1984 का दिसम्बर महीना था, लोकसभा का चुनाव था। इंदिरा गांधी जी की शहादत के कारण राजीव गांधी और कांग्रेस के लिए सहानुभूति की प्रचंड लहर थी, लेकिन फिर भी हम भाजपा के लोग पूरी मजबूती से चुनाव लड़ रहे थे। मुझे राजनीति में आए कुछ ही दिन हुए थे, लेकिन फिर भी कई कारणों से मैं भाजपा की स्टार कैम्पेनर थी। तब साधनों का घोर अभाव था। गाड़ियों की कमी थी। मैं किराये की एक ही एम्बेसडर से रायसेन की तरफ से चुनाव प्रचार करते हुए बाड़ी की तरफ आई। विदिशा लोकसभा का चुनाव था। मुझे बाड़ी (जिला रायसेन) में सभा को सम्बोधित करना था, लेकिन देर हो चुकी थी। रात घिर आई थी, ठंड बढ़ चुकी थी, इसलिए मैं गाड़ी की पीछे की सीट पर ही सो गई। बाड़ी में मुझे भाषण करने के लिए जगाया नहीं जा सका। वहां शिवराज जी का भाषण चल रहा था। वो भाषण खत्म करके आए और मेरी ही गाड़ी की आगे की सीट पर बैठ गए। हम भोपाल पहुंचे।

मेरी सारंग जी (भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे स्व. कैलाश सारंग) के यहां रुकने की व्यवस्था थी, इसलिए मैं जब गाड़ी से उतरी तब मैंने शिवराज जी को पहली बार देखा। उस समय मुझे बहुत ही गंभीर प्रवृत्ति के धैर्यवान व्यक्ति लगे। बाद में मैं भाजपा की उपाध्यक्ष, शिवराज जी भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने। मैं युवा मोर्चा की प्रभारी भी बनी। फिर मेरा और शिवराज जी का संपर्क बढ़ा। कार्यक्रमों में एक साथ भागीदारी होने लगी। मैंने देखा गंभीरता, सहनशीलता, धैर्य उनके स्वभाव के सहज अंग हैं। इस तरह से 2003 तक हमारा एक लंबा साथ चला। उनका विवाह हुआ तो शिवराज जी की जीवनसंगिनी साधना सिंह जी ने मुझे ननद का दर्जा देते हुए मेरी और शिवराज जी की नजदीकियों को और मजबूत किया। जब शिवराज जी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो जो हालात थे, उसमें बहुत कटुता आ सकती थी, किंतु उनके संस्कारशील, शालीन स्वभाव के कारण संतुलन बना रहा।

मैंने मध्य प्रदेश में 2003 में बहुत संघर्ष, तपस्या एवं कठिनाई से कांग्रेस की जड़ें उखाड़ कर भाजपा की सरकार बनाई थी। मेरे बाद शिवराज जी ने उतनी ही तपस्या, संघर्ष एवं धैर्य से सरकार चलाई और इसी के कारण 2008 एवं 2013 में उनके नेतृत्व में चुनाव हुआ एवं भाजपा को विजय मिली। मध्य प्रदेश ने उनके शासन काल में विकास की नई ऊंचाइयों को छुआ। सड़क, बिजली, पानी एवं गाय, गरीब, नारी की रक्षा का वादा पूरा हुआ। शिवराज जी के कार्यकाल की विशेषता रही कि मध्य प्रदेश में जो विकास हुआ, वह मानवीय संवेदनाओं के साथ हुआ। इसके उदाहरण तो अनन्त हैं किन्तु मैं दो का उल्लेख करती हूं - एक ओर सड़क, बिजली, पानी, सिंचाई के काम हो रहे थे तथा दूसरी ओर तीर्थ दर्शन योजना एवं कन्या विवाह भी हो रहे थे। भारत में किसी राज्य में शायद यह पहला प्रयोग था जहां विकास के समानांतर मानवीय संवेदना की धारा बह रही थी।

इस दौरान शिवराज जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी केंद्र में यूपीए की मनमोहन सिंह जी की सरकार। 2006-14 तक मध्य प्रदेश के विकास के स्वर्णिम काल में केंद्र में हमारे लिए विपरीत परिस्थितियां हो सकती थीं, किंतु यह तो अध्ययन योग्य विषय है कि शिवराज जी ने अपनी सूझबूझ और विनम्रता से केंद्र की योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया तथा उन्हीं परिस्थितियों में 2013 का विधानसभा चुनाव प्रबल बहुमत से जीता। जब केंद्र में विपरीत दल की सरकार होती है, तब अधिकतर मुख्यमंत्री अपने राज्यों के विकास को लेकर शिकायत करते हैं कि केंद्र हमारा सहयोग नहीं कर रहा।

इस विषय पर शिवराज जी से सीखा जा सकता है कि ऐसी परिस्थिति का मुकाबला करते हुए कैसे राज्य के विकास की धारा को गतिमान बनाए रखा जाए। फिर आया वर्ष 2018, हम जरा-सी चूक से चुनाव हार गए। कितने प्रकार के दबाव पड़े कि उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया में चूक हो गई और शिवराज जी अपार लोकप्रिय होते हुए भी कुछ सीटों से पीछे रह गए। कमलनाथ जी की सरकार स्वाभाविक रूप से नहीं बनीं थी। न तो जनता, न भाजपा के कार्यकर्ता इस सत्य को स्वीकार कर पा रहे थे। कमलनाथ जी की सरकार को बहुत लोग मिलकर चला रहे थे तथा जिस नौजवान की बदौलत प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन पाई थी, उसकी एवं उसके सहयोगियों की पूरे समय अवहेलना हो रही थी, अपमान हो रहा था। अधिकारी निरंकुश, सब तरफ अराजकता का माहौल था तथा मध्य प्रदेश के नागरिक असुरक्षा के बोध से पीड़ित हो गए थे। सरकार तो गिरनी ही थी। ऐसी सरकार लोकतंत्र के लिए घातक होती। अंत में कांग्रेस में भगदड़ मची और सरकार गिरी। ज्योतिरादित्य जी भाजपा में आए एवं उनके साथी जो कैबिनेट मिनिस्टर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे, वे भी पद की परवाह न करते हुए सर्वस्व त्याग कर भाजपा में आए।

अगर कमलनाथ जी ने इस्तीफे की जगह फ्लोर टेस्ट का सामना किया होता तो एक साथ 40-50 विधायकों की हिलोर उधर से इधर आ गई होती, क्योंकि कांग्रेस के सभी विधायक असुरक्षित महसूस करने लगे थे और अभी तक कर रहे हैं। 23 मार्च, 2020 को जब शिवराज जी ने शपथ ली, तब उनके साथ पांच कैबिनेट मिनिस्टर थे। देश में दिनांक 22 मार्च को लॉकडाउन लग गया था। फिर पंचमुखी महादेव की तरह शिवराज जी ने लॉकडाउन का मुकाबला किया। कोरोना का मुकाबला किया। फिर 28 स्थानों पर उप चुनावों का मुकाबला किया। इन सबमें हमने उनके साथ मेहनत की और जिस तरह से ज्योतिरादित्य जी ने अपने लोगों को कांग्रेस के टिकट पर जिता लिया था, उसी तरह से भाजपा से भी उनको जिता कर ले आए।

ज्योतिरादित्य जी जैसा करिश्माई व्यक्तित्व भाजपा की बड़ी उपलब्धि है। उनके साथ आए सभी लोग भी हमारी ताकत बन गए हैं। जब हम सवा साल के लिए सत्ता से बाहर थे, तब शिवराज जी संघर्ष के लिए सड़क पर खड़े हो गए, और जब सरकार बनी तो कोरोना के इस कठिन दौर में विकास की प्रकियाओं को चलाने में भी उन्होंने चमत्कार दिखाया। वे भारत की राजनीति के अनूठे नेता हैं। उनमें एक साथ गंभीरता, गहराई, दृढ़ता एवं शालीनता का मेल है। मेरे बड़े भाई श्री शिवराज जी मुझसे एक वर्ष बड़े होते हुए भी मुझे कभी पिता जैसे तो कभी पुत्र जैसे तथा कई गुणों में गुरु के जैसे लगते हैं। वर्तमान सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा करने के लिए शिवराज जी, भाजपा के कार्यकर्ता, भाजपा के विधायक, ज्योतिरादित्य जी एवं उनके साथी तथा मध्य प्रदेश की जनता का कोटि-कोटि अभिनन्दन। मैं हमेशा शिवराज जी की समर्थक, सहयोगी रहूंगी तथा मध्य प्रदेश में भाजपा का ध्वज लहराता रहे, इसके लिए खुद भी जी तोड़ मेहनत करूंगी।

(लेखिका मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं)

Posted By: Prashant Pandey

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