सदियों पुराने अयोध्या विवाद पर उच्चतम न्यायालय की ओर से 40 दिन तक नियमित सुनवाई के बाद अब लोगों की निगाहें 17 नवंबर पर टिकी है। इस दिन या इसके पहले निर्णय की आशा इसलिए है, क्योंकि अयोध्या मसले की सुनवाई कर रही पीठ में शामिल प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। देश की अस्मिता के पर्याय भगवान राम की जन्मभूमि से जुड़ा अयोध्या विवाद एक ऐसा मसला है, जो सदियों से हिंदू-मुसलमानों के बीच टकराव का कारण बना हुआ है। इस विवाद को लेकर अंग्रेजों ने 'बांटो और राज करो वाली नीति अपनाई, तो देश की आजादी के बाद जब यह उम्मीद की जा रही थी कि इस अहम मसले का समाधान किया जाएगा, तब केंद्र और राज्य सरकारों ने उसकी अनदेखी ही की या फिर संकीर्ण राजनीति की।

जब छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में एकत्रित कारसेवकों ने विवादित ढांचे को ढहा दिया तो इस विवाद ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद आपसी बातचीत से इस विवाद को हल करने की कोशिश शुरू हुई, लेकिन वह नाकाम ही रही। नाकामी के इस सिलसिले के बीच सितंबर 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को सुन्‍नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़े के बीच तीन भागों में बांटने का आदेश दिया। इस फैसले का एक बड़ा आधार पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की वह रिपोर्ट बनी, जिसमें कहा गया था कि विवादित स्थल पर मंदिर के स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया। इस रिपोर्ट में विवादित स्थल के उत्खनन से मिले उन अवशेषों का भी जिक्र था, जो मंदिर होने की पुष्टि करते थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, क्योंकि कोई भी पक्ष संतुष्ट नहीं था। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी। इसके बाद पुन: आपसी वार्ता से अयोध्या विवाद को हल करने की कोशिश हुई, लेकिन फिर बात नहीं बनी।

लंबे इंतजार के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई करने को तैयार हुआ। उसने पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद का समाधान करने की कोशिश की। मध्यस्थता पैनल के समक्ष दोनों पक्षों के अपने रुख पर अड़े रहने के कारण जब बात नहीं बनी, तो सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू की। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जो तमाम दलीलें दी गईं, उनमें पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को महत्वपूर्ण पाया, इसलिए माना जा रहा है कि वह उसके फैसले का आधार बनेगी। ध्यान रहे कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर ही अयोध्या ढांचे का उत्खनन किया था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि राम के बिना भारत की संस्कृति अधूरी है। इस बात को वे भी स्वीकार करते हैं, जो विवादित स्थल पर मस्जिद का दावा कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसे लोग इस देश में राम की महत्ता से परिचित नहीं? यह ठीक नहीं कि एक ओर राम की महत्ता को स्वीकार किया जा रहा है और दूसरी ओर उन्हें काल्पनिक भी बताया जा रहा है। मानव समाज आदिकाल से ही ईश्वर पर भरोसा करता आ रहा है। विज्ञान की तमाम धारणाओं के बावजूद यह भरोसा कम नहीं हुआ है। ऐसा केवल भारत में ही नहीं, दुनिया में हर कहीं है। लोग ईश्वर को अपना संरक्षक मानते हैं और उससे प्रेरणा पाते हैं। हर समाज और संस्कृति के अपने-अपने आराध्य हैं। राम भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में भी जाना जाता है। वह इस देश के मानस में रचे-बसे हैं। उनके होने के प्रमाण मांगना या फिर उनके अस्तित्व को नकारने की कोशिश करना भारतीय संस्कृति को झुठलाने जैसा है। भारत ही नहीं, दुनिया में कहीं भी बसे हिंदू खुद को भगवान राम से जोड़ते हैं। देश ही नहीं, दुनिया में भी अयोध्या को राम की नगरी के तौर जाना जाता है।

देश-दुनिया इससे भी परिचित है कि विदेशी शासकों के आक्रमण के दौरान किस तरह हजारों मंदिरों का ध्वंस किया गया। कई जगह उन्हें तोड़कर मस्जिदों का भी निर्माण किया गया। अयोध्या का राम जन्मभूमि मंदिर बाबर के सिपहसालार मीर बकी द्वारा तोड़ा गया और वहां मस्जिद बनाई गई। हिंदुओं ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया और वे मंदिर के लिए बराबर संघर्ष करते रहे। बाद में इस संघर्ष ने अदालती संघर्ष का रूप ले लिया। वैसे तो इस्लामी मान्यता यह है कि किसी अन्य धर्मस्थल को तोड़कर या फिर झगड़े की जगह पर बनाई गई मस्जिद में नमाज मंजूर नहीं होती, लेकिन अयोध्या मामले में इस मान्यता को खारिज किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान भले ही यह दलील दी गई हो कि मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि भारत के साथ-साथ अनेक इस्लामी देशों में मस्जिदों को स्थानांतरित किया गया है। इसी कारण हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष को अयोध्या के बाहर मस्जिद का निर्माण करने के लिए जमीन देने की पेशकश की। इस पेशकश को इसी दलील के सहारे ठुकराया गया कि मस्जिद तो हमेशा मस्जिद रहती है। ऐसा लगता है कि इस दलील को एक जिद की शक्ल दे दी गई है, क्योंकि मस्जिद पक्ष इससे अच्छी तरह अवगत है कि राम जन्म स्थान को लेकर अगाध आस्था रखने के बावजूद मंदिर पक्ष के लोग बार-बार समझौते के लिए आगे आए। मस्जिद पक्ष चाहे जो दावा करे, खुद उनके बीच के नेता यह जानते हैं कि बाबरी मस्जिद को लेकर राजनीति अधिक की जा रही है। ऐसा करते हुए इसकी अनदेखी की जा रही है कि 1992 के बाद से मंदिर पक्ष इसके बाद भी अदालत के आदेशों का पालन करने में लगा हुआ है कि रामलला अस्थायी ढांचे में विराजमान हैं।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के आखिरी दिन सुन्न्ी वक्फ बोर्ड की ओर से पहले जिस तरह गोलमोल ढंग से यह कहा गया कि वह अपना दावा छोड़ने को तैयार है और फिर कोई उसकी पुष्टि करने को तैयार नहीं हुआ, उससे तो यही लगता है कि भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। यदि सुन्‍नी वक्फ बोर्ड के सभी लोग समझौते को राजी नहीं तो फिर उसे लेकर दावा करने का क्या मतलब? कहीं यह दावा मामले को लटकाने की कोशिश का हिस्सा तो नहीं? ध्यान रहे कि अगर किसी कारण 17 नवंबर तक फैसला नहीं हो पाता और जस्टिस रंजन गोगोई सेवानिवृत्त हो जाते हैं तो सारी कवायद फिर से करनी होगी। कोशिश यह होनी चाहिए कि इसकी नौबत न आने पाए। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला हो, उसे सभी स्वीकार करें। यह कोशिश राजनीतिक, सामाजिक और साथ ही धार्मिक संगठनों को भी करनी चाहिए, ताकि सामाजिक सद्भाव हर हाल में बना रहे।

(लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)

Posted By: Ravindra Soni