आशीष व्यास

क्या कोरोना संक्रमण के कारण मध्य प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव निर्धारित समय पर नहीं हो पाएंगे? प्रदेश में तख्तापलट, मंत्रिमंडल विस्तार और फिर विभाग वितरण के बाद अब यह सवाल बार-बार पूछा और दोहराया जा रहा है। बीते 10 मार्च को कांग्रेस के 22 विधायक इस्तीफा देकर भाजपा के हो गए थे। 19 मार्च तक सभी के इस्तीफे मंजूर किए गए। 19 अगस्त तक छह महीने पूरे हो रहे हैं। इस्तीफा देने से रिक्त हुई विधानसभा सीट पर चुनाव छह महीने के अंदर कराना जरूरी होता है। वैसे भी कोरोनाकाल के नए-नए आंकड़े अब नए-नए राजनीतिक समीकरण सामने ला रहे हैं। क्योंकि, मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब 14 मंत्री, विधायक नहीं हैं! शिवराज की टीम में उन्हें मिलाकर 34 मंत्री हैं। इनमें 14 मंत्री पूर्व कांग्रेसी हैं। यही वे हैं जो अभी विधायक भी नहीं हैं। सत्ता परिवर्तन के पश्चात प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार में देरी को, विपक्ष द्वारा राजनीतिक अस्थिरता की उपमा दी गई थी। तर्क यह भी दिया गया कि भाजपा में निर्णय का केंद्राधिकार अब समाप्त हो चुका है। कभी कमल नाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमों में विभाजित रही कांग्रेस का यह आरोप भी चौंका गया कि भाजपा में शिवराज के साथ सिंधिया गुट का प्रभाव-प्रसार, खेमे-बंदी को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि कमल नाथ सरकार गिरने के पूर्व सिंधिया की तरफ से अनेक अबोले-अलिखित अनुबंध हो चुके थे। यही वजह है कि सिंधिया समर्थक विधायक अब मंत्री के रूप में मध्य प्रदेश की सेवा का संकल्प दोहरा रहे हैं। दरअसल, समर्थन और समर्थकों की ऐसी सियासत मध्य प्रदेश में पहली बार देखी जा रही है। इसीलिए, बिना किसी संशय के एक सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि अपने-अपने राजनीतिक आकाओं की अनुकंपा से पद, कद और प्रभाव में वृद्धि करने वाले 'माननीय मंत्रीगण' प्रदेश की समस्याओं से कितना सरोकार रख पाएंगे? चुनावी दावों-वादों से दूर अब जन-मन की पीड़ा-परेशानियों से कैसे सीधा सामंजस्य बैठा पाएंगे? वैसे कहा यह भी जाता है कि राजनीति में हितबद्धता ज्यादा मायने नहीं रखती है। यदि व्यक्ति परिणामदायक व्यवस्था नहीं बना पाता है तो राजनीतिक व्यवस्थाएं कब विवशताओं में बदल जाती हैं, पता नहीं चलता! मंत्रियों को जन अपेक्षाओं के ऐसे ही दबाव-समूह की उपस्थिति हमेशा अनुभव करना चाहिए। इस पवित्र उद्देश्य के साथ कि प्रदेश की परिधि काफी बड़ी है, यदि वे अपने विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को ही निर्णायक रूप से हल करवा देंगे और पांच साल बाद जब अपने ही क्षेत्र में लौटेंगे, तो उनके प्रति स्वाभाविक विश्वास स्थाई रूप से बना रहेगा। इसी बहाने इस बात का भी अनुभव हो जाएगा कि प्रदेश की जमीनी समस्याओं पर उनकी पकड़ कितनी मजबूत है? तुलसी सिलावट, गोविंद सिंह राजपूत और इमरती देवी घोषित रूप से सिंधिया समर्थक माने जाते हैं और राजनीतिक गलियारों की खुसर-पुसर पर भरोसा करें तो विश्वास सारंग, भूपेंद्र सिंह और विजय शाह का नाम शिवराज समर्थकों की प्राथमिकता सूची में दर्ज है। अब इन्हीं मंत्रियों के विधानसभा क्षेत्र से बात आगे बढ़ाते हैं। कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जो इलाके के लोग लंबे समय से हल करवाना चाहते हैं। कुछ बहुत सामान्य हैं, कुछ को पूरा होने में वित्तीय सहयोग की आवश्यकता है। हो सकता है कुछ ऐसी भी हों, जिसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत हो। लेकिन, व्यापक दृष्टिकोण में देखेंगे तो ऐसी छोटी-बड़ी समस्याएं प्रदेश के हर इलाके में मौजूद हैं। मंत्री चाहें तो अपने इलाके की समस्याओं के जरिए एक ऐसा पड़ताल-प्रबंधन विकसित कर सकते हैं, जो प्रदेश स्तर पर उपयोगी और निर्णायक हो सकता है।

विश्वास सारंग : नरेला विधानसभा क्षेत्र

  • भोपाल के इस बड़े इलाके में जलभराव की स्थिति बनती है। क्षेत्र में कई बस्तियां निचले इलाकों में हैं। पार्किंग की बड़ी समस्या है। नरेला विधानसभा में शहर के तीन बड़े विश्रामघाट हैं। यहां व्यवस्थाओं व सुविधाओं में सुधार की आवश्यकता है।
  • नरेला में बेरोजगारी बीते कई चुनावों में मुद्दा रहा है। इस समस्या का समाधान कभी हुआ ही नहीं। शहर के दो बड़े आरओबी का निर्माण भी प्रस्तावित है। सरकारी अस्पताल व कॉलेजों की संख्या भी कम है।

भूपेंद्र सिंह : खुरई विधानसभा क्षेत्र

  • सागर जिले के खुरई में कृषि कार्य में उपयोगी संयंत्र बनाने के छोटे-छोटे कई कारखाने चल रहे हैं। यहां कृषि एग्रो मॉल की आवश्यकता है। इससे सभी इकाइयों को एक छत के नीचे एकीकृत बाजार मिलेगा और प्रदेश में पहचान बन सकेगी।
  • खुरई को जिला बनाने के लिए पूर्व में भी प्रयास हुए थे। यदि इसे जिला बनाया जाता है तो खुरई के साथ बीना को भी भरपूर फायदा मिल सकता है।

विजय शाह : हरसूद विधानसभा क्षेत्र

  • खंडवा जिले के हरसूद पुनर्वास स्थल पर बसे तीन हजार परिवारों को भूखंड का मालिकाना हक नहीं मिल पा रहा है। यह जमीन एनवीडीए के नाम होने से, डूब प्रभावितों को न तो भूखंड पर बैंक से कर्ज मिल पा रहा है और न ही वे इसे बेच पा रहे हैं।
  • पर्यटन विकास के लिए पूर्व और पश्चिम कालीभीत के जंगल को मिलाकर अभयारण्य की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। क्योंकि, सागौन का सघन जंगल होने के साथ यहां बड़ी संख्या में वन्य प्राणी भी हैं।

तुलसी सिलावट : सांवेर विधानसभा क्षेत्र

  • इंदौर बायपास से जुड़े ग्रामीण इलाकों में अभी तक नर्मदा पेयजल के लिए पाइप लाइन नहीं है। जबकि, नर्मदा लाइन देवास तक पहुंच चुकी है। अब देवास को इंदौर से पानी की जरूरत नहीं है, उसके हिस्से का पानी सांवेर विधानसभा क्षेत्र को दिया जा सकता है।
  • सांवेर इलाके में भी रोजगार को लेकर कोई बड़े औद्योगिक क्षेत्र नहीं हैं। बरलाई शुगर मिल की जमीन का उपयोग इसके लिए किया सकता है।

गोविंद सिंह राजपूत : सुरखी विधानसभा क्षेत्र

  • सागर जिले के सुरखी विधानसभा क्षेत्र के तहत सुरखी, बिलेहरा, राहतगढ़, जैसीनगर मूलत: कृषि आधारित इलाके हैं। सिंचाई के लिए यहां के किसान पुरातन जलस्रोतों पर अधिक आश्रित हैं। सुरखी और रायसेन जिले की सीमा पर तीन साल पहले बेबस सिंचाई परियोजना का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इस पर अब शीघ्र निर्णय लिया जाना चाहिए।
  • जल संसाधन विभाग ने बेबस सिंचाई परियोजना का पूरा प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा था, सर्वे भी हो चुका था, लेकिन अनुमति नहीं मिल सकी। यह परियोजना स्वीकृत होने से सागर की पेयजल परियोजना को भी फायदा मिल सकता है।

इमरती देवी : डबरा विधानसभा क्षेत्र

  • ग्वालियर जिले के डबरा के लिए सबसे बड़ा मुद्दा स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी है। इलाके की ढाई लाख आबादी के लिए बनाया गया सिविल अस्पताल सिर्फ नाम का है। करीब साढ़े छह करोड़ रुपये मंजूर भी हुए हैं। यह कार्य पूरा होने से एक बड़ी आबादी को काफी मदद मिलेगी।
  • डबरा शहर के आधे इलाके में पेयजल नहीं पहुंच पाता है। हर बार गर्मी में पानी के लिए झगड़े होते हैं। अमृत जल योजना के तहत पाइप लाइन भी डाली गई है। गुणवत्ता का स्तर बेहतर नहीं होने से वह कभी भी टूट जाती है। नई पाइप लाइन का खर्च करीब 40 लाख रुपये बताया जा रहा है।

छह विधानसभा क्षेत्रों से चुनकर आते रहे, छह मंत्रियों से जुड़ी ये समस्याएं प्रमाण हैं कि बड़े नेताओं के इलाकों में भी छोटी-छोटी समस्याएं आम हैं। समस्याओं का यह विवरण भी आम आदमी द्वारा आमतौर पर दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं से ही लिया गया है। यदि इन परेशानियों को हम शेष प्रदेश की समस्याओं के साथ रखें, तो बहुत-सी ऐसी समानताएं साफ-साफ दिखाई देंगी, जो एक-एक करके बहुत बड़ी हो जाती हैं। मंत्रियों को परखने का एक पैमाना यह भी हो सकता है कि यदि वे अपने इलाके की समस्याओं को हल करवा पाते हैं, तो वहां से मिले अनुभवों के आधार पर प्रदेश की बाकी परेशानियों का निराकरण भी कर सकते हैं। स्वाभाविक है अपने ही मतदाताओं का विश्वास अर्जित करेंगे और प्रदेश के बड़े इलाके में अपनी उपस्थिति भी दर्ज करवाएंगे।

फिलहाल तो उम्मीद ही की जा सकती है कि राजनीतिक समायोजन की शह-मात में उभर कर आए ये नुमाइंदे, कुछ तो ऐसा जरूर करेंगे कि अपने क्षेत्र और प्रदेश की नाक ऊंची रख सकें!

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Ram Mandir Bhumi Pujan
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