स्वाधीनता संग्राम के लंबे कालखंड में देश में अनेक आंदोलन हुए। ऐसे अवसर भी आए जब किसी आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच मतभेद उभरे। इन मतभेदों ने आंदोलन को प्रभावित भी किया। जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद महात्मा गांधी को लगा कि राष्ट्र को ब्रिटिश सरकार के प्रति असहयोग का अहिंसक आंदोलन करना चाहिए। कुछ समय बाद असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, लेकिन आंदोलन से जुड़े एक समूह द्वारा चौरी-चौरा में पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया गया। इससे क्षुब्ध गांधी ने सफल हो रहे आंदोलन को वापस ले लिया। इस फैसले पर अनेक सवाल खड़े हुए। असहयोग आंदोलन वापस लेने के पीछे गांधी का एक सैद्धांतिक कारण था। उनका मानना था कि आंदोलन का महत्व सिर्फ उद्देश्य प्राप्ति के लिए नहीं होना चाहिए। आंदोलन का महत्व यह भी होना चाहिए कि उसे कितनी शुचिता और पवित्रता से चलाया जा रहा है। आंदोलन के संदर्भ में यह दृष्टिकोण हर दौर में प्रासंगिक है। इसके बाद भी देश में अनेक आंदोलन हुए। अंग्रेज सरकार द्वारा लगाए गए नमक कानून के विरोध में साबरमती आश्रम से महात्मा गांधी के नेतृत्व में पदयात्रा निकली। इस दांडी यात्रा ने समूचे भारतीय जनजीवन के लिए एक बड़ी रेखा खींच दी।

स्वाधीनता मिलने के बाद भी देश में आंदोलन हुए। वर्ष 1975 में कांग्रेस द्वारा लोकतंत्र को बंधक बनाकर थोपे गए आपातकाल के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आंदोलनों के माध्यम से कई दलों का उभार और विलय भी हुआ। लोकतंत्र में असहमति और असहमति से उभरे आंदोलन गलत नहीं हैं। आंदोलनों के माध्यम से जनता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी प्रकट होती है। प्रश्न उठता है कि एक संविधानसम्मत व्यवस्था वाले लोकतंत्र में किस आंदोलन को सही और सफल माना जाए? जो आंदोलन देश की सांस्कृतिक-राजनीतिक जड़ों से जुड़ा हो और अपना वैचारिक आधार रखता हो, उसके सफल होने की संभावना अधिक रहती है। इससे इतर आंदोलन सफल नहीं हो पाते, क्योंकि उनमें साधन और साध्य की शुचिता नहीं होती। येन-केन-प्रकारेण आंदोलन करके उद्देश्य हासिल करने की मंशा रखने वाले आंदोलन न तो जनता के मानस को प्रभावित कर पाते हैं और न ही देश के हितों को साध पाते हैं। गांधी के सिद्धांत भी ऐसे आंदोलनों के खिलाफ हैं।

आजादी के बाद सात दशकों से अधिक की यात्रा में एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है, जिसने आंदोलन को ही अपने जीवन का आधार मान लिया है। इस वर्ग के लिए आंदोलन का उद्देश्य है, समाज में नकारात्मकता के भाव को जगाकर उसके बीच अपनी नेतागीरी की धौंस जमाए रखना। इसके अतिरिक्त इस वर्ग के लिए आंदोलन का और कोई मतलब नहीं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे ही लोगों के लिए आंदोलनजीवी के रूप में एकदम सटीक संबोधन दिया। वर्तमान में किसान आंदोलन के नाम पर जुटे कुछ आंदोलनजीवियों की पहचान जरूरी है। आखिर यह आंदोलनजीवी वर्ग पैदा कहां से हुआ? 2014 में मोदी सरकार बनने से पहले देश में एक ऐसा सुविधाभोगी वर्ग था, जो वामपंथी विचारधारा की छत्रछाया में शैक्षणिक संस्थानों से लेकर अकादमिक जगत और विभिन्न पुरस्कारों तक में अपना वर्चस्व जमाए हुए था। विदेशी चंदे से पोषित यह वर्ग विदेशों के दौरे करता था और विभिन्न कार्यक्रमों में भारतीयता के विचारों को कमतर बताता था, लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारतीय शासन व्यवस्था में देश के असली और जमीनी लोगों को जगह मिलने लगी। पद्म पुरस्कार दूरदराज के इलाकों और गांवों में मौजूद सुपात्र लोगों तक पहुंचने लगे। पुरस्कारों और सम्मानों से इस वर्ग का एकाधिकार खत्म होता गया। परिणामस्वरूप यह वर्ग हर हाल में सरकार के विरोध के अवसर तलाशता रहता है। आंदोलन जैसा भी हो, जिसका भी हो, जहां भी हो, यह वर्ग अपना तिरपाल तानकर वहां पहुंच जाता है।

किसानों की बात करें तो दस करोड़ किसानों के खाते में सीधे किसान सम्मान निधि पहुंचाई गई है। इसी तरह भू-स्वामित्व योजना के द्वारा किसानों को मजबूती देने का काम भी सरकार ने किया है, लेकिन इन विषयों पर आंदोलनजीवियों का मुंह बंद ही रहता है। मोदी सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाओं पर भी यह वर्ग मौन साधे रहता है। यदि आंदोलनजीवियों के आंदोलनों के इतिहास को टटोला जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जाती है। 2015 में इन्होंने पुरस्कार वापसी का वितंडा शुरू किया, जो कुछ दिन चला और गायब हो गया। यह सरकार को अस्थिर करने की एक कोशिश थी, जो नाकाम रही। अब सरकार सही मायने में योग्य लोगों को पुरस्कार देने लगी है और पुरस्कार वापसी करने वाले अप्रासंगिक हो गए हैं। इसी दौर में अचानक 'भू-अधिग्रहण संशोधन विधेयकÓ पर भी आंदोलन खड़ा हुआ, लेकिन आज कई राज्यों के द्वारा संशोधन के साथ यह लागू किया गया है। आंदोलनजीवी इस पर भी मुद्दाविहीन होकर मौन हैं। 2016 में अचानक देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर आंदोलन जोर पकडऩे लगा, लेकिन जल्दी-ही यह सामने आ गया कि इस आंदोलन के स्वर देशविरोधी मानसिकता से जुड़े थे। सच सामने आते ही यह आंदोलन भी समाप्त हो गया। राफेल सौदे को लेकर राहुल गांधी ने झूठ आधारित दुष्प्रचार फैलाया तो आंदोलनजीवी वर्ग ने उसे भी लपकने में देर नहीं की, लेकिन जब सर्वोच्च न्यायालय में राहुल ने इस मामले पर माफी मांगी तो यह वर्ग चुप हो गया।

आंदोलनजीवियों को सोचना चाहिए कि क्या सड़क घेरकर बैठ जाना सत्याग्रह है? जब एक राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में किसानों से किए वादे को पूरा करता है तो उसे किसान विरोधी करार देना क्या किसी आंदोलन का उद्देश्य हो सकता है? ऐसे जो आंदोलन चलाए जाते हैं, क्या उन्हेंं अपने खर्चों का विवरण देकर पारदर्शिता का परिचय नहीं देना चाहिए? सरकार की आलोचना का अधिकार विपक्ष और जनसामान्य, दोनों को है, लेकिन क्या आलोचना की आड़ में नकारात्मकता ही फैलाई जानी चाहिए? सवाल यह भी है कि क्या आंदोलन के नाम पर हिंसा जायज है? क्या राष्ट्रीय पर्वों एवं प्रतीकों का अपमान स्वीकार किया जा सकता है ? आज जब देश आजादी के 75 साल पूरे करने जा रहा और हम गांधी के मूल्यों, नीतियों एवं सिद्धांतों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, तब हमें जनजीवन में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से प्रेरित आंदोलन करने चाहिए, न कि पेशेवर आंदोलनकारी बनकर देश में सदैव असंतोष की स्थिति बनाए रखने का काम करना चाहिए।

(लेखक राज्यसभा सदस्य एवं भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)

Posted By: Arvind Dubey

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