शिवराज सिंह चौहान

प्रखर राष्ट्रवादी, एकात्म मानव दर्शन और अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के चरणों में कोटिश: नमन। हम सबके प्रेरणास्रोत और भारत के लिए जीवन समर्पित करने वाले श्रद्धेय पंडित जी कुशल संगठक, चिंतक व भारत निर्माण के स्वप्नदृष्टा थे। उन्होंने व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र के विकास का समूचा दर्शन दिया। अपनी संस्कृति, संस्कारों, परंपराओं, जीवन मूल्यों के आधार पर देश निर्माण का विचार दिया। विश्व के विकास और कल्याण की सभी संभावनाएं उनके द्वारा दिए गए एकात्म मानव दर्शन में हैं। पंडित दीनदयाल जी ने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए, उसके विकास के लिए चार पुरुषार्थ की अवधारणा को स्पष्ट किया। उनका मानना था कि व्यक्ति में प्रतिभा भी है और उसकी आवश्यकताएं भी हैं, लेकिन उसका मन व्यापक होता है। वह भ्रमित हो सकता है।

मनुष्य सकारात्मक दिशा में बढ़े, इसके लिए मन का संतुलन और अनुशासन जरूरी है। यह बुद्धि और विवेक से ही संभव है। इसके लिए चार पुरुषार्थ आवश्यक हैं। चार पुरुषार्थ में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का समावेश है। जीवन अर्थ प्रधान है, अर्थ उपार्जन के लिए मनुष्य भटक सकता है। अर्थ उपार्जन आवश्यक तो है, लेकिन उसका मार्ग क्या होना चाहिए, इसके लिए पंडित जी का मानना था कि पहले मनुष्य मानव धर्म के मार्ग पर चले। यहां धर्म केवल पूजा पद्धति नहीं है, पूजा पद्धति एक छोटा सा भाग है। अपने उचित कर्तव्यों को अपनाएं और उसी के माध्यम से अर्थ उपार्जन करें। तीसरा पुरुषार्थ है काम। मन की समस्त कामनाएं काम की परिभाषा में आती हैं, लेकिन मन की कामनाओं से लक्ष्य भ्रमित न हो इसलिए हमारे ध्यान में मोक्ष अर्थात् जीवन काल का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए।

निष्काम भाव से कार्य करने वाला व्यक्ति कर्म बंधन से छूटकर मोक्ष का अधिकारी होगा। यदि चार पुरुषार्थ की मर्यादा में व्यक्ति को उसके विकास के सभी अवसर प्रदान किए जाएं, तो संसार उस श्रेष्ठ स्वरूप को प्राप्त कर सकता है जिसकी कल्पना वेदों में है। यह पूर्ण यानी एकात्म मानव की कल्पना है, जिसे पंडित दीनदयाल जी ने एकात्म मानव दर्शन के रूप में दिया। पंडित जी की किशोरावस्था का एक प्रेरक प्रसंग है- वे सब्जी लेने बाजार गए और सब्जी बेचने वाली वृद्धा को चवन्नी का भुगतान कर दिया। घर लौटते समय उन्होंने जेब टटोली, तो देखा कि वह वृद्धा को खोटी चवन्नी दे आए हैं। उनका मन इतना दुखी और द्रवित हो गया कि वे दौड़ते हुए उस वृद्धा के पास गए और उससे क्षमा प्रार्थना के साथ खोटी चवन्नी वापस लेकर खरी चवन्नी दे दी।

आज भारतीय जनता पार्टी का जो स्वरूप दिखाई दे रहा है, इसकी नींव डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के साथ मिलकर जनसंघ के रूप में रखी थी। उन्होंने अपना जीवन देश को समर्पित कर दिया। पूरा देश ही उनका परिवार था। उनकी कार्यकुशलता और समर्पण देख डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाते, तो मैं पूरे हिंदुस्तान को बदल देता। पंडित दीनदयाल जी राष्ट्रवादी विचारक, भारत माता के पुजारी और भारतीय संस्कृति के उपासक थे। पंडित जी कहते थे हमारी संस्कृति, हमारा देश, हमारी परंपराएं और जीवन मूल्य अत्यंत प्राचीन हैं। अपने जो संस्कार हैं, अपने जो मूल्य हैं, उनके आधार पर हम अपना देश बनाएंगे। उनके विकास का आधार एकात्म मानवदर्शन था। वे कहते थे एक ही चेतना, सभी जड़-चेतन में है। अर्थात भगवान को हम किसी भी रूप में मानें, वे हम सबके अंदर विराजमान हैं और उन्हीं का प्रकाश हम सब में है।

पंडित जी अंतिम पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति का विकास चाहते थे। वे एक चौपाई अक्सर बोलते थे- 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई...। अर्थात दूसरों की भलाई करने से बड़ा कोई धर्म नहीं। मुझे संतोष है कि पंडित जी के दिखाए मार्ग पर चलकर हम मध्य प्रदेश की प्रगति और जनता के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। प्रदेश में हमने पंडित जी के दर्शन और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की प्रेरणा से लोक कल्याण की योजनाएं लागू की हैं। पंडित जी के अंत्योदय के सपने को साकार करने के लिए मुख्यमंत्री भू-अधिकार योजना शुरू की। इसमें बेघर को भू-खंड उपलब्ध कराया जा रहा है। यह दरिद्र नारायण की सेवा है। पंडित जी ने कहा था- 'हमें सबके लिए काम करना है। जो गरीब है, सबसे पीछे और सबसे नीचे है, वह दरिद्र ही अपना भगवान है।

(लेखक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

Posted By: Prashant Pandey

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