आशीष व्यास

महाराष्ट्र से लगती मध्य प्रदेश की सेंधवा सीमा प्रवासी श्रमिकों के दर्द से कराह रही है। सबसे दुखद यह है कि घर लौटने के दौरान राज्य में उत्तर प्रदेश के 18 मजदूरों की जान भी जा चुकी है! 30 अप्रैल से सीमा सील होते ही, मजदूरों ने जंगल के रास्ते और वाहनों में छुपकर जाने की शुरुआत की। उप्र सरकार ने मजदूरों को अपनी सीमा में लेने से जैसे ही असहमति जताई, सेंधवा सीमा पर उप्र के मजदूर शरणार्थी बन गए। सीमा में प्रवेश नहीं दिया तो कई बार चक्काजाम, पथराव और हंगामा भी किया गया। छूट मिलने पर मजदूर पैदल, साइकिल और वाहनों से घर की ओर चल पड़े। ऐसे ही, गुजरात से मप्र में प्रवेश का जरिया है पिटोल चेक पोस्ट। उप्र जाने के लिए गाड़ियों में सवार सात हजार लोग सीमा पर पहुंचे, प्रवेश नहीं मिलने पर वे भी नाराज हो गए। विरोध दर्ज करवाया गया। इसी तरह झारखंड जाने के लिए सीमा तक 10 बसों से पहुंचे 500 लोगों ने बताया कि वाहन चालकों ने चार-चार हजार रुपये वसूल लिए! यह केवल कुछ उदाहरण हैं। मध्य प्रदेश से लगती पांच राज्यों की सीमाओं से ऐसी अनेक कहानियां आसानी से सुनी-सुनाई जा सकती हैं। यह हाल बता रहा है कि राज्यों के बीच संवाद-समन्वय जैसी कोई व्यवस्था फिलहाल दिखाई नहीं दे रही है।

अव्यवस्था-अराजकता के इस परिदृश्य को हम ऐसे भी समझ सकते हैं - 73 साल पहले एक लकीर रेडक्लिफ नाम के एक अंग्रेज ने खींची थी, हिंदुस्तान के विभाजन की। क्या अब वैसी ही लकीरें राज्यों में आपस में खींच दी गई हैं? चिंताजनक यह भी है कि इस विभाजन के लिए इंग्लैंड से कोई गोरा अफसर नहीं आया, बल्कि हमने खुद ही अपनी सोच-समझ का बंटवारा कर लिया है। गुलामी ने देश बांटा था, कोरोना ने अब राज्यों को ही बांट दिया है। कोरोनाकाल ने वर्तमान पीढ़ी के सामने वह दृश्य खींचा है, जो अब तक किस्सों-किताबों या कविता-कहानियों में पढ़ने-सुनने को मिलता था। बीते एक सप्ताह से वे सारे दृश्य बार-बार जीवंत होकर राज्यों की सीमाओं, हाइवे, बायपास, टोल-नाका और शहरी क्षेत्रों से गुजरते रास्तों पर नजर आ रहे हैं। थके-रुके, गिरते-उठते, रोते-बिलखते, मरते-जीते लाखों लाख लोगों का यह कारवां चलता जा रहा है। कल्पना कीजिए, सैकड़ों किमी पैदल चलने के लिए, पहला कदम उठाने का दुस्साहस करने वाले इन मजदूरों के लिए भय, भूख और भाग्य का चक्रव्यूह कितना भयावह है।

अंतहीन पीड़ा वाले इन पलों के बीच, सबसे बड़ी विडंबना मध्य प्रदेश की है। देश के दिल पर से भटकते-चलते हुए लाखों लोग, छाले भरे पैरों से गुजर रहे हैं। सभी ने अपने-अपने राज्यों से उन्हें 'हकाल' दिया है। झाबुआ के पिटोल से गुजरात, सेंधवा से लगा हुआ महाराष्ट्र, मंदसौर-नीमच से सटा हुआ राजस्थान, शिवपुरी की सीमा पर उप्र, अनूपपुर-बालाघाट के करीब

छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र, सभी तरफ से लाखों की संख्या में मजबूर-मजदूर मध्य प्रदेश की सीमा पर आकर खड़े हो गए हैं। रस्सी-बल्लियों के सहारे, राज्यों की बीच खींच दी गई सीमा के उस पार जब 'जन' आकर रुकता है, तब 'तंत्र' के लिए, अपने (प्रदेश) और पराए (दूसरे राज्य) का अंतर करना कठिन हो जाता है। दुविधा इस बात की भी रहती है कि कैसे अपनों को लक्ष्मण रेखा के भीतर सुरक्षित कर लें और बाकियों को धरती लांघने ही न दें। विवाद-विवशता के बीच पिछले डेढ़ महीने में लाखों मजदूर कई राज्यों को अपना पड़ाव बना चुके हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस कारवां में 70 प्रतिशत मजदूर उत्तर प्रदेश के हैं और 30 प्रतिशत राजस्थान, बिहार और उत्तर-पूर्वी राज्यों के। यात्रा की परेशानियों को झेलते हुए अपने घर तक कितने पहुंचेंगे, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। शायद राज्य सरकारें ऐसे किसी आंकड़े को लेकर कोई कार्ययोजना भी नहीं बनाएंगी।

चार करोड़ की आबादी, किसी गिनती में नहीं!

पलायन पर विश्व बैंक द्वारा अप्रैल में जारी रिपोर्ट के अनुसार कोरोना संक्रमण के कारण पूरे देश में पलायन करने वाले लोगों की संख्या करीब चार करोड़ है। इसके अलावा हजारों मजदूर अपने ही राज्यों के शहरों से गांवों में चले गए। यह संख्या शहरी इलाकों में असंगठित कामगारों की है। इनमें प्लम्बर, मैकेनिक, रेहड़ी लगाने वाले, फल- सब्जी विक्रेता से लेकर नाई, धोबी, रिक्शा चलाने वाले, कूड़ा बीनने वाले, दिहाड़ी मजदूर सहित मैनेजमेंट और आइटी कंपनियों में काम करने वाले भी हो सकते हैं। महामारी ने महसूस करवाया है कि इतनी बड़ी आबादी के लिए, किसी भी राज्य ने कभी कोई पुख्ता योजना बनाई ही नहीं। राज्य इन्हें अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने का कलपुर्जा समझते रहे। जैसे ही मशीन थमी, सारे पुर्जों को बाहर निकाल फेंका। भूला तो यह भी नहीं जाना चाहिए कि सालभर पहले ही लोकसभा-विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए, मध्य प्रदेश ने इन्हीं मजदूरों को गुजरात-महाराष्ट्र से पीले चावल देकर बुलवाया था। लेकिन, अब इन्हें बेहाल-बेसहारा छोड़ दिया गया है।

पानी पर चली आ रही सदी की दुश्मनी भी छोटी पड़ गई!

अब तक राज्यों के बीच विवाद के ऐसे विषय सिर्फ पानी को लेकर ही देखे गए हैं। कर्नाटक-तमिलनाडु के मध्य 125 साल से चला आ रहा कावेरी जल विवाद, आजादी के समय से मप्र-उप्र के बीच केन-बेतवा परियोजना को लेकर चल रही लड़ाई, अभी भी सुलझी नहीं है। गोदावरी जल के लिए महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा व आंध्रप्रदेश के बीच बहुत अनबन रही है। रावी-ब्यास के जरिए पंजाब-राजस्थान का विवाद भी चर्चित रहा है। लेकिन, कोरोनाकाल में राज्यों ने जिस तरह से, अपने-अपने इलाकों से, दूसरे राज्यों के मजदूरों को निकाला, उससे तो पानी को लेकर चली आ रही सदीभर की दुश्मनी भी छोटी पड़ती दिखाई दे रही है। यह तो तय है कि कोरोना से मिलकर लड़ने की रणनीति के बजाय अपनी सीमाएं सुरक्षित करने की बेतुकी जिद का परिणाम अच्छा नहीं होगा। इस बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन भी पहले ही सचेत कर चुका है। तारीख की घोषणा तक हो चुकी है कि 20 मई से 20 जून के बीच, एक बार फिर कोरोना संक्रमण तेजी से फैलेगा! बहुत स्पष्ट है कि इसका सबसे बड़ा कारण पलायन ही रहेगा। यदि भविष्य को स्वस्थ-सुरक्षित बनाना है, तो राज्यों को अभी से कमर कसना होगी।

कहां है मध्य प्रदेश का रिवर्स पलायन प्लान

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश के पलायन आयोग से 'रिवर्स पलायन' प्लान मांगा है। उन्होंने कहा कि बाहरी राज्यों से गांव लौटे उत्तराखंडवासियों को किस तरह राज्य में ही रोका जा सकता है, इसे लेकर रणनीति तैयार की जाए। मध्य प्रदेश में भी एक बड़ी आबादी हर साल पलायन करती है। जाहिर है, ये सभी अपने-अपने गांव लौटे ही होंगे। मप्र-उप्र के, बुंदेलखंड के सिर्फ 13 जिलों में ही 62 लाख किसान-मजदूरों के पलायन का मामला कई बार उठ चुका है। यदि इस आंकड़े में कोई बढ़ोतरी नहीं भी हुई हो, तब भी बड़ी संख्या में पलायन कर चुके लोग अपने गांव लौटे ही होंगे। उधर, झाबुआ-आलीराजपुर जैसे जिलों के आदिवासी बाहुल्य गांव आबाद होने लगे हैं। बावजूद इसके सरकार की रणनीति में पुनर्वास जैसी कोई योजना अभी तक दिखाई-सुनाई नहीं दे रही है। जबकि आपदा में अवसर तलाशने का इससे बेहतर अवसर मप्र को शायद फिर कभी नहीं मिलेगा।

संविधान निर्माताओं ने कल्पना नहीं की थी!

लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान पर लगभग 100 पुस्तकें लिख चुके, संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का मानना है कि यह अभूतपूर्व आपदा है। इसके बारे में संविधान निर्माताओं ने भी कल्पना नहीं की थी। इसीलिए, संविधान में ऐसी स्थितियों से निपटने की कोई विशेष व्याख्या नहीं है। केंद्र, राज्य, स्थानीय निकायों को मिलकर काम करना चाहिए। लेकिन, इस स्थिति को संभालने की ताकत सिर्फ भारतीय समाज में ही है। अब लोग ही एक-दूसरे का हाथ थामकर, पूरे देश को बचा सकते हैं।

...इसलिए अब लकीरों को मिटाने का समय आ गया है। केंद्र सरकार की नीतियों के साथ, राज्यों की अपनी जिम्मेदार-जवाबदारी पर सवाल-सुझाव लगातार आ रहे हैं। बेहतर होगा सरकारें जनसरोकारों से सीधा संवाद करें, सार्थक समाधान दें, कम से कम कुछ ऐसा तो जरूर करें, जिससे उनके अस्तित्व में होने का आभास ही बना रहे!

Posted By: Ravindra Soni

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