सैंडो एक दुबला-पतला बालक था। जब वह 11-12 बरस का था तो उसे जुकाम रहने लगा, खांसी चलती रहती और लिवर भी बढ़ा हुआ था। एक दिन सैंडो अपने पिता के साथ अपने शहर में स्थित अजायबघर देखने गया। अजायबघर में उसने बलिष्ठ कद-काठी की अनेक इंसानी मूर्तियां देखीं। उसने अपने पिता से पूछा - 'पिताजी, ये किनकी मूर्तियां हैं?" पिता ने कहा - 'बेटे, इस दुनिया में हमसे पहले जो इंसान थे, ये उनकी मूर्तियां हैं।"

तब सैंडो ने अगला सवाल किया - 'तो ये जो हमारे पूर्वजों की मूर्तियां यहां रखी हुई हैं, क्या उनकी शक्लें ऐसी ही थीं?" पिता ने कहा - 'हां बेटे, ऐसी ही थीं।" 'क्या उनके हाथों की कलाइयां इतनी ही मोटी थीं?" पिता फिर बोले - 'हां बेटे, ये भी ऐसी ही थीं।" बालक का कौतूहल बढ़ता जा रहा था। उसने अगला सवाल किया - 'तो क्या हमारे बुजुर्गों की गर्दन इसी तरह मोटी थी और क्या उनकी पेशानी और सीने इतने ही चौड़े थे?" पिता बोले - 'हां बेटे। वे जैसे थे, उसी तरह उनकी मूर्तियां बनाई गई हैं।"

सैंडो ने फिर सवाल किया - 'पिताजी, क्या मैं भी ऐसा बन सकता हूं?" पिता ने उसे दुलारते हुए कहा - 'क्यों नहीं बेटे, जरूर बन सकते हो। दुनिया का एक इंसान जो काम कर सका, उसे दूसरा इंसान भी कर सकता है। जो रास्ता एक के लिए खुला है, वह दूसरे के लिए भी खुला है। समय ज्यादा लग जाए या कम, यह मैं नहीं कह सकता, लेकिन एक आदमी ने जो काम कर लिया, वह दूसरे के लिए नामुमकिन नहीं है।"

तब सैंडो ने कहा - 'अच्छा, तो क्या मैं भी ऐसा पहलवान बन सकता हूं?" पिता बोले - 'बिलकुल बन सकते हो। कोई भी व्यक्ति यदि ठीक तरह से अपनी मंजिल बना ले और सही योजना के मुताबिक उस दिशा में समर्पित भाव से जुट जाए तो वह बड़े से बड़ा कार्य कर सकता है।"

सैंडो म्यूजियम से आया और पिता से बोला - 'बताइए, मैं कैसे पहलवान बन सकता हूं?" पिता ने कहा - 'बेटा, तुम अपने खान-पान और दिनचर्या में यह नियंत्रण करो, इस तरह कसरत करो, विचारों का संयम ऐसे करो।" यह कहते हुए पिता ने एक प्रारंभिक ढांचा बनाकर उसके सामने रख दिया। बालक सैंडो ने अपनी दबी हुई सामर्थ्य को समझा और उसका ठीक प्रकार से इस्तेमाल करते हुए आगे चलकर यूरोप का ख्यात पहलवान बना।

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