कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी की वापसी नाजुक दौर में हुई है। अगले कुछ महीनों में महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं और ये चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए चुनौती भी हैं तथा अवसर भी। यदि इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो निश्चित ही कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा होगा और साथ ही यह संदेश भी जाएगा कि 'कांग्रेस-मुक्त भारत अभी भी दूर की कौड़ी है।

अब जबकि पार्टी इन विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी है, तो सोनिया व राहुल गांधी की कार्यशैलियों में अंतर साफ नजर आता है। जहां राहुल गांधी आदर्शवाद व अनिर्णय से ग्रस्त नजर आते हैं और युवा, उच्च पढ़े-लिखे नेताओं को तरजीह देते हैं, वहीं सोनिया गांधी का रवैया व्यावहारिक है। वे तुरंत निर्णय लेती हैं तथा अनुभव को तरजीह देती हैं।

इस बदलाव की झलक हरियाणा में साफ देखी जा सकती है, जहां पर कई नेता हैं- भूपिंदर सिंह हुडा, अशोक तंवर, रणदीप सिंह सुरजेवाला और कुमारी शैलजा। सोनिया ने हरियाणा में कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान हुडा को सौंप दी है, जो एक जाट नेता हैं और दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। राहुल गांधी के अध्यक्षीय कार्यकाल में हुडा दरकिनार कर दिए गए थे और युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर को ज्यादा तवज्जो मिली और उन्हें हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष भी बना दिया गया। वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव से पूर्व हुडा और तंवर के मध्य तनाव काफी बढ़ गया, जिसे 'जाट बनाम दलित के टकराव के रूप में देखा गया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा इस राज्य में सभी सीटें जीतने में कामयाब रही।

अब हरियाणा में तंवर की जगह पर सोनिया की वफादार शैलजा को लाया गया है, लेकिन यह साफ है कि वहां पर हुडा ही कांग्रेस के चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख चेहरा होंगे। उन्हें कांग्रेस विधायक दल का नेता भी बनाया गया है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला (जो राहुल के करीबी हैं और पार्टी की राज्य इकाई के मुखिया के पद के दावेदार थे) दरकिनार कर दिए गए। उन्हें तो इस साल जींद विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद अपनी ही सीट को जीतने के लिए काफी मेहनत करनी होगी।

एक तरह से सोनिया हरियाणा में हुडा को कमान सौंपने के लिए मजबूर हुईं। इस जाट नेता ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से सबक लेते हुए पिछले महीने यह संदेश भेजा कि यदि कांग्रेस उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर सहमत नहीं होती तो वे अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं। उन्होंने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने का खुलेआम समर्थन कर भी यह दर्शाया कि उनके इरादे क्या हैं। हालांकि जनार्दन द्विवेदी और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे अन्य कांग्रेसी नेताओं ने भी एनडीए सरकार के इस कदम का स्वागत किया, लेकिन हुडा ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए यहां तक कहा कि 'कांग्रेस अपनी राह से भटक गई है। संभवत: उन्होंने भी कांग्रेस के राज्यसभा में मुख्य सचेतक भुवनेश्वर कलिता की तरह पार्टी छोड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी।

लेकिन सोनिया उन्हें खोना नहीं चाहती थीं। यदि वह हुडा को जाने देतीं, तो हरियाणा में भी पार्टी की वही नियति होती, जो आंध्र में हुई। गौरतलब है कि वर्ष 2010 में कांग्रेस ने जगन मोहन रेड्डी को साथ जोड़े रखने में नाकामी के साथ अपने एक मजबूत गढ़ को गंवा दिया। आज जगन मोहन रेड्डी आंध्र के मुख्यमंत्री हैं। सोनिया जानती हैं कि हुडा हरियाणा में मजबूत जनाधार वाले इकलौते नेता हैं। यह सही है कि फिलहाल वह भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं, लेकिन यह स्थिति तो कई कांग्रेस नेताओं के साथ है।

गांधी परिवार का करीबी होने का लाभ लेते हुए हुडा ने मुख्यमंत्री रहते सत्ता का भरपूर आनंद लिया, जबकि वे एक छोटे से राज्य के मुखिया थे। लेकिन बतौर मुख्यमंत्री उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ जमीन घोटाले का खुलासा हुआ। एजेएल-नेशनल हेराल्ड केस भी उनके कार्यकाल के दौरान हुआ, जो गांधी परिवार के लिए बेहद शर्मिंदगी का सबब बना। इससे गांधी परिवार का भरोसा उन पर घट गया।

अब सोनिया गांधी इतनी प्रैक्टिकल तो हैं जो उन्होंने समझा कि उनके पास हरियाणा में ऐसा कोई परफेक्ट नेता नहीं। इन चुनावों के लिए नेता की चुनाव जीतने की क्षमता ही एकमात्र पैमाना है, चूंकि कांग्रेस करो या मरो की स्थिति में है। इस लिहाज से हुडा सर्वश्रेष्ठ विकल्प हैं। यदि सोनिया हरियाणा लेकर पूरी तरह संजीदा हैं, तो उन्हें हुडा के साथ मिलकर काम करना होगा। आखिर वे राजद के दागी नेता लालू यादव के साथ भी तो काम कर चुकी हैं।

इसी तरह झारखंड में उन्होंने एक और वरिष्ठ नेता को पार्टी की कमान सौंपी है। ये हैं पूर्व पुलिस अफसर और आदिवासी नेता रामेश्वर उरांव, जो कि पार्टी के 'वरिष्ठ सिपहसालारों के करीबी हैं। उनके पूर्ववर्ती, हाई प्रोफाइल पूर्व आईपीएस अधिकारी अजय कुमार को राहुल गांधी ने 2017 में चुना था, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में हार के बाद उरांव और अन्य वरिष्ठ नेताओं पर ठीकरा फोड़ते हुए इस्तीफा दे दिया था। 72 वर्षीय उरांव झारखंड में विभाजित कांग्रेस को एक साथ लाने के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ विकल्प लगते हैं।

सोनिया गांधी गठबंधन को साधने के मामले में भी राहुल गांधी से कहीं बेहतर हैं। वे जानती हैं कि इस वक्त कांग्रेस की स्थिति कमजोर है, लिहाजा सहयोगियों को अतीत के मुकाबले कहीं ज्यादा स्पेस देना होगा। झारखंड में कांग्रेस गठबंधन की सूरत में झामुमो को ज्यादा सीटें दे सकती है। महाराष्ट्र में राकांपा के साथ बीस साल तक सीनियर पार्टनर की स्थिति में रहने के बाद अब कांग्रेस वहां 50-50 के फॉर्मूले पर सहमत है। महाराष्ट्र में तो ऐसा लगता है कि अनेक नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने के बाद सोनिया ने चुनावी रणनीति का पूरा जिम्मा शरद पवार को ही सौंप दिया है। यह उनके प्रैक्टिकल होने का एक और सबूत है कि जिन शरद पवार ने वर्ष 1999 में उनके 'विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए अपनी अलग पार्टी बना ली थी, आज उन्हीं पर वे पूरा भरोसा जता रही हैं।

राहुल गांधी कांग्रेस को एक ऐसे जीवंत, युवा संगठन के रूप में पुनर्गठित करना चाहते थे, जो सत्ता-लिप्सा के बजाय वैचारिक प्रतिबद्धता से संचालित हो। उन्होंने पार्टी के भीतर स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव, टिकट वितरण में पारदर्शिता, युवा व प्रतिभाशाली लोगों की पार्टी में लेने समेत कई प्रयोग किए। अब कहा जा रहा है कि पार्टी के पुराने लोगों द्वारा उनके प्रयासों को पलीता लगा दिया गया। लेकिन यह उन्हें कुछ ज्यादा ही श्रेय देना हुआ! हकीकत यह है कि राहुल गांधी और उनकी टीम चुनाव-दर-चुनाव नाकाम हुई। जो इक्का-दुक्का जीत मिलीं भी, चाहे पंजाब में हो या राजस्थान व मध्य प्रदेश में, वे पुराने नेताओं की वजह से ही मिलीं। अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस के ये पुराने सिपहसालार आगामी विधानसभा चुनावों में भी पार्टी की नियति बदल सकते हैं या नहीं!

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)