सनातन धर्म में श्री राम सबसे बड़े आराध्यों में से एक हैं, जिनका नाम हमारे जीवन के हर क्षण में मुखार बिंदु से किसी न किसी वजह से निकल ही जाता है, लेकिन हम राम नाम की महत्ता से लगभग अनजान ही हैं। सदियों पहले ही कबीरदास जी यह बात लिख गए हैं। मुख से निकलने वाला दो अक्षर का अद्भुत नाम 'राम' अपने आप में तीर्थ के समान है। सुबह आँखें खुलने से लेकर रात में सोने तक हम न जाने कितनी ही बार राम नाम का सम्बोधन कर लेते हैं, और इस बहाने श्री राम का स्मरण पूरे दिन हमारे मन-मस्तिष्क में रहता है।

हमारे साथ हमेशा श्री राम रहते हैं, जैसे- आराम, विराम, विश्राम, अभिराम, उपराम, ग्राम.. जो रमने के लिए विवश कर दे, वही राम है। भारतीय मन हर स्थिति में राम को साक्षी बनाने का आदी है।

दुःख में 'हे राम', पीड़ा में 'अरे राम', लज्जा में 'हाय राम', अशुभ में 'अरे राम राम', शुभ में 'राम कृपा', अभिवादन में 'राम राम' और 'सीता राम', शपथ में 'राम दुहाई', अज्ञानता में 'राम जाने', अनिश्चितता में 'राम भरोसे', प्रेम में 'राम प्यारा', सहायता के लिए 'राम सहाय', अचूकता के लिए 'रामबाण', सुशासन के लिए 'रामराज्य', सेवा के लिए 'रामसेवक', शादी के लिए 'राम मिलाए जोड़ी' और यहाँ तक कि मृत्यु के लिए 'राम नाम सत्य'.. के साथ शरीर के हर एक रोम में बसे राम हैं।

सब मिल जाने के बाद, जो साथ हैं, वे ही तो राम हैं.. सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम हैं। किसी बुजुर्ग के द्वारा सुना हुआ एक वाकया याद आता है कि भारत से श्रीलंका की ओर जाने के लिए जब श्री राम का नाम लिखकर पुल बनाया जा रहा था, तो श्री राम नाम का हर एक पत्थर पानी में डूबने के बजाए खुशी से तैर रहा था। यह बात जब रावण के कानों में पड़ी तो सुनते ही वह बौखला गया और मंदोदरी से कहने लगा कि इसमें क्या बड़ी बात है, मैं भी पानी में पत्थर तैरा सकता हूं।

उसने एक पत्थर पर रावण लिखा और ज्यों ही पानी में छोड़ा, त्यों ही वह समुद्र की गहराइयों में जा बैठा। इतने पर भी रावण ने हिम्मत नहीं हारी और एक के बाद एक सैड़कों पत्थरों पर रावण लिखकर पानी में छोड़ता गया, लेकिन मजाल है कि एक भी पत्थर पानी के ऊपर तैर जाए। थक-हार कर उसने कुछ ऐसा किया कि रावण लिखा हुआ पत्थर आखिरकार पानी में तैर गया और महल आकर बड़ी खुशी से मंदोदरी से कहा कि देखो, मेरा पत्थर भी पानी में तैर रहा है।

मंदोदरी बेहद कुशल और निपुण रानी थी। उन्हें रावण को भांपने में एक क्षण का भी समय नहीं लगा और वे पूछ बैठी कि आखिर पत्थर तैरने कैसे लगा, अब सच बताइए..

बड़े ही भारी मन से रावण ने कहा कि मेरे नाम के सैकड़ों पत्थर पानी में डूब गए। हारकर एक पत्थर पर रावण लिखकर मैंने उससे कहा, "तुझे राम की सौगंध है, जो यदि तू पानी में डूबा.. इतना कहने पर वह रावण लिखा हुआ पत्थर भी पानी में तैर गया।" उस दिन रावण को भी श्री राम नाम की महत्ता समझ में आ गई।

अरे! वह रावण भी क्या खुशकिस्मत था, जो राक्षस जाति से ताल्लुक रखने के बावजूद श्री राम के हाथों से ही नाभि पर तीर चलवा कर आखिरी बार मुंह से श्री राम कहकर वीरगति को प्राप्त हुआ, इसलिए कहा जाता है कि जीवन की आखिरी सांसों के दौरान मुख से श्री राम का नाम लेना इंसान को वीर गति की प्राप्ति कराता है।

मरणोपरांत लगभग 5-7 मिनट तक हमारा दिमाग जीवित रहता है, ऐसे में परिवार के लोगों द्वारा लिए जा रहे प्रभु के नाम को हमारा दिमाग लगातार सुनता रहता है और जीवन के अंत में भी हम श्री राम के बारे में ही सोचते हुए विदा लेते हैं। कौन जाने, कब जीवन से सांसों की डोर टूट जाए, तो क्यों न अभी ही कह लें.. जय श्री राम..

- अतुल मलिकराम

Posted By: Sandeep Chourey

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