इन दिनों भारत में रोजगार के वर्तमान और भावी परिदृश्य को लेकर विभिन्न् वैश्विक रिपोर्ट्स में दो बातें उभरकर सामने आ रही हैं। एक, मौजूदा समय में आर्थिक सुस्ती के कारण देश में रोजगार विकास दर धीमी हो गई है। दो, युवाओं को बेहतर रोजगार लायक बनाने हेतु कौशल प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए आगामी दस वर्षों में महती प्रयासों और निवेश की जरूरत है। साफ है कि रोजगार के मोर्चे पर बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए बहुआयामी प्रयास करने होंगे। नए रोजगार अवसरों का सृजन करने के लिए सार्वजनिक व्यय बढ़ाया जाए। साथ ही नवंबर 2019 तक केंद्र सरकार के विभिन्न् विभागों में जो 6 लाख 84 हजार पद खाली पड़े हैं, उन्हें शीघ्र भरने की कवायद की जाए। स्वरोजगार और स्टार्टअप से भी रोजगार अवसर बढ़ाए जाएं। बदलती दुनिया में उभरती नई-नई रोजगार जरूरतों के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व प्रशिक्षण हेतु निवेश बढ़ाया जाए।

गौरतलब है कि केयर रेटिंग्स नामक एक रेटिंग एजेंसी द्वारा रोजगार की स्थिति पर प्रस्तुत हालिया अध्ययन के अनुसार देश में रोजगार संबंधी चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। इस अध्ययन में उद्योग-कारोबार और सेवा क्षेत्र से जुड़ी 1,938 कंपनियों को शामिल किया गया था। अध्ययन से पता चला कि देश में रोजगार 2015-16 में 2.5 प्रतिशत, 2016-17 में 4.1 प्रतिशत, 2017-18 में 3.9 प्रतिशत और 2018-19 में 2.8 प्रतिशत की दर से बढ़े। यानी बीते दो वर्षों में देश में रोजगार विकास की रफ्तार लगातार सुस्त हुई है।

इस अध्ययन के तहत देश के मुख्य उद्योगों में तो रोजगार विकास की स्थिति नकारात्मक पाई गई, यानी रोजगार बढ़ने के बजाय घटे ही। वहीं देश के उपभोक्ता-उन्मुख उद्योगों ने एक अलग पैटर्न दिखाया, जैसे कृषि और टिकाऊ सामानों से जुड़े रोजगार में मंदी आई। एफएमसीजी और वस्त्र उद्योग में 3.3 प्रतिशत के औसत से कम स्तर पर वृद्धि हुई।

इसी तरह तकरीबन एक माह पूर्व सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में भी बढ़ती बेरोजगारी का चिंतनीय परिदृश्य उभरकर सामने आया। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बेरोजगारी दर अक्टूबर में बढ़कर 8.5 फीसदी हो गई, जो अगस्त, 2016 के बाद से सर्वाधिक है। ये आंकड़े भारतीय अर्थव्यस्था में सुस्ती के लक्षणों को दर्शाते हैं। इसी तरह अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबल इंप्लॉयमेंट द्वारा भारत में रोजगार के परिदृश्य पर कराए गए अध्ययन में कहा गया कि कृषि और विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियों में कमी आई है, वहीं निर्माण और सेवा क्षेत्र भी इस गिरावट को कम नहीं कर सके। रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल रोजगार 47.42 करोड़ थे, जो 2017-18 में घटकर 46.51 करोड़ रह गए।

यह तो हुई रोजगार की स्थिति की बात, अब हम रोजगारपरक शैक्षणिक गुणवत्ता पर भी नजर डालते हैं। हाल ही में शैक्षणिक और प्रशिक्षण संस्थानों की विश्व रैंकिंग से संबंधित दो रिपोर्ट्स प्रकाशित हुईं। एक तो 26 नवंबर को आई क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी एशिया रैंकिंग 2020 है। इसके मुताबिक 2019 में भारत के अधिकांश प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थाओं की रैंकिंग में गिरावट आई। देश का कोई भी शिक्षण संस्थान शीर्ष 30 एशियाई संस्थानों की सूची में जगह नहीं बना सका। आईआईटी, मुंबई पिछले वर्ष के मुकाबले एक स्थान फिसलकर 34वें स्थान पर आ गया। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक शिक्षा अध्ययन के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी छात्रों की आबादी भारत में होगी। ऐसी नई आबादी को रोजगार योग्य बनाने के लिए भारत को अध्ययन तथा शोध कार्य में अपना निवेश बढ़ाना ही होगा।

इसी तरह 18 नवंबर को विश्वविख्यात आईएमडी बिजनेस स्कूल, स्विट्जरलैंड द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग, 2019 आई। इसमें भारत 63 देशों की सूची में पिछले वर्ष के मुकाबले छह पायदान फिसलकर 59वें स्थान पर आ गया। हमारा इस तरह ग्लोबल टैलेंट रैंकिंग में बहुत पीछे रहने पर चिंतित होना लाजिमी है। इससे आगे बढ़ने की राह निकालनी ही होगी। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि देश की नई पीढ़ी को हुनरमंद, प्रतिभावान बनाकर ही रोजगार की उजली संभावनाओं को साकार किया जा सकता है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम आयु की है। चूंकि भारत के पास विकसित देशों की तरह रोजगार बढ़ाने के पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, अतएव इसकी युवा आबादी ही आज की जरूरतों के मुताबिक कौशल प्रशिक्षित होकर मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में दुनिया के लिए उपयोगी और भारत के लिए आर्थिक कमाई का प्रभावी साधन सिद्ध हो सकती है।

देश में युवाओं के लिए रोजगार के परिदृश्य को सुधारने हेतु व्यापक उपाय करने होंगे। स्वरोजगार के नए अवसर पैदा करने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) को तेजी से आगे बढ़ाना होगा। इस समय दुनिया में भारत स्टार्टअप के मामले में तीसरे क्रम पर है। ऐसे में नई पीढ़ी को स्टार्टअप के माध्यम से भी बड़ी संख्या में रोजगार के लिए प्रोत्साहित करना श्रेयस्कर होगा। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के निकाय श्रम ब्यूरो ने 'प्रधानमंत्री मुद्रा योजना सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 से लेकर 2018 के बीच मुद्रा योजना के तहत 4.25 करोड़ नए उद्यमियों को कर्ज बांटे गए। इन कर्जों ने कुल 11.2 करोड़ नए रोजगार पैदा किए। यह संख्या स्वरोजगार में लगे लोगों की 55 फीसदी है। ऐसे में मुद्रा योजना को और अधिक विस्तारित करके रोजगार के अवसर बढ़ाए जाने जरूरी हैं।

हम उम्मीद करें कि सरकार देश में युवाओं की खातिर रोजगार अवसरों में वृद्धि करने के लिए सार्वजनिक व्यय बढ़ाएगी और रोजगारोन्मुखी कार्यक्रमों/योजनाओं को बढ़ावा देगी। सरकारी विभागों में खाली पदों पर शीघ्रता से नियुक्तियां करेगी। इसके साथ-साथ सरकार स्वरोजगार और स्टार्टअप से रोजगार बढ़ाने के लिए त्वरित कदम उठाएगी। यह सही है कि देश में इस वक्त आर्थिक सुस्ती का माहौल है, जिसकी वजह से रोजगार भी घट रहे हैं। इससे निपटने के लिए सरकार को चौतरफा उपाय करने होंगे। युवा शक्ति हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। उसके सही नियोजन के जरिए ही हम देश को तेजी से तरक्की की राह पर आगे ले जा सकते हैं। लिहाजा, हमारे नीति-नियंताओं को ऐसे उपाय करने ही होंगे, जिससे शहरी व ग्रामीण समेत तमाम युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ें और युवा ऊर्जा को सही दिशा में नियोजित किया जा सके।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)

Posted By: Ravindra Soni

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