हिंदी को राजकाज में बढ़ावा देने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेशकश पर तमिलनाडु की राजनीति में उबाल आ गया। द्रमुक नेता एम. करुणानिधि ने इसे भावनात्मक मुद्दा बनाने का प्रयास किया तो उनकी प्रखर विरोधी अन्नाद्रमुक की नेता जे. जयललिता ने भी हिंदी के विरुद्ध बयान दे दिया। अच्छा हुआ कि केंद्र ने समय रहते साफ कर दिया कि हिंदी किसी अहिंदी भाषी राज्य पर लादी नहीं जाएगी। देश और समाज के हितों का भी तकाजा है कि कोई भाषा किसी अन्य भाषा-भाषी समुदाय पर लादी न जाए। पाकिस्तान में हम ऐसे भाषाई प्रयोग के खतरनाक परिणाम देख चुके हैं। वहां बांग्लाभाषी पूर्वी पाकिस्तान पर पश्चिमी पाकिस्तान की 'कौमी जुबान" उर्दू को जबरिया लाद दिया गया था। इससे पूर्वी पाकिस्तान की बहुसंख्य आबादी की भावनाएं आहत हुईं। उन्हें लगा एक भाषा के माध्यम से उन्हें एक सांस्कृतिक उपनिवेश बनाया जा रहा है। पूर्वी पाकिस्तान का निवासी स्वयं को पंजाबी प्रभुत्व वाले पश्चिमी पाकिस्तान की अपेक्षा भारत के पश्चिम बंगाल की भाषा एवं संस्कृति के अधिक निकट पाता था। काजी नजरुल इस्लाम उनके लिए बहुत अपने और बहुत बड़े कवि थे तो कवींद्र रवींद्रनाथ ठाकुर भी उन्हें उतने ही आत्मीय लगते थे। रवींद्र संगीत को वे अपनी अत्यंत मूल्यवान धरोहर मानते थे। लेकिन एक मजहब यानी इस्लाम के पाबंद होने के बावजूद पंजाबी और बंगाली भाषाओं के टकराव ने भारी रक्तपात के बीच पाकिस्तान को तोड़ दिया।

लगता है कि मोदी सरकार ने भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने की कार्ययोजना बनाई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को निर्देश दिए गए हैं कि हिंदीभाषी राज्यों में राजकीय अंतर्संवाद हिंदी में किया जाए। तमिलनाडु जैसे जिन राज्यों में हिंदी का राजनीतिक तौर पर विरोध होता है, उनको उनकी इच्छा पर छोड़ दिया जाए। वैसे सच तो यह है कि तमिलनाडु में भी हिंदी का उपयोग राजनीतिक प्रतिरोध के बावजूद बढ़ता जा रहा है। वैश्विक बाजार की भाषा अंग्रेजी को देश के अन्य राज्यों की भांति वहां भी अपनाया जाता है। परंतु अंतरराज्यीय व्यापार और रोजगार के बेहतर अवसर तलाशने के लिए बड़ी संख्या में तमिल युवा अंग्रेजी के साथ हिंदी को भी जानना-समझना चाहते हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन के सभी नायक इस तथ्य से परिचित थे कि 1857 से 1947 तक हिंदी स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा थी। वे भारतीय राष्ट्र-राज्य की इस अनिवार्यता से भी वाकिफ थे कि उसके लिए 'एक निशान, एक विधान और एक जुबान" होना चाहिए। बहुभाषा-भाषी भारत में एक जुबान की अनिवार्यता को पूरा करने के लिए ही स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर सुभाषचंद्र बोस तक ने भारत की राजभाषा हिंदी रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए थे। ऐसा होना निश्चित भी हो गया था, परंतु एक राजनीतिक हठ ने सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया।

राजकाज की भाषा तय करने के लिए वर्ष 1955 से 1961 तक भारत के गृहमंत्री रहे गोविंद वल्लभ पंत की अध्यक्षता में संसदीय समिति गठित की गई थी। श्री पंत के निजी सहायक रहे पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक 'स्कूप" में हिंदी की नियति में आए उस मोड़ का विस्तार से उल्लेख किया है, जिसने उसे राजभाषा अधिकार पाने से वंचित कर दिया। पुस्तक में लिखा है : 'प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उस रिपोर्ट से नाखुश थे, जो पंत की अध्यक्षता में संसदीय समिति ने तैयार की थी। समिति द्वारा पेश की गई रपट में हिंदी को मुख्य भाषा और अंग्रेजी को सहायक भाषा घोषित करने की सिफारिश की गई थी। पर इस बदलाव के लिए किसी निश्चित तिथि का उल्लेख रपट में नहीं था। वैसे भारतीय संविधान में सरकारी काम-काज की भाषा को अंग्रेजी से बदलकर हिंदी करने की अंतिम तिथि 26 जनवरी 1965 मुकर्रर की गई थी। पर अंग्रेजी वातावरण में पले-बढ़े नेहरू अंग्रेजी के लिए प्रयोग किए गए 'सब्सिड्यरि" (सहायक) शब्द से नाराज हो उठे। उन्होंने पंत से कहा कि इसका अर्थ यह हुआ कि अंग्रेजी 'दासों" की भाषा है? अजीब मुश्किल में पड़े पंत ने अपने सूचना अधिकारी को मेरे पास भेजकर कहलवाया कि मैं दिल्ली के हर पुस्तकालय को छान मारूं और जितने शब्दकोशों उपलब्ध हो सकते हैं, उन्हें देखकर इस शब्द का अर्थ तलाशूं। उनमें से कुछ शब्दकोशों में मैंने 'सब्सिड्यरि" को वैकल्पिक व्याख्या के रूप में 'एडिशनल" शब्द पाया। इस जानकारी के आधार पर पंत ने नेहरू को लिखा कि 'सब्सिड्यरि" (सहायक) और 'एडिशनल" (अतिरिक्त) दोनों शब्दों के अर्थ करीब-करीब एक-से हैं। उन्होंने मद्रास सरकार द्वारा केंद्र को सौंपे गए एक ज्ञापन को भी उद्धृत किया, यह साबित करने के लिए कि किस तरह एक ऐसे दक्षिण भारतीय राज्य द्वारा भी अंग्रेजी के लिए 'सब्सिड्यरि" शब्द का प्रयोग किया गया है, जहां अंग्रेजी में ही काम-काज संचालित होते थे। ज्ञापन इस प्रकार था - ''1965 तक हिंदी को संघ राज्य की मुख्य राजकीय भाषा का दर्जा देना संभव है, यदि उसके बाद अंग्रेजी को काम-काज की 'सब्सिड्यरि" (सहायक) भाषा के रूप में प्रयोग किए जाने संबंधी प्रावधान बनाए जाएं तो।"" लेकिन पंत के इस तर्क को नेहरू ने स्वीकार नहीं किया। उन्होंने फोन पर नाराजगी जाहिर की। मैंने देखा कि फोन पर हुई बातचीत के बाद पंत काफी आहत नजर आ रहे थे। वे इस बात को पचा नहीं पा रहे थे कि नेहरू, जिन्हें वह अपना आदर्श मानते थे, ने इस रपट के लिए उनकी लानत-मलामत की। पंत ने कहा - 'आप देखेंगे, हिंदी कभी भारत की सर्वमान्य भाषा नहीं बन पाएगी, मैं तो उस वक्त तक जिंदा नहीं रहूंगा।" उसी दिन पंतजी को पहली बार दिल का दौरा पड़ा।" (पृष्ठ 53-54)

हिंदी के हितैषियों को यह जानना सुखद लगेगा कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के भागीरथी प्रयत्न करने वाले दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल और अब नरेंद्र मोदी सभी की मातृभाषा गुजराती रही है। देश के लिए 'एक निशान (राष्ट्रीय ध्वज), एक विधान (भारतीय संविधान) और एक जुबान (राष्ट्रभाषा)" चुनने की चाहत रखने वालों को विचलित हुए बिना हिंदी की सर्वसमावेशी भाषाई संस्कृति की शक्ति पर भरोसा रखना चाहिए। हिंदी भाषा रेल के पहियों पर राष्ट्रव्यापी यात्राएं करती है, बैंकों के खातों के पन्ने पलटती है, फिल्मों और टीवी सीरियलों से लिपटकर घर-घर में चहकती है। वह सभी भारतीय भाषाओं को बहुत कुछ देती है तो उनके मधुर शब्दों को पालकी में बिठाकर उनका कहार बनने से भी गुरेज नहीं करती। कभी राजकपूर की फिल्म 'श्री 420" में हिंदी और तेलुगू की जुगलबंदी 'रमैया वस्तावैया, मैंने दिल तुझको दिया" लोकप्रिय हुई थी तो अभी पिछले दिनों एक तमिल गीत 'आ अंटे अमलापुरम, अह अंटे अहापुरम, ए अंटे इंडियन रिदम, इलू-इलू करके नाचेंगे हम" बहुतों को गुनगुनाते सुना गया है। भाषा को वास्तविक शक्ति लोक से मिलती है, राजनीति से नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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