सोशल मीडिया पर एक अजीब किस्म की होड़ चल पड़ी है। इसमें एक धर्म विशेष के लोगों पर हुए हमलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। पिछले कुछ समय से ऐसा नियमित रूप से हो रहा है। ऐसी कवायद से सामाजिक दरारें और चौड़ी होती हैं। इससे सिवाय नफरत के और कुछ हासिल नहीं होता। हालांकि जो हो रहा है, उसकी कुछ आशंका पहले से ही थी। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तब सोची-समझी साजिश के तहत एक अभियान चलाया गया कि उनके शासन में अल्पसंख्यक खतरे में हैं। इसे साबित करने की भरसक कोशिशें की गईं।

इस बीच इस तथ्य की अनदेखी की गई कि नरेंद्र मोदी 13 साल जिस राज्य के मुख्यमंत्री रहे, वहां वर्ष 2002 के बाद एक भी दंगा नहीं हुआ। 2002 में भी जब दंगा भड़का तो उन्हें मुख्यमंत्री बने हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले गुजरात में नियमित अंतराल पर दंगे होते थे। कुछ विश्लेषक वर्ष 1969, 1985 और 2002 का उदाहरण देते हुए उल्लेख करते हैं कि राज्य में हर 16 वर्ष के अंतराल पर दंगा हुआ। वह चक्र टूट गया था। हालांकि वर्ष 2006 में नगर निगम द्वारा एक दरगाह तोड़े जाने के बाद जरूर कुछ सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, किंतु उसने भीषण आग नहीं पकड़ी। इस तरह गुजरात ने हर 16-17 साल में भड़कने वाले दंगे के कुख्यात चक्र को मात दी। इसके बावजूद जो लोग चुनावों में हार गए, उन्होंने मोदी को एक विभाजनकारी नेता के रूप में स्थापित करने की भरसक कोशिश की।

मोदी के पहले कार्यकाल में इकलौता दंगा सहारनपुर में दर्ज हुआ, जहां 2014 में एक विवादित जमीन को लेकर मुस्लिम और सिख समुदाय के लोग भिड़ गए। पश्चिम बंगाल में भी सांप्रदायिक तनाव के मामले देखने को मिले, लेकिन वह एक अलग मुद्दा है। इस दौरान अपेक्षाकृत शांति ही रही और मुजफ्फरनगर जैसा कोई हादसा नहीं हुआ। कुछ छिद्रान्वेषी सांप्रदायिक हिंसा के छिटपुट मामलों का सहारा लेकर अपना विमर्श गढ़ते रहे। शोहरत और खुद की खास छवि बनाने के मकसद से भाजपा के कुछ बयान बहादुर नेताओं ने भी उनकी उतनी ही मदद की। भाजपा के ऐसे नेताओं ने इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी की नसीहत को भी नजरअंदाज किया और भाजपा विरोधियों को मसाला मुहैया कराते रहे। मोदी विरोधियों को इसका श्रेय जरूर जाएगा कि वे इस दुष्प्रचार को अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजरों में भी ले आए, जिसका झुकाव वामपंथ की ओर रहा है। भले ही मोदी एक नहीं दो बार दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र द्वारा चुने गए हों, लेकिन एक तबका उन्हें नेता मानने को तैयार ही नहीं। इसीलिए देशी-विदेशी वामपंथी मीडिया द्वारा मोदी को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, क्योंकि वह ऐसे नेता हैं जिन्होंने पुरानी साम्राज्यवादी ताकतों के आगे झुकने से इनकार कर दिया और वह हमेशा भारत को सर्वोपरि रखते हैं। दूसरों का मोहताज भारत अब अतीत की बात हो चला है। हाल में जापान में संपन्न् जी-20 देशों के सम्मेलन में हमने देखा कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति के बगल में बैठे। अमेरिकी विश्लेषकों ने गौर किया कि अन्य नेताओं के साथ बातचीत के उलट प्रधानमंत्री मोदी के साथ वार्ता में राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सहज और दोस्ताना नजर आए। प्रधानमंत्री मोदी की गले लगाने वाली कूटनीति रंग ला रही है जबकि इसके लिए देश में एक वर्ग उनका मखौल उड़ाता आया है। चूंकि मैं अमेरिका में रही हूं तो इस नाते बता सकती हूं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस आत्मविश्वास और आत्मबल का परिचय दिया है, उसे दुनिया की बड़ी शक्तियों ने मान्यता दी है। इसमें गलबहियों से ज्यादा इन दो खूबियों की अहम भूमिका रही है। साथ ही चुनावों में एक लोकतांत्रिक नेता के रूप में उनकी शानदार पारी से दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक नेता को रश्क हो सकता है।

जहां दुनिया भर के नेता भारत की जटिलताओं और विविधता से भरे देश में शासन संभालने की कड़ी चुनौतियों को समझते हैं, वहीं मोदी विरोधियों का एक ही एजेंडा है। 2019 में एक सुनियोजित अभियान चलाने के बावजूद वे चुनाव जीतने में नाकाम रहे। जब हिंदुओं पर हमले होते हैं तो उनकी पक्षपातपूर्ण प्रतिक्रिया ही जाहिर होती है। सोशल मीडिया में हर एक हमले की चर्चा होती है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े हिस्से का आडंबर देखिए कि मुस्लिम के मामले में तो वह सुर्खियों में जगह पाता है, लेकिन जब पीड़ित हिंदू होता है तो उसे 'एक समुदाय का बताकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। इस साल 23 मई के बाद से ही हिंदुओं के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा के तमाम मामले सामने आए, लेकिन उनकी चर्चा दबे सुर में ही की गई। हमारे देश में रोजाना कई मामलों अन्याय होता है, लेकिन अगर हम पीड़ित को एक पहचान से जोड़ने पर ही पूरा जोर देंगे तो क्रूरता का नक्शा नाटकीय रूप से बदल जाएगा। ऐसे हमलों की होड़ का यही नतीजा निकलता है कि सोशल मीडिया पर रोजाना ऐसे अपराध सामने आते हैं और टीआरपी के लिए टेलीविजन मीडिया दिन भर उस मुद्दे पर चर्चा करता है। इन चर्चाओं में चाहे हिंदू हों, मुस्लिम हो या फिर ईसाई, सभी समुदायों के कट्टर प्रतिनिधियों को ही चर्चा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

आज हम जिस पड़ाव पर हैं, वहां हमें आना ही था और इसका वास्ता इससे कम है कि देश की कमान कौन संभाले हुए है, बल्कि हर एक पहलू राजनीति और वामपंथी पक्षपात से जुड़ा है जो विमर्श पर नियंत्रण रखते हैं और पीड़ित को तभी भुनाते हैं, जब हमलावर हिंदू हो। ऐसे में दशकों से चले आ रहे सुविधाजनक विरोध को जवाब देना जरूरी था। अगर कठुआ को सांप्रदायिक रंग दिया गया तो अलीगढ़ में एक बच्ची की मौत के मामले में भी यही हुआ। यह सिलसिला कायम है। माहौल इतना तल्ख हो गया है कि दिल्ली के चांदनी चौक में कुछ मुस्लिम शरारती तत्वों के चंगुल से एक हिंदू लड़के को बचाने वाले मुल्ला जी का कहीं जिक्र तक नहीं हुआ, क्योंकि टीवी ने मुल्लाओं की एक कट्टर छवि जो स्थापित कर दी है।

अब एक अलग ही किस्म की तिकड़म अपनाई जा रही है और आम भारतीयों को उसे अवश्य देखना चाहिए। चाहे हिंदू हो या मुसलमान, कोई भी पीड़ित एक पीड़ित ही है। उसकी पहचान से उस पर हुए अत्याचार की मार कम नहीं हो जाती। हमें किसी भी पहचान से पहले स्वयं को भारतीय के रूप में देखना चाहिए। धर्म के नाम पर भड़काने वाले नेताओं की हमें हर हाल में निंदा करनी चाहिए। हमें उन लोगों के हाथ की कठपुतली बनने से बचना चाहिए जो अपने फायदे के लिए आम लोगों के दुख-दर्द का लाभ उठाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत 'सबका विश्वास जीतने के संकल्प के साथ की है। फिर भी चिंता के कुछ पहलू हैं। इसमें हमें भी अपनी भूमिका निभानी होगी। इसके लिए शायद टीवी और सोशल मीडिया से पीछा छुड़ाकर एक-दूसरे का विश्वास जीतने में जुटना होगा।

(लेखिका पटकथाकार व स्तंभकार हैं)