आशीष व्यास

शिक्षा के बढ़ते प्रभाव-प्रसार और अत्याधुनिक तकनीक ने डिजिटल साक्षरता की दिशा में नई संभावनाओं को जन्म देना शुरू कर दिया है। गांव-कस्बों में इंटरनेट की आसान पहुंच भी सूचना क्रांति में उल्लेखनीय योगदान दे रही है। आज सबसे पहले मध्य प्रदेश की तीन 'डिजिटल" घटनाएं।

पहली : विधानसभा में दी जाने वाली ध्यानाकर्षण और शून्यकाल की सूचना अब ऑनलाइन होने जा रही है। विधायक घर बैठकर ही सदन को ये सूचनाएं दे सकेंगे। यह व्यवस्था आठ जुलाई 2019 से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से लागू हो जाएगी।

दूसरी : झाबुआ जिले में झकनावदा पुलिस चौकी के प्रभारी भागीरथ बघेल ने बीते दिनों आत्महत्या कर ली। कमरे से पुलिस को सुसाइड नोट मिला, जिसमें लिखा है - पुलिस के लिए आधुनिक सॉफ्टवेयर (सीसीटीएनएस) को वे ऑपरेट भी नहीं कर पा रहे हैं!

तीसरी : इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. नरेंद्र धाकड़ को धारा-52 लगाकर बर्खास्त कर दिया गया। इसके ठीक एक दिन पहले सीईटी (कॉमन एंट्रेस टेस्ट) की ऑनलाइन परीक्षा तकनीकी अव्यवस्था से फेल हो गई थी।

इन तीनों घटनाओं को आपस में 'जोड़ा' जाए तो डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में प्रदेश के 'घटाव' का पता चलता है! यह अच्छा संकेत तो माना जा सकता है कि अब एक दिन बाद ही प्रदेश की विधानसभा लगभग ऑनलाइन हो जाएगी, लेकिन शेष दो घटनाएं यह इशारा भी कर रही हैं कि शेष प्रदेश में ऑनलाइन व्यवस्था और उसे चलाने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन अभी भी हाशिए पर ही है।

समस्या का समाधान ढूंढने के साथ यह जानना भी जरूरी है कि मप्र ने डिजिटल साक्षरता अभियान का 'पासवर्ड' 19 साल पहले धार में ज्ञानदूत योजना के बहाने सेट कर दिया था। वर्ष 2015 में यह पासवर्ड तब री-सेट हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया के तहत ग्राम पंचायतों में डिजिटल साक्षरता मिशन शुरू किया। उस दौरान इंदौर जिले में देपालपुर तहसील की जलालपुरा, तकीपुरा, छड़ोदा, बछोड़ा, बनेड़िया, खिमलावदा, खजराया, चांदेर, नेवरी आगरा सहित 10 ग्राम पंचायतें मिशन के लिए चयनित हुई थीं। बीएसएनएल ने आयोजन के समय तो हाई स्पीड इंटरनेट सेवाएं शुरू कर दीं, लेकिन अब वहां ऐसी सभी सुविधाएं बंद पड़ी हैं। सरपंचों और सदस्यों का कहना है कि युवा पीढ़ी के कुछ सदस्य लैपटॉप चलाना जानते हैं, वे अपनी निजी व्यवस्था से काम चला लेते हैं लेकिन बाकी के लिए तकनीक अभी भी एक समस्या की तरह ही है!

'क्लाउड' से तलाशेंगे समाधान

सरपंचों की दुविधा से तकनीकी जानकार भी सरोकार रखते हैं। बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में बोर्ड ऑफ स्टडीज के प्रमुख और कम्प्यूटर साइंस के विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल राजपूत मप्र में डिजिटलाइजेशन के असर व परिणाम पर कई शोध-पत्र तैयार कर चुके हैं। उनका आकलन है-'डिजिटलाइजेशन की ओर मध्य प्रदेश ने शुरुआती दौर में अच्छा कदम बढ़ाया था, लेकिन अब यह व्यवस्थाओं-अव्यवस्थाओं के बीच उलझकर रह गया है। जैसे, एमपी ऑनलाइन के जरिए इस बार लगभग साढ़े छह लाख विद्यार्थी प्रवेश ले रहे हैं। ग्रामीण अंचलों में हजारों की संख्या में ऐसे विद्यार्थी होते हैं, जो ऑनलाइन फॉर्म भरने के दौरान इंटरनेट की कमजोर स्पीड से परेशान होते हैं और यदि स्पीड अच्छी हो तो मोबाइल नेटवर्क खराब होने से ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) देरी से आता है। इस तकनीकी तालमेल को एक करने में काफी समय और पैसा खराब होता है।' ऐसी (अ)व्यवस्था को ठीक करने के लिए प्रोफेसर राजपूत शोधार्थियों के साथ मिलकर 'क्लाउड' (सारा डाटा एक जगह) पर काम करना चाहते हैं। ताकि, आवश्यकता के अनुसार सभी जानकारियों का तत्काल उपयोग किया जा सके।

ऐसी ही अव्यवस्थाओं को इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में सीईटी के दौरान आई परेशानी से भी जोड़ा जा सकता है। बड़ा सवाल यह है कि जिस शहर में आईआईटी, आईआईएम, एसजीएसआईटीएस (67 वर्ष पुराना इंजीनियरिंग संस्थान) जैसे प्रतिष्ठित और अनुभवी शिक्षा केंद्र हों, अनेक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज के साथ टीसीएस, इंफोसिस और आईटी पार्क में काम कर रही ढेरों सॉफ्टवेयर कंपनियां हों, वहां ऑनलाइन परीक्षा के लिए एक पुख्ता व्यवस्था विकसित क्यों नहीं की जा सकती? विद्यार्थियों के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग भी डिजिटल साक्षरता मिशन के लिए बड़ी चुनौती है। झाबुआ में पुलिस चौकी प्रभारी द्वारा पिछले दिनों आत्महत्या करना एक ताजा उदाहरण है। ऐसी ही खाई की भरपाई के लिए जबलपुर में सरकारी कर्मचारियों को डिजिटल साक्षर बनाने की दिशा में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। पुलिस विभाग के साथ इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहीं कम्प्यूटर साइंस की प्रोफेसर सिबी सैम्युल कहती हैं- 'यह सिर्फ एक चौकी प्रभारी की परेशानी ही नहीं है, बल्कि बहुत से सरकारी कर्मचारियों को डिजिटल प्रक्रिया में काम करने में असुविधा हो रही है। सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर में मेट्रो सिटी को छोड़कर सभी राज्यों में मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या, सबसे ज्यादा मप्र में ही बढ़ी है।'

दरअसल, दैनिक जीवन से जुड़े कामकाज (बैंकिंग, पुलिस, एजुकेशन, कृषि, राजस्व, लैंड रिकॉर्ड आदि) में 20-30 प्रतिशत लोग ही मोबाइल या ऑनलाइन सेवा का इस्तेमाल करते हैं। 1.21 अरब आबादी वाले देश के लिए यह प्रगति दर बहुत धीमी और कम है। निश्चित रूप से बदलाव के लिए मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी भी बड़ी होना चाहिए। क्योंकि, डिजिटल लिटरेसी स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, उत्तर प्रदेश में कई नवाचार हो रहे हैं। इसकी तुलना में मप्र में अभी भी काफी सुधार शेष है। बीते कुछ सालों में मप्र ने ऐसे कई बड़े प्रोजेक्ट्स बनाएं हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। उदाहरण के लिए-

लोकेशन बेस डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर : इस प्रक्रिया से यह पता लगाया जा सकता है कि किसी भी सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर को कहां और कैसे बनाया जाए? जैसे शिक्षा विभाग को नक्शे पर यह बनाकर दिया गया कि उसे नए कॉलेज किस क्षेत्र में खोलना चाहिए, जिस जगह कॉलेज खोलने पर विचार किया जा रहा है, उसके आसपास कितने स्कूल हैं, स्कूलों में कितने बच्चे पढ़ते हैं, कितने बच्चे अब कॉलेज में प्रवेश लेंगे? आंकड़ों के आधार पर यह भी आसानी से समझा जा सकता है कि दो से पांच किमी के भीतर यदि कॉलेज खोला जाए तो स्कूल छोड़ने वाले (ड्रॉप आउट) बच्चों का प्रतिशत कम हो सकता है।

डायल-100 और थाना सीमांकन : घटना के बाद देरी से पहुंचना और दो थानों की सीमा पर हुए अपराध को लेकर लड़ना, पुलिस की पहचान से जुड़ गया था। इस छवि को तोड़ने में डिजिटल प्रोजेक्ट मददगार साबित हुए। डायल-100 सेवा में एक सेंटर पर बैठकर पूरे प्रदेश से आने वाली शिकायतों को सुना जाता है। चूंकि, फरियादी और गश्त करने वाली गाड़ियों की दूरी स्क्रीन पर दिखाई देती है इसलिए तत्काल पुलिस टीम को भेजा जा सकता है। इसी तरह 949 थानों का डिजिटल सीमांकन कर दिया है। अब इनके नक्शे तैयार कर थानों तक पहुंचाने की तैयारी चल रही है।

बहरहाल, मध्य प्रदेश ही वह राज्य है जहां कांग्रेस शासन में वर्ष 2000 में धार से देशभर के लिए ज्ञानदूत योजना शुरू हुई थी। इसमें गांव के सूचनालय में एक कम्प्यूटर और इंट्रानेट सुविधा उपलब्ध करवाकर पूरे गांव को दुनिया से जोड़ा गया। शुरू में योजना का बहुत नाम हुआ, कुछ फायदा भी हुआ। जैसे वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलने की शिकायत लेकर ग्रामीण महिलाएं ज्ञानदूत पहुंचीं और सरकार को ई-मेल पर सूचित किया। पेंशन रोक लेने वाला कर्मचारी पकड़ा गया। तब इस घटना को राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल क्रांति के रूप में देखा जा रहा था। बाद में सरकारी शिथिलता की वजह से यह प्रोजेक्ट धीरे-धीरे बंद हो गया!

उम्मीद की जा सकती है कि तमाम तकनीकी सुविधाओं-दुविधाओं के बीच हमारे 230 विधायक अब प्रदेश को 100 फीसदी डिजिटल साक्षर राज्य बनाने का दायित्व जरूर उठाएंगे।