नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उनके आलोचक व विरोधी उनके विदेशी दौरों की यह कहते हुए खिल्ली उड़ाते रहे हैं कि इन दौरों का देश के लिए कोई खास फलितार्थ नहीं होता और मोदी सिर्फ अपने आनंद के लिए विदेशी सैर-सपाटा करते हैं। अलबत्ता, उनका ऐसा कहना पूरी तरह गलत है। हमने मोदी के पिछले कार्यकाल में भी देखा कि किस तरह उन्होंने विदेशी दौरे करते हुए विभिन्न् देशों के नेताओं के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए और दुनिया में भारत की छवि को चमकाने का काम किया। यह प्रधानमंत्री मोदी और उनके प्रमुख सलाहकारों (जिनमें विदेश मंत्री भी शामिल हैं) की मेहनत और सामरिक प्रयासों का ही असर है कि आज दुनिया का कोई देश भारत के नजरिए को नजरअंदाज नहीं करता।

लेकिन मोदी के विरोधियों को यह सब दिखाई नहीं देता। उनके विरोधियों के अगुआ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रति समझ काफी सीमित है और उनकी यह भी प्रवृत्ति है कि वे अपने दायरे से बाहर नहीं देख पाते। हालिया लोकसभा चुनाव नतीजों ने यह दर्शाया कि पांच साल बाद भी लोगों के बीच मोदी की लोकप्रियता घटने के बजाय बढ़ी ही है और यह आज के उच्च अपेक्षाओं वाले दौर में सामान्य बात नहीं। इस लिहाज से मोदी के विदेशी दौरों को 'निजी आनंद के लिए सैर-सपाटा करार देने का विरोधियों का तर्क भी औंधे मुंह गिरा नजर आता है।

मोदी अपने विदेशी दौरों के दौरान जिस तरह विदेशों में बसे भारतीयों के साथ संवाद स्थापित करते हुए उनके मन को छूते हैं और उन्हें प्रोत्साहित करते हैं, वह अद्भुत है। लंबे समय के बाद प्रवासी भारतीयों के मन में अपने मूल देश यानी भारत के प्रति गौरव की अनुभूति जाग्रत हुई है।

लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त जीत हासिल करने के बाद वैश्विक नेताओं में मोदी का कद और भी बढ़ गया है। यह वाकई शानदार है कि किस तरह साधारण पृष्ठभूमि से आया एक शख्स आज दुनियाभर की सराहना अर्जित कर रहा है और बड़ी सहजता से विश्व के नेताओं के बीच अपनी धाक जमाने में कामयाब है।

हां, यह सही है कि देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के मामले में मोदी सरकार पर सवाल उठते रहे हैं और अब तो तकरीबन सभी यह मानते हैं कि नोटबंदी की कवायद खराब तैयारियों और लचर क्रियान्वयन की वजह से बड़ी विफलता साबित हुई। लेकिन यदि विदेशी संबंधों की बात करें तो मोदी ने इस मोर्चे पर अपनी अलग छाप छोड़ी है।

जापान के ओसाका में जी-20 सम्मेलन अमेरिका-चीन के मध्य गहराते कारोबारी तनाव के माहौल में हो रहा था, लेकिन यह भारत ही था जिसने इस सम्मेलन में उत्साह और गर्मजोशी का प्रभाव पैदा किया। मोदी वहां जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ एक त्रिपक्षीय समूह के रूप में मिले। इसके बाद उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से मुलाकात की, जहां पर फोकस वैश्वीकरण, 'व्यापार में उदारीकरण को बरकरार रखने और संरक्षणवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए और डब्ल्यूटीओ सुधारों को समुचित दिशा देने पर केंद्रित था। मोदी वहां पर 'ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका) नेताओं की बैठक में भी शामिल हुए और इसके बाद उनका शिंजो आबे, डोनाल्ड ट्रंप, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जाए-इन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन तथा जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल के अलावा कुछ अन्य नेताओं के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय मुलाकातों का सिलसिला चला। दो दिन के शिखर सम्मेलन में कोई नेता इससे ज्यादा और क्या हासिल कर सकता था।

मोदी सरकार की ऐसी अग्र-सक्रिय रणनीति के फायदे हमें मिल भी रहे हैं। कुछ ही महीने पूर्व हमने देखा कि किस तरह चीन भारत के लगातार दबाव के चलते पाकिस्तान में रह रहे आतंकी सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने पर सहमत हो गया। यदि चीन को यह नहीं लगता कि वो इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग पड़ सकता है तो वह कभी भारतीय दबाव के आगे नहीं झुकता, जिसके चलते उसकी साख को भी धक्का लग रहा था।

बहरहाल, डोनाल्ड ट्रंप ने जी-20 सम्मेलन से पूर्व भारत द्वारा अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क को लेकर चाहे जो भी ट्वीट किया हो, लेकिन ओसाका में उनके सुर सधे हुए नजर आए, जब उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका के संबंध इतने बेहतर कभी नहीं थे। कारोबारी मसलों को लेकर भी उनका समझौतावादी रुख लगा। ट्रंप भले ही अप्रत्याशित रुख के व्यक्ति हों, लेकिन ओसाका सम्मेलन में मोदी के लिए जिस तरह व्यापक स्वीकृति का भाव दिखा, उसे वह भी नजरअंदाज नहीं कर पाए।

जैसा कि विदेश सचिव विजय गोखले ने मोदी की जिनपिंग और पुतिन से मुलाकात के बाद मीडिया ब्रीफिंग में कहा भी कि भारत एक 'बहुध्रुवीय दुनिया को बढ़ावा देना चाहता है, जिसमें 'स्थिरता और बहुत से प्रभुत्व-केंद्र हों।

कहना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में प्रभुत्वकारी भूमिका निभाने के लिहाज से एक नई भारतीय चेतना नजर आ रही है। अब एक ऐसी दुनिया में जहां अपना सर्वोच्च स्तर बरकरार रखने के लिए अमेरिका कोई कसर नहीं छोड़ रहा है और वहीं चीन अमेरिका को टक्कर देने के लिए ज्यादा बड़ी भूमिका निभाना चाहता है, वहां भारत की ये कोशिशें कैसे आकार लेती हैं, यह देखना अभी बाकी है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया को साथ लेकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की दुस्साहसिक कार्रवाइयों को काफी हद तक हतोत्साहित कर दिया है। इसके अलावा अब दक्षिण चीन सागर के मोर्चे पर भी शांति है, जहां पर अतीत में बीजिंग की अनेक गतिविधियां चलती रहती थीं।

हालांकि चीन पर एक हद तक ही भरोसा किया जा सकता है, किंतु हालिया दौर में चीन का यह कहना कि भारत को उससे डरने की जरूरत नहीं, इस बात का संकेत है कि भारत का दबदबा बढ़ रहा है और कैसी भी स्थितियों से निपटने की इसकी सैन्य तैयारियों से चीन वाकिफ है।

जहां तक रूस की बात है तो वह बीते कुछ समय से पाकिस्तान की तरफ झुक रहा था, लेकिन मोदी सरकार ने जिस तरह अमेरिकी दबाव को दरकिनार कर रूस से एस-400 मिसाइल का सौदा किया, उससे उसका यह झुकाव रुक सकता है।

जी-20 सम्मेलन में मोदी ब्रांड कूटनीति की झलक कई तरह से मिली, जिसमें सबसे उल्लेखनीय तो यह बात रही कि एक तरह से सभी ने यह माना कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद का प्रायोजक है। यहां तक कि कई मुस्लिम देश भी आज इसे स्वीकार कर रहे हैं तो यह भारत के लिहाज से बड़ी सफलता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं)