असम में गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पहाड़ियों की तलहटी में बसे हरे-भरे धान का एक बेहद सुंदर इलाका है, जिसका नाम है म्योंग। स्थानीय भाषा में म्योंग का अर्थ है- माया का लोक। म्योंग क्षेत्र में तमाम गांव बसे हैं। इन गांवों में अनेक हिंदू अपने नाम के साथ 'गिरि टाइटल या उपनाम लगाते हैं। वे नाथपंथी हैं यानी नाथपंथ में विश्वास करते हैं। कहते हैं कि नाथपंथ के प्रवर्तक गोरखनाथ जी के गुरु मच्छेंद्र नाथ ने यहां आकर इस पंथ का प्रसार किया था। इस क्षेत्र में बसे ये नाथपंथी हिंदू धर्म में विश्वास करते हैं। ये शिव के पूजक हैं। इनमें से अधिकांश चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को वोट देते हैं। राजनीतिक रूप से भाजपा के साथ इनका जुड़ाव कोई बहुत पुराना नहीं है। नाथ पंथ के योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद इन नाथपंथियों का ध्रुवीकरण भाजपा की ओर तेजी से बढ़ा है। इससे पहले ये भाजपा के प्रति इतने अधिक लामबंद नहीं थे।

ऐसे ही कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में नाथपंथी अब भाजपा की ओर उन्मुख हुए हैं। गोरखपुर के आसपास मुस्लिम नाथपंथी जोगी भी हैं। इन जोगियों की बस्ती में भाजपा के प्रति लगाव दिखता है। वहीं उत्तर प्रदेश के अनेक भागों में बसे सपेरे भी नाथपंथ में विश्वास करते हैं। इन सपेरे सामाजिक समूहों में से अधिकांश योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से गौरवान्वित महसूस करते हैं। भाजपा से उनके लगाव की एक वजह यह भी है।

यहां इसका उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भाजपा ने किस प्रकार हिंदुओं के विभिन्न् वर्गों, धड़ों और मतों को अपने साथ जोड़ा है। अभी तक जब भी भाजपा के पक्ष में राजनीतिक विश्लेषक हिंदू ध्रुवीकरण की बात करते हैं तो 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को इसका कारण मानते हैं। यह देखते हैं कि किस प्रकार हिंदुत्व की राजनीति ने हिंदू समाज की विभिन्न् जातियों को जोड़ने के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व की रणनीति का इस्तेमाल किया है। हम यह नहीं देखते कि किस प्रकार हिंदुत्व की राजनीति ने हिंदू धर्म में सक्रिय अनेक धार्मिक लोकप्रिय पंथों में निहित 'हेजेमोनी या यूं कहें कि 'प्रभाव शक्ति का उपयोग उनके समर्थकों को अपने साथ जोड़ने के लिए किया है। पूर्वोत्तर में शंकरदेव के भक्ति पंथ ने तो भाजपा को आधार प्रदान किया ही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हिंदू धर्म जागरण के अभियान के तहत न केवल सनातन पंथों को, वरन अनेक भक्ति पंथों, छोटे-छोटे संप्रदायों और मठों को अपने साथ जोड़कर एक वृहद समग्र हिंदुत्व का वृत्त बनाने की कोशिश की है।

अनेक अखाड़ों, धार्मिक संगठनों की शक्ति का लाभ भारत में हिंदुत्व की राजनीतिक शक्ति को तो मिला ही है मठों, प्रवचन संघों एवं अनेक धार्मिक सामाजिक संगठनों की बुनावट से भाजपा एवं हिंदुत्व की राजनीति को ताकत मिली है। धार्मिक लोकजगत यथा कथा मंडलियों, राम कथा प्रवचक संत संगठनों, भागवत कथा आयोजक संघों एवं संतों तथा हिंदू धर्म की अनेक कीर्तन मंडलियों से निर्मित लोकजगत एक प्रकार से हिंदुत्व की विचार धारा के लोकजगत की शक्ति के रूप में काम करते हैं। तमाम संत, कथा वाचकों को भी समय-समय पर भाजपा स्वयं से जोड़ने के लिए संगठन एवं अपनी राजनीति में जगह देती रही है। उमा भारती, साध्वी प्रज्ञा, साध्वी ऋतंभरा, योगी आदित्यनाथ जैसे अनेक संत कथा वाचक धार्मिक आयोजकों को भाजपा ने अपनी राजनीति में जगह देकर उन्हें एक राजनीतिक मंच उपलब्ध कराया।

अगर बौद्धिक रूप से देखें तो ये कीर्तन मंडलियां, कथा वाचन आयोजक संघ, धार्मिक संस्थाएं हिंदू धर्म की संस्कृति, मूल्यों की चर्चा तो करती ही हैं, राष्ट्र के ज्वलंत मुद्दों को लेकर भी समय-समय पर इनमें विमर्श होता रहता है। ये ज्वलंत मुद्दे राष्ट्र एवं जनतंत्र की राजनीति से भी जुड़े होते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, संघ से संबद्ध संगठन, धर्म जागरण मंच ऐसे सार्वजनिक लोकजगत को संयोजित, संगठित एवं जोड़ने का काम करते रहते हैं। प्राय: राजनीतिक विश्लेषक ऐसे धार्मिक लोकजगत की विमर्श रचना एवं राजनीतिक झुकाव पैदा करने में विकसित हो रही इनकी प्रभावी भूमिका को समझ नहीं पाते। भाजपा और संघ से संबंध न रखने वाले लोग आज भी राजनीतिक आधारों के पारंपरिक अर्थ जाति एवं धार्मिक ध्रुवीकरण के सीमित दायरे में ही खोजते हैं। मीडिया कवरेज, राजनीतिक रैली एवं अन्य आयोजनों के अतिरिक्त ये अनौपचारिक रूप से राजनीतिक न होकर राजनीतिक मत सृजित करने वाले सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक लोकजगत उनकी निगाहों से छूट जाते हैं। किसी राजनीतिक तंत्र की तुलना में ये गैरराजनीतिक लोकजगत भारतीय समाज में राजनीतिक झुकाव पैदा करने में ज्यादा कारगर होते हैं। पश्चिमी समाजों में लोकजगत की अवधारणा से थोड़े भिन्न् भारतीय समाज के ये लोकजगत तर्क से ज्यादा विश्वास की डोर से बंधे होते हैं। तर्कशक्ति से ज्यादा इन समूहों एवं संगठनों के विमर्शों में विश्वास की शक्ति प्रभावी होती है। हिंदू समाज का उच्च वर्ग एवं मध्य वर्ग का एक हिस्सा ऐसे लोकजगत से जुड़ा होता है। साथ ही कबीर पंथ, रविदास पंथ, शिवनारायण पंथ जैसे अनेक लोकप्रिय पंथों के अपने कार्यक्रमों से सृजित लोकजगत के माध्यम से दलित एवं पिछड़ी जातियों का एक बड़ा शिक्षित एवं गैर शिक्षित वर्ग भी इनसे प्रभावित होता है। यह ठीक है कि दलित पंथों से जुड़े पंथों के लोकजगत में हिंदुत्व का विमर्श पहुंचता ही है, साथ ही साथ बहुजन एवं दलित विमर्श में इनके विमर्शों का हिस्सा होता है। कई जगह ये दोनों प्रकार के विमर्श जुड़ जाते हैं तो कई जगह टकराते भी हैं।

दूरदराज व सीमावर्ती प्रांतों में भाजपा का प्रसार मात्र राजनीतिक गतिविधियों या सक्रियता से नहीं हुआ है। इन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक पंथों एवं उनके द्वारा सृजित लोकजगत ने भी भारत में हिंदुत्व की राजनीति का सामाजिक आधार तैयार करने में महती भूमिका अदा की है। आज पूर्वोत्तर के राज्यों में भाजपा की जो पैठ बढ़ी है, उसमें राजनीति के साथ सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों को जोड़ने की हिंदुत्व की राजनीति ने बड़ी भूमिका निभाई है। अब राजनीति ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। राजनीति के पारंपरिक अर्थ बदलते जा रहे हैं। जरूरत है राजनीतिक आबद्धीकरण के लिए हो रहे इन नए प्रयासों को समझने की। इनके माध्यम से भारतीय राजनीति के बदलते पक्षों को समझने की जरूरत भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

(लेखक प्रयागराज स्थित गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक हैं)

Posted By: Ravindra Soni