Tokyo Olympics: बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समाज में महिलाओं को सम्मान देने का एक अभिनव प्रयास किया। इसे दुर्भाग्य कहिए या दूरदर्शिता का अभाव कि वर्षों से बेटियों को समाज में उनका उचित स्थान नहीं दिया गया था। कई बेटियों के लिए तो शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पहुंच से बाहर थीं। धीरे-धीरे बदलाव आया। माता-पिता ने बेटियों को पढऩे और खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। आज वह हर क्षेत्र में सफलता की गाथा लिख रही हैैं और दूसरों को प्रेरणा प्रदान कर रही हैैं। एक राष्ट्र के रूप में, हमें अपनी बहनों और बेटियों द्वारा सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने पर गर्व है। आज लड़कियां समाज के हर क्षेत्र और पहलू को प्रभावित कर अपनी छाप छोड़ रही हैं। फिर वे खेलों में कैसे पीछे रह सकती हैं?

जब मैं लड़कियों को खेल के लिए प्रोत्साहित करने वाले अभियान को देखता हूं तो मुझे इस बात से खुशी मिलती है कि यह अभियान देश की उपलब्धियां बढ़ाने में भी कारगर साबित हो रहा है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के साथ-साथ इसका विस्तार बेटी खिलाओ तक करना होगा। भारत के पास 1951 के एशियाई खेलों की मैरी डिसूजा से लेकर पीटी ऊषा और साक्षी मलिक तक महिला खिलाडिय़ों का इतिहास है, जो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलकर आगे बढ़ रही हैं। महिला खिलाडिय़ों ने जो पहचान हासिल की है, वह निरंतर हो रही प्रगति का एक अहम प्रतीक और संकेत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खेलों के प्रति व्यक्तिगत रुचि से, जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को तराशने की प्रक्रिया की गति ने तेजी पकड़ी है। उनका हमेशा से मानना रहा है कि लड़कियों को नए मापदंड स्थापित करने की आवश्यकता है, जिससे अन्य महिलाओं को खेलों में बढ़ावा देने के लक्ष्य को हासिल करने से कोई नहीं रोक पाएगा। खेलो इंडिया अभियान ने एक लंबा सफर तय कर महिलाओं को प्रतिस्पर्धा के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया है, जो न केवल पुरुषों की बराबरी का है, अपितु कुछ पहलुओं में बेहतर भी है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों की लड़कियों को खेलों में अपनी पहचान बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते देख मुझे प्रसन्नता होती है। मुक्केबाजी और कुश्ती अब सिर्फ पुरुषों के खेल नहीं हैं। इन खेलों में महिलाओं ने भी अपना दबदबा कायम करना शुरू कर दिया है। मेरी कोम और साक्षी मलिक ने ओलिंपिक में जो कीॢत हासिल की, वह राष्ट्रीय गौरव की बात है। उन्होंने बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ अभियान को भी दिशा दी है। महिलाओं को खेल में समर्थन मिलने से समाज में बड़े बदलाव देखने को मिले, जिससे हर प्रकार के पूर्वाग्रह खत्म हो गए।

स्प्रिंटर दती चंद की सफलता की कहानी कड़ी मेहनत के महत्व को दर्शाती है। उनमें सफल होने का दृढ़निश्चय था और वह कभी अपने लक्ष्य के पथ से नहीं भटकीं। वह एथलेटिक्स में एक प्रेरणा बनकर उभरी हैं। उनके जैसा संकल्प रखने वाले खिलाडिय़ों के लिए कोई सीमा नहीं है। सारा आकाश उनका है। इसी तरह हमारी महिला हाकी टीम ने जो सफलता हासिल की है, वह एक मिसाल है। उनके बेहतर प्रदर्शन का एक कारण यह भी है कि टीम की सदस्य अब जानती हैं कि मैदान पर अच्छा प्रदर्शन उनके लिए एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करेगा। मैं रानी रामपाल के खेल को काफी समय से देख रहा हूं। इस आधार पर मुझे यह कहना होगा कि उनका करियर हम सभी के लिए एक मिसाल है। इस बार टोक्यो ओलंपिक में अन्य अनेक खिलाडिय़ों के साथ निशानेबाजों से भी बहुत उम्मीद है, खासकर मनु भाकर से, जिन्होंने कम समय में ही बहुत कुछ हासिल कर लिया है।

हम पीवी सिंधु, साइना नेहवाल और सानिया मिर्जा की उपलब्धियां तो जानते ही हैं और भारत का गौरव बढ़ाने के लिए उनके आभारी हैं। इन्होंने न केवल अपने लिए नाम बनाया, बल्कि बड़ी प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर अपने-अपने खेलों को भी लोकप्रिय बनाया। जब प्रधानमंत्री ओलिंपिक जा रहे खिलाडिय़ों को संबोधित कर रहे थे तो उस दौरान महिलाओं की खेलों में भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ने उनका विशेष आभार व्यक्त किया। मेरी कोम के धैर्य पर मैं भी अचंभित हूं। मातृत्व की शक्ति ने उन्हें बाक्सिंग रिंग में और एकाग्र बना दिया है। वह बॉक्सिंग की एक महान खिलाड़ी हैं, जो देश का नाम रोशन करने के लिए बॉक्सिंग रिंग में डटी रहती हैं। मेरी कोम का यह धैर्य और समर्पण एक मिसाल हैं। एक और उदाहरण मीराबाई चानू हैं जो वेटलिफ्टिंग के प्रति पूरी तरह समॢपत हैं। चोट से लड़कर जीतने की मीराबाई की क्षमता भी सराहनीय है। मीराबाई एक अनुशासित खिलाड़ी हैं और मुझे पूरा यकीन है कि वह इस बार ओलिंपिक में अवश्य अच्छा प्रदर्शन करेंगी। लड़कियां बाक्सिंग, कुश्ती, सेलिंग और शूटिंग में बड़ा प्रभाव डाल रही हैं। यह उनकी बहुमुखी प्रतिभा और दृढ़संकल्प का एक नतीजा है।

खेलो इंडिया कार्यक्रम अब देश के कोने-कोने तक पहुंच गया है और अधिकतर खिलाड़ी भारतीय खेल प्राधिकरण की योजनाओं से लाभान्वित हो रहे हैं। मुझे विश्वास है कि यह ओलिंपिक पुरुष खिलाडिय़ों के साथ-साथ महिला खिलाडिय़ों को देश के प्रतीक के रूप में स्थापित करेगा। सरकार की ओर से मैं उन्हें हरसंभव समर्थन का भरोसा देता हूं। कोविड के समय सबसे बड़ी चुनौती खिलाडिय़ों को ओलिंपिक के लिए तैयार करने की रही। इस दौरान हमारे खिलाडिय़ों द्वारा हर चुनौती का मुकाबला पूरी मुस्तैदी के साथ करते देखना सुखद रहा। उम्मीद है कि हमारे सभी खिलाड़ी टोक्यो ओलंपिक में अभूतपूर्व सफलता हासिल करेंग और इनमें महिला खिलाड़ी भी होंगी। मैं देश के सभी खिलाडिय़ों को शुभकामनाएं देता हूं और उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की कामना करता हूं।

(लेखक केंद्रीय खेल एवं युवा मामलों के मंत्री हैं।)

Posted By: Arvind Dubey