अंग्रेजी आज सभी भारतीय भाषाओं को धीरे-धीरे खत्म कर रही है और उनके अस्त्तित्व के लिए ही खतरा बन गई है परंतु चाहे तमिल में ऐतिहासिक हिंदी विरोध हो या ताजातरीन गुरदास मान प्रकरण, हिंदीतर राज्यों में हिंदी को ही स्थानीय भाषाओं के लिए बड़े खतरे के रूप में प्रचारित किया जाता है। हिंदी में धड़ाधड़ अंग्रेजी के शब्द ठूंसने का रुझान भी बढ़ रहा है जिससे हिंदी के कई शब्द अप्रचलित और आम स्मृति से बाहर हो रहे हैं। इसके साथ ही शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी का बढ़ता प्रसार हिंदी और भारतीय भाषाओं को शिक्षा, शोध और रोजगार के क्षेत्र में हाशिए पर ला रहा है। हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में इन सभी मुद्दों पर स्‍वतंत्र पत्रकार प्रेरणा कुमारी ने वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय भाषाओं के संवर्धन में सक्रिय राहुल देव से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान हुई बातचीत में जो मुख्य बाते हमारे सामने आई है वह इस प्रकार से है.....

दक्षिण भारत के राज्यों और पंजाब में यदि हिंदी विरोध की बात की जाए तो तथ्य यह है कि एक तरह का हिंदी विरोध तो पूरे देश में है। हालांकि सारे वर्ग हिंदी के विरोधी नहीं हैं बल्कि एक वर्ग विशेष में ही हिंदी का विरोध देखा जाता है। विशेष रूप से दक्षिण के तमिलनाडु में हिंदी विरोध के बड़े ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण हैं। बेशक तामिलनाडु में पाया जाने वाला हिंदी का उग्र विरोध भी मात्र एक विशेष वर्ग तक सीमित है। पूरे समाज के बजाय यह विरोध राजनेताओं और एक छोटे से वर्ग विशेष तक ही सीमित है तथापि यह विरोध मौजूद है और काफी मुखर होकर हमारे सामने आता है। तमिलनाडु जैसा विरोध दक्षिण भारत के अन्य राज्यों जैसे कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में नहीं दिखता है। इस तरह दक्षिण के चार-पांच अन्य राज्यों में हिंदी की स्थिति और हिंदी के प्रति वहां का मनोविज्ञान तमिलनाडु से अलग है।

यदि विशेष रूप से तमिलनाडु की बात की जाए तो इस राज्य में हिंदी विरोध का इतिहास सौ साल से भी अधिक पुराना है। तमिलनाडु में पेरियार नाम से संबोधित किए जाने वाले ई वी रामासामी हिंदी विरोध की मुखर आवाज बने। वह मानते थे कि आर्यों ने द्रविड़ को उनके मूल स्थान और उनकी शक्ति से वंचित किया और आर्य बाहर से आए थे। ऐसे चिंतन से उन्होंने आर्य-द्रविड़ के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी और हिंदी को उत्तर और आर्यों की भाषा बताकर इसका विरोध किया। इसके अलावा इस दौरान तमिल साहित्य में भी हिंदी भाषा को औपनिवेशिक या दमनकारी भाषा के रूप में चित्रित किया गया। इस तरह पिछले 100 वर्षों से इस बात को बार-बार दोहराकर लोगों के मस्तिष्क में यह बिठाने का प्रयास किया गया कि हिंदी तमिल को खत्म कर देगी। हिंदी तमिल की दुश्मन है। हिंदी के प्रति कल्पित किया यह खतरा हालांकि निराधार था, फिर भी लगातार दोहराव के चलते कुछ लोगों को यह बात सही लगी। इस विरोध को राजनीति तक का आधार बनाया गया है। पिछले 60 वर्षों से तमिल राजनीति उत्तर भारत, उत्तर भारत की भाषा हिंदी, आर्य और ब्राह्मण विरोध पर आधारित रही है। इन सब बातों के बीच एक सत्य यह भी है कि आम जनता ने हिंदी विरोध की इस उग्रता को स्वीकार नहीं किया। उनके सैद्धांतिक आधार की खामियां साफ होने से पहले दक्षिण भारत के अन्य राज्यों ने इस मुहिम का हिस्सा बनने से इनकार किया, फिर आम जनता में भी हिंदी विरोध की उग्रता कुंद पड़ गई।

हिंदी के प्रति एक अन्य विरोध क्षेत्र-आधारित होने के बजाय वर्ग-आधारित है। अभी भारत दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक हिस्सा भारत है तो दूसरा हिस्सा इंडिया है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में अपनी पहली, दूसरी और तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी बोलने वाले लोग कुल जनसंख्या का मात्र 10 से 12% हिस्सा हैं। शेष सारा अर्थात 90% भारतीय अपनी-अपनी भाषाओं में जीता है। हिंदी क्षेत्र में हिंदी, महाराष्ट्र में मराठी, बंगाल में बंगाली और गुजरात में गुजराती, हमारा समाज अपनी भाषाओं में जीता है, सपने देखता है, काम करता है, कविता करता है और गीत लिखता है। इस तरह 10% अंग्रेजी वाला इंडिया हिंदी के विरोध में खड़ा दिखता है। 10% इंडिया को अंग्रेजी के कारण उच्चता का एहसास, ताकत और सामर्थ्य मिले हुए हैं। उनके इस उच्चता के अहसास और ताकत को हिंदी से खतरा है। हिंदी का भौगोलिक क्षेत्र भारत में चूंकि सबसे व्यापक है, ऐसे में स्वाभाविक रूप से उनका ऐसा मनोविज्ञान बन गया है कि अंग्रेजी के वर्चस्व को यदि कोई भाषा चुनौती दे सकती है तो वह भाषा हिंदी है। ऐसे में इस मनोविज्ञान के चलते वे हिंदी का विरोध करते हैं। क्षेत्र चाहे कोई भी हो, यह सीमित वर्ग ही हमें अंग्रेजी के विरोध में दिखाई देता है।

अंग्रेजी भाषा हमें अंग्रेजों से मिली और हमारे देश को गुलाम बनाने के लिए उन्होंने अपनी भाषा हम पर थोप दी। 1835 में अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम लाए जाने के 200 वर्ष बाद भी अंग्रेजी हमारे 90% भारतीयों के लिए एक औपनिवेशिक भाषा ही है। इस पूरी चर्चा में एक अन्य बात यह भी समझनी चाहिए कि स्वतंत्रता मिलने पर यह आशा थी कि भारत को भाषायी परतंत्रता से भी मुक्ति मिलेगी लेकिन सच यह है कि अंग्रेजी ने सारे तंत्र पर अपनी जड़ें मजबूती से जमा ली हैं। हमारी न्याय-व्यवस्था, प्रशासन और शिक्षा के तौर-तरीकों ने आजादी के बाद के 75 वर्षों में अंग्रेजी को मजबूत करने का ही कार्य किया है। हालात यह है कि आज यह बात आम लोगों के दिलों में बैठ गई है कि उन्हें और उनके बच्चों को यदि अंग्रेजी नहीं मिलेगी तो वे पिछड़ जाएंगे। यह बात सरासर भ्रम है, बिल्कुल भ्रांति है लेकिन लोगों के दिलों-दिमाग में सब जगह अंग्रेजी के प्रति मोह दिखता है। अंग्रेजी का यह मोह ही वस्तुतः हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं के लिए खतरा बन गया है। आज हमारी भाषाएं अस्तित्व नष्ट होने की कगार पर खड़ी हैं, हम अगर समय रहते नहीं समझे तो अंग्रेजी का यह मोह आने वाले वर्षों में इनका नामोनिशान खत्म कर देगा।

आज अंग्रेजी से दिक्कत भाषा के रूप में नहीं है। विदेशज होने के बावजूद यह उपयोगी भाषा है और इसे सीखा जाना चाहिए, लेकिन दिक्कत इसे सर्वव्यापी बनाए जाने के प्रयासों से है। दिक्कत भारतीय भाषाओं की कीमत पर अंग्रेजी सीखे जाने से है।

पत्रकारिता और आम बोलचाल की हिंदी में जबरदस्ती अंग्रेजी शब्द जोड़ना आजकल नई प्रवृत्ति बनती जा रही है। भाषाएं बेशक एक-दूसरे से शब्दों का लेन-देन करती है और परस्पर रूप से एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं, लेकिन जिस वस्तु या संकल्पना के लिए हमारे पास हिंदी का शब्द मौजूद हो, उसके लिए अंग्रेजी का शब्द लेकर हम हिंदी को समृद्ध नहीं करते बल्कि हिंदी की आम स्मृति से एक शब्द बाहर करते हैं। जबरदस्ती ठूंसे गए अंग्रेजी शब्द वस्तुतः हिंदी बोलने वालों के मानसिक दैन्य को ही प्रकट करते हैं।

नई शिक्षा नीति की बात की जाए तो नई नीति इस अर्थ में अद्वितीय एवं प्रशंसनीय है कि पहली बार शिक्षा नीति में शिक्षा की माध्यम भाषा पर भी चर्चा की गई है और इस बात पर बल दिया गया है कि कम से कम प्राथमिक कक्षाओं और अधिमानतः माध्यमिक कक्षाओं तक शिक्षा की माध्यम भाषा मातृभाषा होनी चाहिए। निश्चय ही यह ऐसी पहल है जिसके लिए वर्तमान सरकार की प्रशांसा की जानी चाहिए, हालांकि इस नीति में मातृभाषा लागू करने के लिए अनिवार्यता के स्थान पर जहां तक संभव हो शब्द का उपयोग किया गया है। इस एक शब्द से विद्यालयों को बचने का रास्ता मिल गया है। यह एक शब्द पूरी नीति को ध्वस्त करने की शक्ति रखता है और अगर इसके दुरुपयोग की आशंका से बचा नहीं गया तो फिर सारी नीति का कोई अर्थ नहीं होगा। यह पुस्तकालयों में एक दस्तावेज बन कर ही रह जाएगी। जहां तक संभव हो से निजी विद्यालय या सरकारें यह कहने के लिए स्वतंत्र हैं कि हमारे लिए यह संभव नहीं है। उनके लिए एक जबरदस्त बहाना है कि हमारे अभिभावक यही चाहते हैं। आज सरकारें तक यह मान चुकी हैं कि अगर बच्चों को पहली कक्षा से ही अंग्रेजी पढ़ाई जाए तो इसके बेहतर नतीजे होंगे।

इसके अलावा शिक्षा की प्रशासनिक व्यवस्था भी भारतीय भाषाओं के संवर्धन में बाधा बन रही है। हमारे अधिकांश राज्यों के शिक्षा मंत्री या मुख्यमंत्री तक को शिक्षा और भाषा के अंतर्संबंधों के बारे में गहन जानकारी नहीं रहती है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था में आज एक व्यक्ति शिक्षा मंत्री होता है, वर्ष भर बाद कोई दूसरा व्यक्ति इस पद पर बैठ जाता है और फिर कोई तीसरा, यह सिलसिला चलता रहता है। ऐसे में नीतियों में और समझ में स्थिरता और एकरूपता विकसित नहीं हो पाती है। इसके अलावा चाहे हमारे शिक्षा सचिव हो या मंत्री हो, वे भी देश के उसी शक्तिशाली वर्ग के प्रतिनिधि हैं जो मातृभाषाओं के बजाय अंग्रेजी से लगाव रखते हैं।

यहां देखें बातचीत का पूरा वीडियो

Posted By: Navodit Saktawat

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