आशीष व्यास

मध्य प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ की तबाही से बेहाल है। प्राकृतिक आपदा से आहत लोग सरकारी सहयोग की आस में भीगते हुए राहत की तरफ भागते जा रहे हैं। इस उम्मीद में कि डूब की गवाही दे रहे खेत, मकान, दुकान या फिर गृहस्थी का पूरा सामान दिखा सकें और यह भी बता सकें कि जरूरत से ज्यादा आए पानी ने जिंदगी को कितना मुश्किल बना दिया है। बच्चों-बूढ़ों के दुख-दर्द बता-बताकर भी पीड़ा-परेशानी की इस कहानी को बार-बार इसलिए दोहराया जा रहा है कि कहीं कोई तो हो, जो उन्हें धैर्य से सुन ले। थोड़ा-सा ठहरकर उनकी तकलीफों को समझ ले। उनकी मुश्किलों को मन से मान भी ले। लेकिन, सुनने-समझने और कुछ करने वाली कहानी के पात्र फिलहाल राजनीति में व्यस्त हैं! वे खोज रहे हैं विरोधियों की ऐसी खामियां, जिन्हें सामने लाकर बाढ़ के पानी में भी कड़वाहट घोली जा सके।

संभव है कि व्यवस्था के हिस्से में अव्यवस्थाओं के ढेर सारे कारण होंगे, माना जा सकता है कि जिम्मेदार तंत्र ने ऐसा कुछ भी नहीं किया होगा, जिससे उसकी उपस्थिति का व्यावहारिक अनुभव हो। कहा जा सकता है कि आपदा प्रबंधन के नाम पर अनेक ऐसी औपचारिकताएं की गई होंगी, जो जमीन पर आते ही पानी के साथ बह गईं! अब दो स्थितियां सामने हैं। पहली - बाढ़ के तरकश में पड़े तकलीफों के तीर! दूसरी - मांग और पूर्ति के बीच राहत की राजनीति! हालात के दूसरे हिस्से से पहली बात शुरू करते हैं। पानी में डूबे मंदसौर-नीमच के खेत-खलिहान किसान आंदोलन के बाद अब अतिवृष्टि, बाढ़ और मुआवजे की राजनीति के कारण चर्चा में हैं। वैसे ग्वालियर-चंबल इलाके में भी डूब का दर्द है, लेकिन राजनीति का केंद्र एक बार फिर मंदसौर ही है। वैसे भी प्रदेश का यह जिला बीते तीन साल से किसान, फसल और राजनीति को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है। पहले मानवीय और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं की गोली चली, अब प्राकृतिक आपदा के बाद तंत्र की लापरवाही के तीर बेकसूरों को घायल कर रहे हैं। दोनों ही स्थितियों में निशाने पर किसान हैं। यदि इसके अतिरिक्त कुछ है तो यह है - पूरे क्षेत्र में राजनीतिज्ञों के प्रति आक्रोश का सामूहिक-सार्वजनिक भाव।

पीड़ित किसानों का मानना है कि चुनाव हो या बाढ़, राजनीतिक पार्टियों को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। दावे और वादे एक जैसे होते हैं और आश्वासनों के जरिए सामने आने वाले शब्दों में भी कोई बदलाव नहीं होता। पंचायत से प्रदेश स्तर की राजनीति करने वाले छोटे-बड़े नेता अब मुद्दे हथियाने के लिए इसी इलाके में सूखी जमीन तलाश रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान मंदसौर, मल्हारगढ़ के बाद नीमच के मनासा, कुकड़ेश्वर, रामपुरा में दौरा कर चुके हैं। जमीनी जुड़ाव के लिए मौके तक पहुंचने में महारत हासिल कर चुके शिवराज सिंह ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचकर केंद्र सरकार की ओर से राहत पहुंचाने का आश्वासन दिया। शाम होते-होते जल संसाधन व जिला प्रभारी मंत्री हुकुमसिंह कराड़ा भी रामपुरा पहुंचे और प्रभावितों से मिलने लगे। पक्ष-विपक्ष के ये दोनों चेहरे पीड़ितों की बात सुनने-समझने के साथ एक-दूसरे की कमियां बता रहे थे, आहत आदमी को राहत देने की अपनी कोशिश-कहानी भी सुना रहे थे। मंदसौर की इस महाभारत के दूसरे दौर में अब शिवराज सिंह चौहान बीते कल से स्थानीय कलेक्टोरेट के बाहर 24 घंटे के धरने पर बैठे हैं।

राहत की एक राजनीति राजधानी में भी चर्चा का विषय बन गई। प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने बाढ़ की बेहाली बयान करते हुए बताया - 'प्रदेश के 52 जिलों में से 36 जिलों के आठ हजार से अधिक गांव अत्यधिक वर्षा से प्रभावित हुए हैं। 24 लाख हेक्टेयर में बोई गई फसलों को नुकसान पहुंचा है और 22 लाख किसान प्रभावित हुए हैं। फसलों के नुकसान का प्राथमिक मूल्यांकन 9 हजार 600 करोड़ रुपए है। प्रदेश में अतिवर्षा से सड़कों को भी 1 हजार 566 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचा है।' इसके बाद एक राजनीतिक मांग और सामने आई। 'भाजपा नेताओं को इस मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय केंद्र सरकार से राहत राशि दिलवाने के लिए धरने पर बैठना चाहिए!'

सही मायनों में देखा जाए तो आरोप-प्रत्यारोप की इस सियासत से आम आदमी हतप्रभ है। विधानसभा चुनाव में जहां लगभग बराबरी की सीटों पर लाकर उसने भाजपा-कांग्रेस का मूल्यांकन भी बराबर किया, वहीं लोकसभा चुनाव में भाजपा को एकतरफा ऐतिहासिक बढ़त दिलाते हुए अपने पक्ष को स्पष्ट कर दिया। स्वाभाविक है, दोनों ही दलों से उसकी अपेक्षाएं भी समान हैं। यदि कहीं कुछ असमान है तो वह है पीड़ित-प्रताड़ित जनता की परेशानी पर सियासत। नेता राजनीति करते रहते हैं और जनता विश्वास करके, अपने हिस्से की कोशिशों में जुटी रहती है। प्रयासों की यह कड़ी इस बार विश्वास से शुरू होकर अंधविश्वास तक पहुंच गई। जैसे - दो महीने पहले बारिश होने की दुआ मांगते हुए भोपाल में मेंढक-मेंढकी की शादी करवाई गई थी। ..इतनी बरसात हुई कि बाढ़ जैसे हालात बन गए। परेशान लोगों ने मेंढकों का तलाक करवाने का प्रहसन भी किया, ताकि अतिवृष्टि का रूप ले चुकी बारिश रुक जाए।

सियासी समीकरणों से जुड़े सवालों ने मध्य प्रदेश से शुरू हुई बाढ़ की कहानी को गुजरात से भी जोड़ दिया है। मप्र सरकार आरोप लगा रही है कि गुजरात सरकार ने सरदार सरोवर बांध को 30 दिन पहले 138.68 मीटर भर दिया इससे मप्र में कृत्रिम बाढ़ आ गई। मप्र के गृहमंत्री बाला बच्चन ने आरोप लगाया- 'गुजरात सरकार ने मप्र के 76 गांवों को कृत्रिम बाढ़ आपदा की तरफ धकेल दिया। नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी के शेड्यूल से 30 दिन पहले गुजरात सरकार ने सरदार सरोवर पूरा भर दिया। इस मनमानी से धार और बड़वानी जिले में हजारों लोग संकट में फंसे हैं। वर्ष 2019 के लिए सरदार सरोवर बांध में पानी भरने का जो शेड्यूल जारी किया था, उसे गुजरात सरकार ने नहीं माना। बांध को 138.68 मीटर के पूरे स्तर पर 15 सितंबर को ही भर दिया गया, जबकि इसे 15 अक्टूबर तक भरना चाहिए था।' सरकार के इस प्रतिनिधि बयान ने डूब और विस्थापन की समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे संगठनों को ज्यादा सक्रिय कर दिया। धरना-प्रदर्शन के साथ अब जल-सत्याग्रह शुरू हो चुका है। रास्ते रोक-रोककर अपनी मांगों पर ध्यान दिलाने की कोशिशों ने भी फिर जोर पकड़ लिया है।

बहरहाल, प्रशासन प्रयास कर रहा है, शासन आश्वासन दे रहा है और बाढ़ से घिरा आम आदमी नेताओं के चेहरों से पानी उतरने की प्रतीक्षा कर रहा है!