो रहा है। इसलिए, इस बार का संकट ज्यादा विकट हो गया है। तीन दिन बचे हैं, लेकिन अभी तक सुनवाई नहीं हुई है। हालत यह है कि लॉकडाउन खुलते ही थमे हुए निर्माण कार्य शुरू हो गए, लेकिन रेत की मांग पूरी नहीं हो पा रही है। रेत के अवैध परिवहन के साथ-साथ कीमतें भी आसमान छू रही हैं। वैसे भी यह समस्या सिर्फ कोरोनाकाल की ही नहीं है। रेत उद्योग लंबे समय से मांग कर रहा है कि ढुलाई के दौरान रेत की ऊंचाई तय कर दी जाए। एक मानक तय नहीं होने से ओवरलोडिंग के नाम पर पुलिस, परिवहन, खनिज विभाग अलग-अलग कार्रवाई करते हैं। जनता की वेदना पर कई प्रतिवेदन तैयार किए गए, लेकिन निदान रेत की खदान में ही दब कर रह गया!

जनता की छोटी-छोटी समस्याओं से जुड़े ये मसले नहीं सुनने के कारण ही, अब बड़े-बड़े मुद्दों में बदल चुके हैं। ये मुद्दे मान्यताओं के रूप में स्वीकार कर लिए जाएं और फिर सरकारों को अपदस्थ करने में मुख्य भूमिका निभाएं, इसके पहले आम आदमी की आवाज को कान खोलकर सुनना चाहिए!

Posted By: Ravindra Soni

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