आशीष व्यास

मध्य प्रदेश के अधिकांश स्थानीय निकाय अब प्रशासकों के हवाले हो गए हैं। पांच साल सेवा-संकल्प की परिक्रमा पूरी करने वाले कई नगर निगम अपने जनप्रतिनिधियों को विदा भी कर चुके हैं। इसी के साथ नई जाजम के जुटने का जतन भी धीरे-धीरे शुरू होने लगा है। परिसीमन की परिभाषा चाहे परिवर्तित हो जाए, दलीय निष्ठाओं से जुड़ी प्रतिष्ठा पर चाहे प्रश्न चिन्ह लग जाएं, पार्टी टिकट दे या ना दे, पूरे प्रदेश में छोटे-छोटे नेताओं की एक बड़ी संख्या ऐसी दिखाई देने लगी है, जो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अगले स्थानीय निकाय चुनाव में आजमाना चाहती है। राजनीति के चाणक्यों की मानें तो लोकसभा, विधानसभा चुनाव भले लहर में हारे या जीते जा सकते हों, लेकिन नगरीय निकाय चुनाव में मुखौटे नहीं चलते। यहां सही मायनों में उम्मीदवारों और मतदाताओं के बीच दो-दो हाथ होता है। यह चुनाव घर-आंगन, गली-मोहल्ला, चौक-चौराहे का होता है। इसलिए, धर्म-जाति, चेहरे-मोहरे, मुद्दा-लहर से हटकर उम्मीदवार की कार्यकुशलता, व्यवहार, उपलब्धता के अंक कटते-जुड़ते रहते हैं। यहां न तो जातिगत समर्थन की राग-भैरवी जनता को रास आएगी, न अर्थव्यवस्था या रोजगार का रोना-पीटना। न किसानों की कर्जमाफी कोई असर करेगी, न विधानसभा चुनाव के वचन-पत्र सच-झूठ की कसौटी पर परखे जाएंगे। यहां शुद्ध रूप से सड़क, बिजली, पानी के साथ अब मायने रखेगा सफाई और स्मार्ट सिटी जैसा मुद्दा। यही कारण है कि प्रदेश में हर सत्ताधारी पार्टी के लिए निकायों पर अपना वर्चस्व बनाए रखना जितना महत्वपूर्ण होता है, उतना ही उसे जीतना भी। वैसे तो कई शहरों में चुनाव प्रक्रिया अब तक शुरू हो चुकी होती। लेकिन, माना जा रहा है कि 15 साल बाद सरकार में लौटी कांग्रेस इसे अपनी सुविधा के समीकरणों में बांटना चाहती है। ताकि, ज्यादा से ज्यादा निकायों पर कब्जा हो सके। विरोधी खेमे के रूप में भाजपा भी अपनी रणनीति बनाने में जुटी है। हालांकि जनता के बीच जाने से पहले उसे भी जन-मन को समझने का गहरा-गंभीर अभ्यास करना होगा।

विरोध में अपनों ने पहना दी जूते की माला!

चुनाव प्रचार के दौरान जनता की नाराजगी का सामना किस कदर शर्मिंदगी भरा हो सकता है, इसका उदाहरण है मध्य प्रदेश के धार जिले के धामनोद कस्बे का एक किस्सा। यहां नगर परिषद चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे एक नेता का स्वागत फूलों के बजाय जूते-चप्पलों की माला से किया गया। हैरानी इस बात की थी कि यह माला पहनाने वाला बुजुर्ग उसी पार्टी का समर्थक था, जिस पार्टी का उम्मीदवार। उसके दुख और गुस्से के आगे पार्टी क्यों हार गई? जब इस पर छानबीन शुरू हुई तो सामने आया कि पिछली परिषद में वार्ड की महिलाएं पानी की समस्या को लेकर अध्यक्ष के निवास पर गई थीं, तब महिलाओं के खिलाफ मामला दर्ज हो गया था। इन महिलाओं में माला पहनाने वाले की पत्नी भी थी।

ऐसे महापौर, जिन्होंने निगम से लिया नहीं, बल्कि दिया!

किस्सा अविभाजित मध्य प्रदेश के दौर का है। बिलासपुर में 1981 में नगर निगम का गठन हुआ ही था। नगर निगम अधिनियम के मुताबिक निर्वाचित परिषद के बाहर के व्यक्ति को सदस्य चुना जा सकता था। उस समय महापौर को एक साल का कार्यकाल ही मिलता था। पहले महापौर ई. अशोक राव चुने गए। वे पहले ऐसे महापौर हुए जिन्होंने निगम को बहुत कुछ दिया। अपने बैठने के लिए घर से कुर्सी मंगवाई। वे शासन को जो चिटि्ठयां लिखते, उसका डाक खर्च भी स्वयं चुकाते थे। मानदेय की राशि से कर्मचारी कल्याण कोष की स्थापना की, जो कर्मचारियों के परिवार, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर खर्च होता था। सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल भी नहीं किया। इन दोनों उदाहरणों से ये संकेत साफतौर पर समझे जा सकते हैं-सियासत की इस जमीन पर अच्छे और बुरे का परिणाम तत्काल मिल जाता है। वैसे भी नगरीय निकाय ही शुरुआती राजनीति या फिर राजनेताओं की बुनियादी शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र माने जाते हैं, क्योंकि यहां सीखा हुआ ककहरा ही आगे का रास्ता खोलता है। जैसे मध्य प्रदेश से जुड़े तीन बड़े नाम, जो नगर निगमों से होते हुए शिखर पदों पर पहुंचे।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रामप्रकाश गुप्ता ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत नगर निगम से की। वे 1964 में लखनऊ नगर निगम के उप नगर प्रमुख रहे। उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 2004 में वे मध्य प्रदेश के राज्यपाल बने। इसी तरह वर्तमान राज्यपाल लालजी टंडन का भी नाता नगर निगम की राजनीति से रहा है। उन्होंने तो अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत लखनऊ नगर निगम में बतौर पार्षद की थी।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी इंदौर नगर निगम से ही अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की थी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की लोकसभा का संचालन कर चुकीं महाजन से बेहतर इस तथ्य को और कौन समझा सकता है। वे कहती हैं - 'जो राजनीति में आगे बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए नगरीय निकाय सीखने का आधार है। कई बार कहा जाता है कि नाली, सड़क या ड्रेनेज ही स्थानीय निकाय के राजनीतिक मुद्दे हैं। नगरीय निकाय की व्यवस्था इलाके के एक-एक व्यक्ति से जोड़ती है और लोगों से जुड़ना ही राजनीति का पहला सबक है।' महाजन अपना अनुभव बताती हैं - 'वर्ष 1984 में जब दंगा हुआ तो उपमहापौर होने के नाते मैं सबसे पहले शहर में निकली। प्रभावितों के लिए तत्काल राशन जैसी जरूरत का सामान जुटाकर पहुंचाया। तात्कालिक परिस्थिति के अनुसार तत्काल लिए गए निर्णयों से जो अनुभव मिला, वह लोकसभा में काम आया। कम संसाधन में जनसहयोग से सड़कें आदि बनवाना जैसे फैसले भी उसी दौर में लिए। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि यदि आप लोकसभा में खड़े होकर सवाल पूछना चाहते हैं, तो इसका अभ्यास नगर निगमों की बैठकों से कीजिए। मूल तत्व वही है, बस दायरा बड़ा हो जाता है।'

इंदौर नगर निगम देश में सबसे साफ शहर का ताज तीन बार पहन चुका है। अब इसमें चौका लगाने की तैयारी कर रहा है। भोपाल भी देश में सबसे स्वच्छ राजधानी का खिताब हासिल कर चुका है। प्रदेश के ऐसे अनगिनत गांव, कस्बे और बड़े शहर हैं, जो मिसाल के रूप में बार-बार दोहराए जाते रहे हैं। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि शासन-प्रशासन के साथ जनप्रतिनिधियों की स्थानीय जमात ने ऐसे कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं, जिन्हें देखने, समझने और परखने के दृष्टिकोण से देश-दुनिया के कई विशेषज्ञ हमारे प्रदेश में लगातार आते रहे हैं। सच यह भी है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होते ही एक अजीब तरह की 'गतिमान-अस्थिरता' चलन में आ जाती है, दावों-वादों का एक ऐसा दौर अचानक हमारे सामने आ जाता है, जो हमें अनिर्णय की स्थिति की ओर धकेलता चला जाता है। घोषणा-पत्र भी हमारी घबराहट बढ़ाने में 'संदिग्ध-सहयोगी' की भूमिका निभाने लग जाते हैं।

बहरहाल, हम अभी इस बात पर संतोष व्यक्त कर सकते हैं कि योग्य और अयोग्य के बीच अंतर समझने के लिए हमारे पास पर्याप्त समय है। प्रयास किया जा सकता है कि इस अवधि में जनप्रतिनिधियों के योगदान का ईमानदार विश्लेषण कर लिया जाए, ताकि भविष्य में हमारे सर्वश्रेष्ठ जनप्रतिनिधि बनने का दावा करने वालों की मानसिकता को भी हम पढ़ सकें।

Posted By: Ravindra Soni