आशीष व्यास

मान-मनौवल, ताकत-तेवर, पुरस्कार-तिरस्कार के बीच बीते गुरुवार आखिरकार शिवराज सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार हो ही गया। भारतीय राजनीति में आमतौर पर मंत्री पद के लिए संतुलन-समन्वय का सिद्धांत चुनाव जीतने के बाद लागू होता है। यदि कहीं कुछ आधारभूत असंतोष होता भी है, तो गुटीय समीकरणों के आधार पर सुलह कर कलह दूर कर ली जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश में इस बार का राजनीतिक नवाचार, कई अर्थों में बुनियादी बदलाव का नया केंद्र बनकर उभरा है। कारण भी बहुत स्पष्ट है। कमल नाथ सरकार के पतन से पहले ही बहुत कुछ तय हो गया था। फिर, जो बचा था, उसका गुणा-भाग करने में भी 100 दिन से ज्यादा समय लगाया गया। इस लंबे अंतराल में अंतर्कलह-अंतर्विरोध की कई कहानियां सुनी-सुनाई गईं, रूठने-मनाने के कई नए मुहावरे भी इसी दौर में पढ़े-पढ़ाए गए, लेकिन समन्वय के साथ अब जो देखा-दिखाया जा रहा है, उसे सच मानते हुए कहा जा सकता है कि शिवराज सरकार ने संवैधानिक जवाबदेही का एक और पड़ाव सफलतापूर्वक पार कर लिया है। मंत्रिमंडल विस्तार जिस तरह से एक-एक दिन आगे टलता जा रहा था, पहली बार यह अनुभव किया गया कि राजनीति में वास्तव में एक-एक दिन का महत्व है। इसे यूं भी समझ सकते हैं। पांच साल में 1825 दिन होते हैं। इसमें से करीब 540 दिन (डेढ़ साल) कांग्रेस सरकार के खाते में दर्ज हैं। उसके बाद 100 दिन की शिवराज सरकार भी हम देख चुके हैं। अब बचे हैं 1185 दिन। अब शेष दिनों में ही सरकार को जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन का सपना-संकल्प पूरा करना होगा। शपथ लेकर नए मंत्री आजीवन पेंशन, राजधानी में सरकारी आवास, गाड़ी, मुफ्त यात्रा और नौकर-चाकर जैसी सुविधाओं के हकदार हो गए हैं। सुविधाओं-अधिकारों की यह परिभाषा बहुत स्पष्ट है, लेकिन जिम्मेदारियों-जवाबदेहियों से जुड़ी जानकारियां, क्या किसी शपथ-पत्र में शब्द समेट पाती हैं? क्या चुने गए मंत्री यह दावा कर पाते हैं कि वे कैसे और कितना काम करेंगे? दूरदर्शी रणनीतिकार की तरह क्या उनके पास कोई रोड मैप है? माना कि इस तरह का कोई कानून या प्रावधान स्वतंत्र भारत में नहीं है, लेकिन हमारे ही देश में पहले ऐसी कुछ व्यवस्थाएं थीं, जो 'आदर्श साम्राज्य-अनुकरणीय सम्राट' के रूप में आज भी पहचानी जाती हैं। हम केवल दो शासकों के कालखंड पर ही नजर डालें, तो अपनी ही राजनीतिक विरासत को आसानी से समझ सकते हैं।

कालखंड : 57 ईसा पूर्व

सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में नौ रत्न धन्वन्तरि, क्षपणक, अमर सिंह, शंकुक, घटखर्पर, कालिदास, वेताल भट्ट, वररुचि और वराहमिहिर हुए। धन्वन्तरि महान चिकित्सक थे। मुद्राराक्षस में क्षपणक के वेश में गुप्तचरों का उल्लेख किया गया है। अमर सिंह ने सबसे प्रसिद्ध कोष ग्रंथ 'अमर कोष' तैयार किया। शंकुक को विद्वान ज्योतिषशास्त्री माना जाता है। वेताल भट्ट ख्यात धर्माचार्य थे। उन्होंने 'नीति-प्रदीप' नाम से आदर्श आचरण की नीतियां बनाईं। प्राचीन काल में भट्ट की उपाधि महापंडितों को दी जाती थी, वेताल भट्ट से तात्पर्य साधना में प्रवीणता से है। कालिदास संस्कृत राजकवि और नाटककार थे। वररुचि वैज्ञानिक, व्याकरणीय और साहित्यिक ग्रंथों से संबद्ध रहे हैं। कात्यायन से उनका नाम जुड़ता है। वराहमिहिर उस युग के प्रमुख ज्योतिषी थे, जिन्होंने विक्रमादित्य के पुत्र की मौत की भविष्यवाणी की थी।

कालखंड : 15वीं शताब्दी

मुगल शासक अकबर ने अपनी सत्ता को सुदृढ़ करने के लिए नौ विद्वानों की नियुक्ति की थी। अकबर के दरबार में कुछ रत्नों का मध्य प्रदेश से सीधा संबंध था। उनमें से एक थे बीरबल। मध्य प्रदेश के सीधी जिले के घोघरा गांव में जन्मे बीरबल और अकबर के किस्से तो आज भी हर शासक के लिए जादुई चाबी की तरह हैं। बीरबल अकबर के विशेष सलाहकार थे। हाजिरजवाब बीरबल के पास हर समस्या का समाधान होता था। तानसेन ग्वालियर में जन्मे विलक्षण गायक और राग दीपक के ज्ञाता थे। तानसेन ने ही मुगलकाल में संगीत को आदर्श स्थान दिलवाया। राजा टोडरमल अकबर के राजस्व और वित्तमंत्री थे। भूमि नापने के लिए विश्व की प्रथम मापन-प्रणाली राजा टोडरमल ने ही तैयार की थी। उत्तर प्रदेश में आज भी उनके नाम से राजस्व प्रशिक्षण संस्थान है, जहां प्रशासनिक अधिकारियों को भू-लेख संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है। मुल्ला दो प्याजा बारीकी से बात पकड़ने या काटने वाले और जाने-माने रसोइया थे। इनका मूल नाम अबुल हसन था, किंतु अकबर को इनके द्वारा बनाया 'मुर्ग दो प्याजा' नामक पकवान इतना पसंद आया कि इन्हें 'मुल्ला दो प्याजा' नाम देते हुए अपना रसोइया बना लिया। इनकी मजार मध्य प्रदेश के हरदा जिले की हंडिया तहसील में बनी है। अब्दुल रहीम खानखाना प्रसिद्ध कवि, बहुभाषाविद् और कूटनीति के जानकार थे। इन्होंने मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में कई ऐतिहासिक निर्माण करवाए थे। दस्तावेजीकरण में माहिर अबुल फजल ने अकबरनामा और आइना-ए-अकबरी लिखी। फैजी फारसी कवि और अच्छे गणितज्ञ थे। राजा मानसिंह अकबर की सेना के सेनापति और कुशल योद्धा थे। इनके नेतृत्व में कई लड़ाइयां जीती गईं। फकीर अजीयोद्दीन मशहूर हकीम थे।

दोनों कालखंडों में सदियों की दूरियां हैं, लेकिन राजकाज चलाने का तरीका एक जैसा ही है। बगैर किसी संदेह-संशय के आसानी से समझा जा सकता है कि तात्कालिक सामाजिक आवश्यकताओं के आधार पर ऐसा समूह जुटाया गया, जिसकी व्यक्तिगत और व्यावहारिक दक्षता से पारदर्शी और लोक कल्याणकारी राज-व्यवस्था का संचालन किया जा सके।

पुरानी सरकार का नया मंत्रिमंडल

अब फिर से लौटते हैं मप्र मंत्रिमंडल पर। विस्तार के बाद आकार लेने वाले मंत्रिमंडल में अधिकांश सदस्य स्नातक, स्नातकोत्तर और एलएलबी हैं। कुछ एमबीए, पीएचडी और डॉक्टर भी हैं। दुर्लभ संयोग यह भी है कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल में सभी सदस्यों का पेशा कृषि है। यानी, सभी किसान हैं। उम्मीद की जा सकती है कि हमेशा राजनीति का मुद्दा बनते किसान अब ज्यादा परेशान नहीं होंगे! खेत-खलिहान से जुड़ी सभी समस्याएं राजनीतिक चातुर्य से प्राथमिकता सूची में दर्ज हो जाएंगी, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होगा? इसलिए कि, यह जरूरी नहीं कि परंपरागत किसान परिवार से संबंध रखने वाला सर्वश्रेष्ठ कृषि मंत्री हो! या फिर, पेशे से चिकित्सक स्वास्थ्य विभाग की बुनियादी बीमारी को तत्काल ठीक कर पाए! जरूरी तो यह भी नहीं है कि एमबीए करने वाला अपने प्रबंधकीय कौशल से, अपने विभाग को उन्नति के नए आंकड़ों तक पहुंचा दे! वर्तमान संदर्भ के साथ अब यह बहस का विषय हो सकता है कि शैक्षणिक योग्यता और व्यावहारिक समझ के अंतर को नीति-निर्धारक कैसे आंकते-समझते हैं। यह संदेह-सवाल इसलिए कि राजनीतिक संतुलन-समीकरण के बाद मंत्रिमंडल तो बन जाता है, परंतु विभागों का वितरण यदि दक्षता-विशेषज्ञता को ध्यान में रखते हुए नहीं हुआ, तो विवशताओं की राजनीतिक कीमत प्रदेश लंबे समय तक चुकाता है। सालों साल से समस्याएं चली आ रही हैं, परेशानियों पर राजनीति भी जारी है, मगर कोई हल नहीं है! यदि बुनियादी मसलों को ही सुलझाया नहीं जा पा रहा है तो बहुत स्पष्ट है कि मंत्रिमंडल में विषय-विशेषज्ञों की आवश्यकता है। यह सही है कि किताबी पढ़ाई या डिग्री से किसी की क्षमता का आकलन नहीं किया जा सकता है। फिर भी, उन्हें उनकी रुचि के अनुसार दक्ष तो बनाया ही जा सकता है।

बहरहाल, मंत्रिमंडल के विस्तार के ठीक बाद नई कैबिनेट की पहली बैठक भी हो चुकी है। मुख्यमंत्री नए मंत्रियों से कह भी चुके हैं कि - 'अब न मैं चैन से बैठूंगा और न ही आप सबको चैन से बैठने दूंगा।' उम्मीद करें कि नई कैबिनेट मुख्यमंत्री के साथ, जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी। परिणामदायक व्यवस्था का निर्माण भी करेगी, ताकि प्रदेश का परिचय प्रगति की नई गति से हो सके!

Posted By: Ravindra Soni

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Raksha Bandhan 2020
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