जैन समाज के पर्युषण पर्व पर मुंबई में मांस की बिक्री पर रोक के आदेश से उभरे विवाद का सुप्रीम कोर्ट ने पटाक्षेप तो कर दिया, लेकिन इस विवाद ने जिस बहस को जन्म दिया, वह अभी भी कायम है। इस मामले ने राजनीति और समाज को भी कुछ सोचने का अवसर दिया है। इस विवाद की शुरुआत मुंबई के उपनगर मीरा-भायंदर में मांस की बिक्री रोकने के स्थानीय निकाय के आदेश और फिर उसके बाद मुंबई में बीएमसी के ऐसे ही आदेश से हुई। बाद में राजस्थान सरकार ने तीन दिन और छत्तीसगढ़ शासन ने भी दो दिन मांस बिक्री रोकने के आदेश जारी किए।

हालांकि इन राज्यों में पहले से ऐसी रोक लगती रही है, लेकिन प्रचार इस तरह हुआ जैसे नए सिरे से मांस बिक्री पर पाबंदी लग रही है। मुंबई में चार दिन तक मांस बिक्री पर पाबंदी के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और उसने पाबंदी को एक दिन तक सीमित कर दिया। हाईकोर्ट के इसी फैसले को जब जैन समाज की एक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी तो उसने यह कहते हुए मामले में दखल देने से इनकार कर दिया कि इस तरह का कोई भी प्रतिबंध किसी पर थोपा नहीं जा सकता और जैन समाज के लिए तो जीवहत्या हर दिन अपराध है। ऐसे में केवल कुछ दिनों की पाबंदी का क्या मतलब? सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सहनशीलता और करुणा जैसे मानवीय गुण केवल त्योहारों के लिए नहीं, हमेशा के लिए हैं।

भारत की सांस्कृतिक विरासत और मूल्यों-मान्यताओं में जीवहत्या को पाप माना गया है। आज भी हिंदू समुदाय के एक बड़े हिस्से में मांसाहार वर्जित है। जिन देशों में शाकाहार जीवनशैली का हिस्सा है उनमें भारत अग्रणी है, लेकिन भारत में मुस्लिमों की भी खासी आबादी है, जिनके लिए मांसाहार सामान्य बात है। हिंदुओं का भी एक हिस्सा मांसाहार में कोई बुराई नहीं देखता। इसी स्थिति ने एक बहस का अवसर दिया। बहस का आधार लोगों की खान-पान की रुचि के साथ-साथ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर भी टिका। बहस की आड़ में राजनीति भी की गई। जब भाजपा नेताओं ने जैन पर्व के दौरान मुंबई में मांस बिक्री पर प्रतिबंध की वकालत की तो शिवसेना ने अलग दिखने के नाम पर विरोध करना शुरू कर दिया और इस क्रम में उसके नेताओं ने मांस बेचने का भी काम किया। शिवसेना से आगे निकलने की होड़ में मनसे नेताओं ने भी यही काम किया।

भाजपा नेताओं ने मांस बिक्री पर रोक की जिस तरह पैरवी की, उससे यही संकेत मिला कि कहीं न कहीं वोट बैंक की राजनीति करने की कोशिश की गई। वोट बैंक की इसी राजनीति की झलक भाजपा विरोधी दलों की आपत्ति से भी मिली। उन्होंने लोगों को समझाने की कोशिश की कि भाजपा सरकारें मीट बिक्री पर रोक का नया एजेंडा लागू कर रही हैं। अपने देश में पर्व विशेष पर किसी धार्मिक स्थल या शहर में मांस बिक्री पर रोक नई बात नहीं, लेकिन मुंबई जैसे महानगर में ऐसी पहल तर्कसंगत नजर नहीं आती।

धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों में न्यायिक तंत्र के हस्तक्षेप की न केवल एक सीमा होती है, बल्कि उसकी व्याख्या भी अलग-अलग मामलों पर अलग-अलग हो सकती है। इसका एक उदाहरण मांस बिक्री पर प्रतिबंध के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की ताजा राय से भी मिलता है, लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट ने एक समय पर्युषण पर्व पर अहमदाबाद में मांस बिक्री की रोक के पक्ष में फैसला दिया था। तब जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस सेमा की पीठ का तर्क यह था कि यदि कुछ दिन बूचड़खाने बंद रहें तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? अहमदाबाद में आज भी यह आदेश प्रभावी है। स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश ऐसे मामलों में अपनी निजी राय के आधार पर भी फैसला देते हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि इस प्रकार के मामलों के लिए न तो कोई कानून है और न ही बन सकता है।

मांस बिक्री पर प्रतिबंध पर बहस से कुल मिलाकर यही सामने आया कि एक आधुनिक और प्रगतिशील समाज में प्रतिबंधों से बचा जाना चाहिए। पर्युषण पर्व पर मांस की बिक्री पर जैसा प्रतिबंध लगाया गया, वैसी ही पाबंदियां अन्य अनेक बातों पर लगाने की मांग जब-तब सुनाई देती रहती है। अकसर उसमें राजनीति होती है और कई बार सियासी दल अपनी विचारधारा के आधार पर किसी प्रतिबंध के पक्ष में आ जाते हैं। तथ्य यह भी है कि समुदाय विशेष के सम्मान के लिए मांस बिक्री पर रोक या फिर विभिन्न् उत्सवों पर शराब-बिक्री पर प्रतिबंध एक पुरानी परंपरा है। गुजरात एक ऐसा राज्य है जहां शराब पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसका एक आधार यह है कि गुजरात का संबंध महात्मा गांधी से है, जो शराब को समाज की सबसे बड़ी बुराइयों में से एक मानते थे। प्रतिबंध के बावजूद वहां शराब की अवैध बिक्री और सेवन का सिलसिला कायम है।

कुछ यही हाल कला-साहित्य के मामले में भी देखने को मिलता है। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, लेकिन अपने देश में संवेदनशील साहित्य पर प्रतिबंध लगाने का सिलसिला आज भी कायम है। भारत में तमाम ऐसी पुस्तकों पर किसी न किसी आधार पर पाबंदी लगती रही है जो दूसरे देशों में खूब पढ़ी गईं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अथवा सूचना के अधिकार के तहत किसी को कुछ भी कहने-लिखने अथवा पढ़ने की आजादी है, लेकिन कई बार ऐसी पुस्तकें सामने आ जाती हैं जिनसे समाज को नुकसान पहुंचने का खतरा होता है। भारत जैसे विविधता वाले देश में इस खतरे की अनदेखी करना ठीक नहीं। इस बार मुंबई या अन्य स्थानों पर मांस के कारोबार पर प्रतिबंध का आर्थिक कारणों से भी विरोध किया गया, क्योंकि यह पाबंदी मांस का कारोबार करने वाले लोगों को आर्थिक क्षति पहुंचाने वाली थी। इस लिहाज से उनके विरोध को अनुचित नहीं कहा जा सकता। कुछ दिन मांस सेवन से परहेज की अपेक्षा करने में हर्ज नहीं, लेकिन यह सोचा जाना चाहिए कि मांस बिक्री पर रोक तो आर्थिक नुकसान का कारण बनेगी।

हमारे नेताओं को इस पर ध्यान देना चाहिए था कि मुंबई जैसे शहर में मांस पर चार दिन की पाबंदी को सहज रूप में नहीं लिया जाएगा। वास्तव में इस तरह के मामलों में राजनीतिक अथवा प्रशासनिक से अधिक सामाजिक पहल की आवश्यकता होती है। लखनऊ में केवल एक दिन के लिए बूचड़खाने बंद रखने का आदेश जारी किया गया और मांस कारोबारियों को इसका पालन करने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

भारत सामाजिक मसलों को समाज के स्तर पर ही हल करने के लिए जाना जाता रहा है। किसी समुदाय की धार्मिक भावना के सम्मान के लिए मांस के कारोबारियों को भरोसे में लेकर कोई पहल करने का काम प्रभावी रूप से समाज के स्तर पर ही किया जा सकता है। ऐसे मामलों में राजनीतिक-प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप अकसर ध्रुवीकरण और विवाद को ही जन्म देता है।

शाकाहार भारतीय जीवनशैली का अभिन्न् अंग है और तमाम आधुनिकता के बावजूद उससे दूर जाना संभव नहीं। हमारे नेताओं को कोशिश इस बात की करनी चाहिए कि धार्मिक मान्यताएं समाज में विभाजन का माध्यम न बनें और एक ऐसा माहौल बने जिसमें एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान सभी करें और इसके लिए अपने स्तर पर ही जरूरी कदम उठाने के लिए तैयार रहें।

(लेखक दैनिक जागरण समूह के सीईओ व प्रधान संपादक हैं)

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