(डॉ. जयकुमार जलज) letter@naidunia.com

हर आम व खास को सूचित किया जाता है कि प्रदेश के विद्यालयों में शिक्षा का नया सत्र 01 अप्रैल से शुरू हो चुका है। इतर विभागों के अधिकारी/कर्मचारी भी कृपया सूचित हों कि वे कभी-कभी स्कूलों में जाकर रहें।

कक्षा भी पढ़ाएं ताकि शिक्षकों के सामने आदर्श अध्यापन का नमूना पेश हो। क्या कहा? आप बीएड नहीं? पर बीएड होना तो सिर्फ शिक्षकों के लिए जरूरी है। स्कूलों में किताबें भेजने का काम प्रगति पर है। ग्रीष्मावकाश में भी भेजी जा सकती थीं। तब जैसी यहां पड़ी थीं, वैसी ही वहां पड़ी रहतीं। अवकाश में कौन वहां पढ़ता? अप्रैल भर बच्चे स्कूलों में पहुंचे नहीं। अगर पहुंचे भी तो सभी कक्षाओं के बच्चों को एक जगह बैठाकर 'जोई-सोई कछु गावे" की तर्ज पर किसी शिक्षक ने उन्हें कुछ पढ़ा दिया। अतिथि शिक्षकों को मार्च-अप्रैल का वेतन जून बीतते-बीतते दिया जा चुका। शिक्षकों की नियुक्ति भी शीघ्र की जा रही है। फिर भी यह क्या कम है कि नया सत्र 01 अप्रैल से शुरू हो चुका है। पहले 30 अप्रैल को सत्रांत होता था। मई-जून ग्रीष्मावकाश। जुलाई से नया सत्र।

आज 01 अप्रैल से नया सत्र और अवकाश सत्रांत के बाद नहीं, सत्र के मध्य में होता है। शिक्षा सत्र में किए गए उक्त परिवर्तन के पीछे क्या सोच है? पहले बच्चे परीक्षा पास कर लम्बे अवकाश में मुक्ति अनुभव करते थे। अगली कक्षा की पढ़ाई का दबाव नहीं रहता था। अपने सम्बंधियों, खासकर मामा के यहां जाते थे। अब तो दादा-दादी के यहां जाने की भी स्थितियां पैदा हो चुकी हैं। शायद महसूस किया गया हो कि बड़ों के लाड़-प्यार में बच्चे और बिगड़ जाएंगे।

इसलिए ऐसा उपक्रम किया गया कि उनका नाता पाठ्यक्रम से बराबर बना रहे, उन पर पाठ्यक्रम की लगाम कसी रहे। उन्हें उस जीवन से बचाया जाए, जिसकी वकालत दुष्यंत कुमार इस पंक्ति में करते हैं -

बहुत संभालकर रक्खी तो पायमाल हुई, सड़क पर फेंक दी तो जिंदगी निहाल हुई।

और निदा फाजली इस शायरी में...

बच्चों के छोटे हाथों को चांद-सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे।

आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में जितने प्रयोग हुए, उतने शायद ही किसी अन्य क्षेत्र में हुए होंगे। कभी परीक्षा में उत्तीर्णता आवश्यक, कभी नहीं। कभी 5वीं-8वीं की बोर्ड परीक्षा, कभी स्थानीय। कभी 11 साल हायर सेकेंडरी या 10 वर्षीय हाई स्कूल, दो वर्षीय इंटर। कभी वस्तुपरक प्रश्न, कभी व्यक्तिपरक। कभी हिंदी माध्यम, कभी अंग्रेजी। कभी छह विषयों में उत्तीर्णता, कभी सिर्फ पांच में। इस साल फिर परीक्षा का पैटर्न बदला जा रहा है। 10वीं बोर्ड में सब्जेक्टिव प्रश्न बढ़ाए जाएंगे। विकल्पों वाले प्रश्न कम होंगे।

पिछले 70 साल में शिक्षा क्षेत्र निरंतर बदलाव का शिकार न हुआ होता तो शिक्षा का स्तर उतना नहीं गिरता, जितना आज गिरा हुआ है। आखिर आजादी पूर्व के तमाम तपे हुए नेता, लेखक, वैज्ञानिक आदि पुरानी शिक्षा प्रणाली की ही तो उपज थे। प्रदेश के जिला शिक्षा अधिकारी शिक्षकों की कमी का रोना रोते हैं। इस साल भी दबी आवाज में रोए हैं (नईदुनिया, 24 जून, फोकस)। वे जोर से रो नहीं सकते।

बुंदेली कहावत है- 'जबरा मारे, रोन न देय"। फोकस ने निष्कर्ष दिया है- 'शिक्षकों की कमी का तो हिसाब ही नहीं। हिंदी के शिक्षक विज्ञान पढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी वाले हिंदी। अतिथि शिक्षकों से काम चलाया जा रहा है।" यहां बता दें कि फिलहाल स्कूलों में अतिथि शिक्षक भी नहीं हैं। उनकी नियुक्ति होते-होते दिसंबर आ जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व शिक्षाविद् हैं)

Posted By: Rahul Vavikar