बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के ठीक पहले ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों के नेताओं को एकजुट होने और लोकतंत्र बचाने की जो चिट्ठी लिखी, वह इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। इस चिट्ठी में उन्होंने विपक्षी नेताओं को भाजपा से आगाह करते हुए यह आरोप लगाया कि वह देश में एक ही पार्टी का शासन चाहती है और इसीलिए ईडी, सीबीआइ आदि के जरिये गैर-भाजपा नेताओं को निशाना बना रही है। सोनिया गांधी, शरद पवार से लेकर अखिलेश और तेजस्वी यादव को लिखी चिट्ठी में उन्होंने यह भी कहा है कि जहां भाजपा पैसे के दम पर दूसरे दलों के नेताओं को खरीद रही है, वहीं केंद्र सरकार राज्यों का फंड रोक रही है। चुनावों के बीच यह चिट्ठी चकित करती है, क्योंकि किसी भी लिहाज से विपक्षी एकता की मुहिम का यह सही वक्त नहीं। ममता की यह चिट्ठी कई सवाल खड़े करने के साथ यह भी आभास कराती है कि कहीं उन्हें अपनी पराजय की आशंका तो नहीं सता रही या फिर वह यह तो नहीं चाह रहीं कि बहुमत से पीछे रह जाने का स्थिति में कांग्रेस उनका समर्थन करने के लिए आगे आ जाए? आखिर उन्होंने चुनाव के पहले ऐसी कोई कोशिश क्यों नहीं की? क्या यह अच्छा नहीं होता कि वह वाम दलों न सही, कांग्र्रेस को अपने साथ मिलकर चुनाव लडऩे की पेशकश करतीं? आखिर वह कांग्रेस से ही तो निकली हैं।

कांग्रेस से निकलकर अपना अलग दल बनाने के बाद ममता पहले भाजपा के नेतृत्व वाले राजग का हिस्सा बनीं, फिर कांग्रेस की अगुआई वाले संप्रग का। वैसे तो वह केंद्र में मंत्री भी रही हैं, लेकिन मूल रूप से उन्होंने बंगाल केंद्रित राजनीति ही की है। परिवर्तन के नारे के साथ उन्होंने वाम दलों का सफाया करके राज्य की सत्ता संभाली, लेकिन दस साल बाद यह पता चल रहा है कि राज्य में वैसा कुछ बदलाव तो हुआ ही नहीं, जिसका उन्होंने वादा किया था। उन्होंने अपनी ही गलतियों से अपनी राजनीतिक स्थिति कमजोर की है। उन्हेंं सबसे ज्यादा नुकसान मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के चलते उठानी पड़ी। वोटों के लालच में दुर्गापूजा के समारोहों पर रोक लगाना तुष्टीकरण की राजनीति की पराकाष्ठा ही कही जाएगी। जय श्रीराम नारे पर आपत्ति जताकर उन्होंने खुद को हिंदू विरोधी जताने मे संकोच नहीं किया। भाजपा इसका लाभ उठा रही है। जब ममता को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई दी, तब उन्होंने भूल सुधार करने की कोशिश में चंडी पाठ करने और खुद का गोत्र बताने का भी काम किया, लेकिन यह साफ है कि अब देर हो गई है। उनके लिए खतरे की घंटी बजती दिख रही है।

यह पहली बार नहीं, जब किसी ने भाजपा के विरोध में विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश की हो। 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से विपक्षी नेता रह-रहकर भाजपा के खिलाफ कोई मोर्चा बनाने की कोशिश करते रहे हैं। यह कोशिश सोनिया गांधी से लेकर क्षेत्रीय दलों के कई नेता भी कर चुके हैं। एक समय खुद ममता बगैर कांग्रेस के विपक्षी दलों का मोर्चा बनाने की कोशिश कर चुकी हैं। हर बार यह कोशिश नाकाम हुई तो इसीलिए कि उसका मकसद केवल सत्ता हासिल करना या अपनी राजनीतिक जमीन बचाना रहा। विपक्षी दल इसलिए चिंतित हैं, क्योंकि भाजपा वहां भी अपना विस्तार करने में सक्षम है, जहां पहले उसकी उपस्थिति नहीं थी। अपनी राजनीतिक सूझबूझ से भाजपा जिस तरह अपना विस्तार कर रही है, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। जो भाजपा बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में मुकाबले में नहीं थी, वह आज सत्ता की प्रबल दावेदार बन गई है। उसका दावा तभी मजबूत हो गया था, जब 2019 के आम चुनाव में उसने 42 में से 18 सीटें हासिल की थीं। इसके पहले वह असम और त्रिपुरा में अप्रत्याशित सफलता हासिल कर विरोधियों और राजनीतिक पंडितों को चौंका चुकी है।

बंगाल के नतीजे कुछ भी हों, यह किसी से छिपा नहीं कि कांग्रेस और वाम दल खुद को सत्ता की दौड़ से बाहर मान रहे हैं। जहां वाम दल ममता को राजनीतिक रूप से कमजोर होते हुए देखना चाहते हैं, वहीं कांग्रेस के बड़े नेता और खासकर राहुल और प्रियंका जिस तरह बंगाल में चुनाव प्रचार करने से कतरा रहे हैं, उससे तो यह लगता है कि उनकी रणनीति ममता की राह आसान करना है। सच जो भी हो, कांग्रेस एक के बाद एक राज्यों में जिस तरह अपने हथियार डाल रही है, उससे वह और कमजोर ही हो रही है। उसकी कमजोरी का एक कारण उसका वामपंथी मानसिकता से लैस होते जाना भी है। कांग्रेस और वाम दलों ने बंगाल में फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को अपने गठबंधन का हिस्सा बनाकर तुष्टीकरण की राजनीति पर ही चलते रहने का संकेत दिया है। कांग्रेस जो काम बंगाल में कर रही है, वही केरल और असम में भी। यह वह राजनीति है, जो लंबे समय तक कहीं नहीं चली। एक समय दलित-मुस्लिम गठजोड़ राजनीतिक कामयाबी की गारंटी होता था, लेकिन अब यह बिखर चुका है। जिस तरह दलित यह समझ चुके हैं कि उनके हितैषी बनने का दावा करने वाले उनका चुनावी इस्तेमाल करते हैं, वैसे ही मुस्लिम भी यह समझें तो बेहतर। वस्तुत: हर किसी को अपने मत का उपयोग अपने और देश के विकास को ध्यान में रखकर करना चाहिए। पता नहीं ऐसी स्थिति कब बनेगी, लेकिन इसमें दोराय नहीं कि विपक्षी एकता की हांडी बार-बार चढऩे वाली नहीं है।

देश की जनता इससे वाकिफ है कि जो विपक्षी दल एकजुट होकर मोदी को चुनौती देना चाह रहे है, वे अपने राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने के फेर में हैं। यदि कोई विपक्षी दलों को एकजुट करना चाहता है तो उसे कोई कारगर रूपरेखा सामने रखनी होगी। भाजपा को हराने का इरादा तो ठीक है, लेकिन आखिर उसे हराकर विपक्षी नेता समाज और देश के लिए क्या करेंगे? विपक्षी एकता में एक बड़ी बाधा अधिकांश क्षेत्रीय दलों के पास राष्ट्रीय दृष्टि का अभाव होना है। ये क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। उचित होगा कि विपक्षी एकता की बात करने वाले देश निर्माण की ऐसी कोई रूपरेखा लेकर सामने आएं, जो भाजपा से बेहतर हो। केवल इस रट से बात बनने वाली नहीं कि मोदी के कारण लोकतंत्र खतरे में है।

Posted By: Arvind Dubey

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