स्वतंत्र भारत की शिक्षा में भारतीय ज्ञान का लोप होता गया है। बहुतेरी मूल्यवान सीखों से नई पीढिय़ां वंचित होती रही हैं। उलटे आधुनिक शिक्षा के नाम पर तो उसके बारे में भ्रामक धारणाएं भी बना दी गई हैैं। जैसे-उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि को 'धर्मग्रंथÓ कहा जाता है, जबकि वे ज्ञानग्र्रंथ हैैं। ऐसी ही एक भ्रामक धारणा स्वामी विवेकानंद के बारे में बना दी गई है। उन्हें धर्मगुरु बताया जाता है, जबकि वह महान शिक्षक थे, भारतीय ज्ञान-परंपरा के व्याख्याता थे। अमेरिका और यूरोप में उन्होंने योग-वेदांत के ही व्याख्यान दिए, जिनसे उन्हें ख्याति मिली। दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत में उन्हें महान शिक्षक के बजाय 'रिलीजियसÓ जैसी श्रेणी में रख दिया गया। मानो उनकी शिक्षाओं की बच्चों, युवाओं को आवश्यकता नहीं, जबकि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है। बरसों अमेरिका और यूरोप में कीॢत पताका फहराने के बाद जब विवेकानंद भारत लौटे तो देशभर में घूम-घूमकर उन्होंने आमजनों के बीच व्याख्यान दिए। कोलंबो, मद्रास से लेकर ढाका, लाहौर तक स्वामी जी के व्याख्यान लाखों लोगों ने सुने। उनका संग्र्रह 'कोलंबो से अल्मोड़ा तकÓ अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक है। हिंदी में उसका अनुवाद महाप्राण कवि निराला ने किया था। उन व्याख्यानों का संक्षिप्त संस्करण 'युवकों के प्रतिÓ शीर्षक से रामकृष्ण आश्रम ने प्रकाशित किया है। वह प्रत्येक भारतीय के लिए पठनीय है।

विवेकानंद ने ऐसी अनेक सीखें दीं जो नित्यप्रति जीवन में काम आने वाली हैैं। उन्होंने कहा था कि किसी कठिनाई से भागें नहीं, बल्कि सीधे उसका सामना करें तो कठिनाई तुरंत हल्की लगने लगेगी। कभी किसी बाहरी मदद की आस न करें, क्योंकि सारी शक्ति आपके अंदर ही है। अब तक जीवन में उसी से सब कुछ उपलब्ध हुआ है। भावनाओं में न बहें, क्योंकि आवेश और तीव्रता में जाने से शक्ति का निरर्थक क्षय होता है। किसी से व्यवहार करते हुए एकत्व की ओर बढऩे वाले काम करें, निकटता लाने वाली बात बोलें, न कि दुराव बढ़ाने वाली। काम करते हुए सभी कर्मफल श्रीकृष्ण और माता पार्वती को अॢपत करते रहें। यह सोच कर कि यह उनका काम है।

यहां आपको शंका हो सकती है कि सांसारिक लोग ऐसा निष्काम कर्म कैसे कर सकते हैैं? विवेकानंद ने इसे इस तरह समझाया है। मान लीजिए एक सेविका अपने मालिक के बच्चे का प्रेम भाव से लालन-पालन करती है, परंतु यदि मालिक उसे काम से हटा दे या वही कोई नया काम पकड़ ले तो वह चिंता नहीं करती कि अब बच्चे का क्या होगा, कैसे होगा। वह अपनी गठरी लेकर नए काम पर चली जाती है। सांसारिक लोगों को भी इसी भाव से हर काम करना चाहिए। यदि आसक्ति रखे बिना हम सारे काम करते जाएं, तब कभी क्लेश नहीं होगा अथवा नगण्य होगा। विवेकानंद ने आगे कहा है कि कोई काम करते हुए दुविधा में न पड़ें। अच्छे-बुरे की चिंता छोड़कर कर्म करें, क्योंकि भलाई-बुराई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। द्वंद्व ही जीवन है। बिना विकार के कर्म असंभव है। अत: अपनी ओर से जानते-बूझते अनुचित कार्य न करें। बाकी अपने कर्म के फलाफल की परवाह छोड़कर कार्य करें। उसे राम जी पर छोड़ दें।

वस्तुत: अनासक्त होकर कार्य करना ही व्यावहारिक है। विवेकानंद ने कहा है कि किसी चीज, विचार, व्यक्ति से आसक्ति न रखें। केवल कर्तव्य भाव रखें। मन को अपने अधीन रखें। अपने परिवार और संपत्ति के प्रति भी उसके मालिक नहीं, बल्कि अवधिबद्ध वेतनभोगी व्यवस्थापक जैसा भाव रखें, क्योंकि यही सत्य है। उपनिषद के आरंभ में ही है, 'कस्य स्विद धनम्Ó। अर्थात धन किसी का नहीं है। किसी मनुष्य का वर्तमान जीवन उसके असंख्य जन्मों में एक है जो पलक झपकते ही व्यतीत हो जाएगा। आपको पता भी नहीं चलता कि कब वृद्ध हो गए। आपका वर्तमान घर एक धर्मशाला भर है। आपके परिवारजन सांयोगिक पड़ोसी मात्र हैं, जिनसे दूर होना अनिवार्य है। अत: उन्हेंं प्यार करें, उनका ध्यान रखें, परंतु उन्हें 'मेराÓ न कहें। स्वामी जी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि किसी दूसरे का अत्यंत मूल्यवान सुंदर चित्र जल जाता है तो आपको कुछ महसूस नहीं होता, क्योंकि वह 'आपकाÓ नहीं है। अर्थात ये 'मैं एंव मेराÓ ही सारे क्लेश की जड़ हैैं। इस भावना से मुक्त रहकर सभी कार्य करते हुए हम सदैव आनंदित रह सकते हैैं, मगर ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल नित्य प्रति कुछ देर स्वाध्याय, योगाभ्यास और चिंतन से हमारे अंदर धीरे-धीरे सच्ची कर्म भावना विकसित हो जाएगी। स्वामी जी के अनुसार बिना स्वार्थ किया गया प्रत्येक कार्य हमारे पैरों की एक बेड़ी को काट देता है। ध्यान से देखें तो यही सहज मानवीय स्वभाव है। मनुष्य की सारी छटपटाहट अंतत: मुक्ति पाने के लिए है। मानव जिस शुद्ध, अनश्वर, असीम, अनादि का अंश है, उसी से पुन: मिल जाने की इच्छा उसके अंतरतम में कहीं दबी है। विवेकानंद उसे सदैव स्मरण रखने के लिए रानी मदालसा की पौराणिक कथा स्मरण कराते हैं। वह अपने नवजात पुत्र को आरंभ से ही गीत गाकर शिक्षा देती थी कि हे पुत्र, तुम शुद्ध, बुद्ध, निरंजन हो, तुम्हें क्या चिंता, क्या क्लेश! विवेकानंद के अनुसार प्रत्येक बच्चे में जन्म से ही इस गीत का भाव भर दिया जाना चाहिए ताकि वह आजन्म आनंदित रह सके।

वस्तुत: योग-वेदांत की संपूर्ण शिक्षा मनुष्य को सच्चा कर्मयोगी बनाने की है। उससे अधिक व्यावहारिक शिक्षा कोई नहीं हो सकती। किसी भी आयु में, कोई भी रोजगार करते हुए, उसकी उपयोगिता यथावत है। वेदांत कोई 'फेथÓ वाला रिलीजन नहीं, जर्मन भाषा वाला 'साइंसÓ है। जैसे शरीर और भौतिक जगत के लिए भौतिकी, रसायन, कृषि आदि का विज्ञान है, उसी तरह आत्मिक जगत के लिए योग-वेदांत का विज्ञान है। इसीलिए वह शुद्ध व्यावहारिक ज्ञान है। स्वामी विवेकानंद ने इसी शिक्षा से पूरी दुनिया को विस्मित कर दिया था। हम उसे विस्मृत करके अपनी ही हानि करते रहे हैं।

(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैैं)

Posted By: Arvind Dubey