फिलहाल दुनिया भर में ब्याज दरें घटाने की होड़ चल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व पर दबाव बना रखा है कि हाल में की गई कटौती को जारी रखते हुए आगे भी ब्याज दरें घटाने पर काम करें। न्यूजीलैंड, थाईलैंड और भारत के केंद्रीय बैंकों ने भी पिछले महीने ब्याज दरों में कटौती की है। चीन ने आधिकारिक रूप से घोषणा नहीं की, परंतु माना जा रहा है कि वहां भी अंदरखाने ब्याज दरों में कटौती की गई है।

ब्याज दरों में कटौती के पीछे सोच यह है कि ब्याज दर कम होंगी तो उपभोक्ता कर्ज लेकर बाइक अथवा टीवी खरीदेंगे, जिससे बाजार में मांग बढ़ेगी। इसके साथ ही ब्याज दर न्यून होने से निवेशकों के लिए कर्ज लेकर फैक्ट्री लगाना आसान हो जाएगा और वे बाइक एवं टीवी इत्यादि बनाने के कारखाने लगाएंगे। इस प्रकार उपभोक्ता की मांग और निवेशक की आपूर्ति के बीच एक सही चक्र स्थापित हो जाएगा, लेकिन प्रश्न है कि क्या वास्तव में ऐसा होगा? इसकी पड़ताल के लिए हम अमेरिकी अर्थव्यवस्था का विश्लेषण कर सकते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिका द्वारा अपनाई गई नीतियों को ही दुनिया के तमाम देश अपनाते नजर आ रहे हैं।

अमेरिकन बैंक एसोसिएशन की एक विज्ञप्ति के अनुसार अमेरिका में श्रमिकों के वेतन दबाव में हैं और वे कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। हालांकि रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। इसका अर्थ है कि जो लोग अब तक बेरोजगार थे, उन्हें अब रोजगार मिल गया है, लेकिन रोजगार पाए हुए लोगों की तुलना में बेरोजगार लोगों की संख्या बहुत कम है। बाजार में मांग की गति जानने के लिए जो श्रमिक काम कर रहे हैं, उनकी खपत पर विचार करना होगा। वे दोहरा झटका झेल रहे हैं। एक तो उनके वेतन पर दबाव है और दूसरा, वे कर्ज के बोझ तले दबे हैं। फिर भी वे भारी मात्रा में खपत कर रहे हैं। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की विकास दर तीन प्रतिशत के मजबूत स्तर पर टिकी हुई है। इस बीच अहम प्रश्न यही है कि वेतन पर दबाव की स्थिति में भी वे कर्ज लेकर खपत क्यों कर रहे हैं?

ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आक्रामक स्वभाव और आत्मविश्वास से वह अमेरिकी जनता को भविष्य पर भरोसा दिला रहे हैं। उसी भविष्य पर भरोसे के चलते अमेरिकी नागरिक वेतन में गिरावट के बावजूद कर्ज लेकर खपत कर रहे हैं। इस खपत के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है। जैसे मौसम विभाग भविष्यवाणी करे कि वर्षा अच्छी होगी तो किसान चारों तरफ सूखा दिखने के बावजूद खेत में बुआई करने लगते हैं। वैसे ही अमेरिकी उपभोक्ता खपत में जुटे हैं।

दूसरा प्रश्न है कि अमेरिका की विकास दर इतनी मजबूत क्यों है? खासतौर से तब जब चीन के साथ उसका ट्रेड वार लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिकी निर्यात दबाव में हैं। उसकी प्रतिस्पर्द्धा क्षमता में भी कोई खास सुधार नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में विकास का स्रोत कहां है? रोजगार कहां से बढ़ रहे हैं?

इसके पीछ कहानी यह है कि अमेरिकी उपभोक्ताओं द्वारा टैक्सी और मसाज पार्लर जैसी तमाम सेवाओं की अधिकाधिक खपत की जा रही है। इन सेवाओं में रोजगार ज्यादा बनते हैं। इसलिए अमेरिका में उत्पादन स्थिर रहने और उसकी प्रतिस्पर्द्धा क्षमता भी सीमित रहने के बावजूद रोजगार बन रहे हैं। सारांश यह है कि इस समय अमेरिका में जो आर्थिक प्रगति हो रही है और रोजगार बन रहे हैं, उसका आधार ब्याज दरों में कटौती नहीं, बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा जनता में आत्मविश्वास पैदा करना है।

अमेरिकी सरकार की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने बड़ी कंपनियों पर और अमीरों पर आयकर में भारी कटौती की थी। इससे अमेरिकी सरकार के राजस्व में वृद्धि नहीं हो रही है। वर्ष 2017 में राष्ट्रपति ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के समय अमेरिकी सरकार का राजस्व 3320 अरब डॉलर था, जो वर्ष 2019 में 3440 अरब डॉलर होने का अनुमान है। यानी इसमें बहुत ही मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन अमेरिकी सरकार के खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं। इसी अवधि में अमेरिकी सरकार के खर्च 3900 अरब डॉलर से बढ़कर 4500 अरब डॉलर होने का अनुमान है। राजस्व में 120 अरब डॉलर की वृद्धि के मुकाबले खर्चों में 600 अरब डॉलर की वृद्धि हुई है। इन खर्चों को पोषित करने के लिए अमेरिकी सरकार भारी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्ज ले रही है। ऐसे में अमेरिका के मौजूदा तीव्र विकास का असली स्रोत यही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने जनता में भविष्य को लेकर आशा का संचार किया, जिसके चलते अमेरिकी जनता वेतन के दबाव में होने के बावजूद कर्ज लेकर खपत कर रही है। दूसरी तरफ अमेरिकी सरकार ने टैक्स कटौती की है। इसके चलते अपने बढ़े हुए खर्चों की भरपाई के लिए भारी मात्रा में कर्ज लेना पड़ रहा है। यानी अमेरिकी उपभोक्ता और अमेरिकी सरकार दोनों कर्ज के बोझ तले दबे जा रहे हैं और इसके दम पर ही अमेरिकी आर्थिक विकास में तेजी कायम है। इस आर्थिक विकास की कुंजी ब्याज दरों की कटौती में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के कारण लिए जाने वाले कर्ज में है।

जाहिर है कि कर्ज लेकर आर्थिक विकास हासिल करने की रणनीति की अपनी एक सीमा है और यह ज्यादा दिनों तक कारगर नहीं रहती। एक समय आता है, जब निवेशक समझ जाते हैं कि कर्ज लेने वाले की आंतरिक स्थिति डांवाडोल है और वे या तो कर्ज देना बंद कर देते हैं या फिर उसके लिए ऊंचा ब्याज मांगते हैं। इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा है कि वर्तमान में हो रहा आर्थिक विकास जोखिम भरा है और विश्लेषकों के बीच सहमति है कि ब्याज दरें घटाकर हम देशों को आर्थिक संकट से नहीं उबार पाएंगे।

अब यदि भारत में रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटा भी दे, तो भी आत्मविश्वास के अभाव में उपभोक्ता एवं निवेशक दोनों ही कर्ज लेने में कतराएंगे। ध्यान करें कि बीते समय में रिजर्व बैंक ने कई बार ब्याज दरों में कटौती की है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नहीं दिख रहे हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि भविष्य में आत्मविश्वास बढ़ने पर ही उपभोक्ता एवं निवेशक कर्ज लेते हैं। यानी सस्ता कर्ज स्वयं में अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का मंत्र नहीं है। सस्ता कर्ज केवल उस समय उपयोगी होता है, जब उपभोक्ता एवं निवेशक को भविष्य पर भरोसा होता है। बीते समय में तमाम उद्यमियों ने कहा है कि सरकारी अधिकारी उन्हें चोर की दृष्टि से देखते हैं। हाल में कैफे कॉफी डे के संस्थापक द्वारा आत्महत्या किए जाने के पीछे भी यही कारण बताया जा रहा है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह जनता और निवेशकों से वार्ता करे। निवेशकों को सम्मान दे और उनके मन में भविष्य के प्रति जो आशंका दिख रही है, उसका निवारण करे जिससे कर्ज लेकर खपत एवं निवेश का आदर्श चक्र स्थापित हो सके।

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आईआईएम, बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)