भारत में पर्याप्त मात्रा में वर्षा का जल उपलब्ध है। अपने देश में 4000 अरब घन मीटर वर्षा होती है, जिसमें से हम केवल 17 प्रतिशत यानी 700 अरब घन मीटर का इस्तेमाल कर पाते हैं। 4000 अरब घन मीटर पानी में से 2131 अरब घन मीटर पानी का वाष्पीकरण हो जाता है। शेष 1869 अरब घन मीटर पानी में से 746 अरब घन मीटर दूरस्थ क्षेत्रों में गिरने से उपयोग में नहीं लाया जा पाता। शेष बचता है 1123 अरब घन मीटर। इसमें 690 अरब घन मीटर नदियों के जरिए बहता है। शेष 433 अरब घन मीटर पानी स्वत: रिसकर भूगर्भीय जलाशयों में समा जाता है। नदियों में बहने वाले 690 अरब घन मीटर में से लगभग 253 अरब घन मीटर हम बांधों में एकत्रित करते हैं। भूगर्भीय जलाशयों में समाने वाले 433 अरब घन मीटर का भी हम उपयोग करते हैं। कुल लगभग 700 अरब घन मीटर पानी का हम उपयोग कर रहे हैं। बजट के माध्यम से हम प्रत्येक चरण पर पानी की उपलब्धता बढ़ा सकते हैं। वाष्पीकरण से हो रहे 2131 अरब घन मीटर पानी को बचाने के लिए हमें रीचार्ज कुएं बनाने चाहिए। वर्षा के पानी को सीधे भूगर्भीय जलाशयों में डाला जा सकता है। केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड के पूर्व प्रमुख ने सुझाव दिया है कि देश को 110 लाख रीचार्ज कुएं बनाने चाहिए, जिन पर 79,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। मेरा अनुमान है कि यदि हम इन रीचार्ज कुओं को बनवा दें तो वाष्पीकरण से हो रहे नुकसान के 10 प्रतिशत हिस्से यानी 213 अरब घन मीटर पानी को अपने भूगर्भीय जलाशयों में डालकर उसका इस्तेमाल कर सकेंगे।

दूसरी हानि दूरस्थ क्षेत्रों में गिर रहे 746 अरब घन मीटर पानी की है। यहां भी विषय खर्च का है। जैसे चेरापूंजी में विश्व में सर्वाधिक वर्षा होती है। उस पानी को बंगाल में पहुंचाने के लिए खर्च किया जा सकता है। इसी प्रकार अन्य दूरस्थ क्षेत्रों से भी वर्षा के पानी को दूसरे स्थानों तक पहुंचाकर उपयोग किया जा सकता है। इस माध्यम से बह रहे 746 अरब घन मीटर पानी में से मेरा अनुमान है कि 10 प्रतिशत यानी 74 अरब घन मीटर पानी को विभिन्न् कार्यक्रमों से बचाया जा सकता है।

तीसरी हानि बांधों में एकत्रित किए गए 253 अरब घन मीटर पानी की है। इन जलाशयों से 15 प्रतिशत पानी वाष्पीकरण से उड़ जाता है। मेरा अनुमान है कि नहर के माध्यम से इस पानी को खेत तक पहुंचाने में 15 प्रतिशत पुन: बर्बाद होता है। पानी को बड़े जलाशयों में रोक लेने से नीचे की नदी में पानी का बहाव कम हो जाता है, जिससे नीचे के क्षेत्र में पानी का भूगर्भीय जलाशयों में पुनर्भरण कम हो जाता है और नीचे सिंचाई का नुकसान होता है। एक अनुमान है कि जितना पानी हम जलाशयों में एकत्रित करते हैं, उसका 10 प्रतिशत नुकसान नीचे के क्षेत्रों में पुनर्भरण कम होने से हो जाता है। इस प्रकार बांधों में एकत्रित 253 अरब घन मीटर पानी में से हम कुल 40 प्रतिशत अथवा 101 अरब घन मीटर पानी की हानि कर रहे हैं। इसलिए हमें चाहिए कि बड़े बांधों को हटाकर इस 253 अरब घन मीटर पानी को भी भूगर्भीय जलाशयों में एकत्रित करें, जहां वाष्पीकरण नहीं होता है, जहां नहर से पानी को खेत तक पहुंचाना नहीं पड़ता, क्योंकि भूगर्भीय जलाशय से जहां आप चाहें, वहां पानी निकाल सकते हैं और नदी के मुक्त बहने से निचले हिस्से में भूगर्भीय जल का पुनर्भरण भी प्रभावित नहीं होता। 'वाटर इन द वेस्ट संस्था द्वारा कैलिफोर्निया के अध्ययन में पाया गया कि पानी को भूगर्भीय जलाशयों में संग्र्रहीत करने का खर्च तकरीबन 22 रुपए प्रति अरब घन मीटर पड़ता है, जबकि बांधों में यही खर्च 125 रुपए पड़ता है। यदि हम महंगे बांधों को हटाकर सस्ते भूगर्भीय जलाशयों में पानी को संग्र्रहीत करें तो 101 अरब घन मीटर पानी बचा सकते हैं। इन कार्यों से वर्तमान में उपलब्ध 700 अरब घन मीटर पानी में हम लगभग 400 अरब घन मीटर की वृद्धि कर सकते हैं। सरकार को चाहिए कि आगामी बजट में इन कार्यों के लिए पर्याप्त धन मुहैया कराए।

केवल पानी के संग्र्रहण से बात नहीं बनती है। नीति आयोग की रपट के अनुसार तमिलनाडु ने पानी के संग्रहण का कार्य बखूबी किया है, लेकिन खपत में अत्यधिक वृद्धि होने के कारण उस राज्य में पानी का संकट आ गया है। देश में पानी की 85 प्रतिशत खपत खेती में होती है, लेकिन जागरूकता के अभाव में किसान पानी का सही उपयोग नहीं करते हैं। जितनी देर बिजली आती है, उतनी देर किसान बोरवेल को चालू रखते हैं। नहर से मिलने वाले पानी का अति उपयोग होता है। किसानों को नियंत्रित रूप में पानी का उपयोग करने के लिए इनसे पानी का मूल्य आयतन के हिसाब से वसूल करना चाहिए। किसान को इस अतिरिक्त भार की भरपाई करने के लिए समर्थन मूल्य में पर्याप्त वृद्धि कर देनी चाहिए। ऐसा करने से कृषि में पानी की खपत कम होगी। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सिंचाई और खेती के विषय हमारे संविधान की राज्य सूची में आते हैं। इसलिए केंद्र सरकार इनमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती है, लेकिन भाजपा शासित राज्यों में कम से कम इस नीति को लागू किया जा सकता है और केंद्र सरकार द्वारा समर्थन मूल्य में वृद्धि की जा सकती है, जिससे कि यह नीति दूसरे राज्यों में भी लागू की जा सके

दूसरा विषय निर्यात का है। हम भारी मात्रा में अपने पानी को एक तरह से चीनी, लाल मिर्च और मेंथा तेल में पैक करके विदेशों को निर्यात कर देते हैं। इस वर्ष हमने 21 लाख टन चीनी, पांच लाख टन लाल मिर्च और 17 हजार टन मेंथा तेल का निर्यात किया है। इन फसलों के उत्पादन में पानी की भारी मात्रा में खपत होती है। निर्यातित चीनी के उत्पादन में ही हमने 20 अरब घन मीटर पानी का उपयोग किया है। अत: केंद्र सरकार को चाहिए कि इन फसलों पर भारी निर्यात टैक्स लगा दे, ताकि इनका निर्यात बंद हो जाए और इनमें उपयोग होने वाला पानी बच जाए।

इसके साथ-साथ अपने घरेलू खपत के लिए भी अंगूर जैसी फसलों के उत्पादन पर नियंत्रण करने की जरूरत है। दक्कन के पठार में हजारों फीट गहरे ट्यूबवेल डालकर अंगूर की बड़ी मात्रा में खेती की जा रही है। हमें पहले पीने का पानी चाहिए। अंगूर बाद में। अंगूर के स्थान पर हम चीनी अथवा स्टीविया का उपयोग कर सकते हैं। केंद्र सरकार को ऐसे कानून बनाना चाहिए ताकि जल संरक्षण की दृष्टि से विशेष फसलों को प्रतिबंधित किया जा सके। देश के उन इलाकों में जहां भूगर्भीय जलस्तर में भारी गिरावट आ रही है, वहां चीनी, लाल मिर्च, मेंथा और अंगूर जैसी फसलों का उत्पादन तत्काल बंद कर देना चाहिए। सच यह है कि अपने देश में प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध है, लेकिन हम उसका सही उपयोग नहीं कर रहे हैं और अनायास ही संकट में पड़ गए हैं।

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आईआईएम, बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)