रमेश शर्मा

भारत में परतंत्रता और परतंत्रता से मुक्ति के लिये होने वाला स्वाधीनता का संघर्ष दोनों संसार के इतिहास से बहुत अलग हैं। परतंत्रता के अंधकार की इतनी लंबी अवधि और क्रूरता का इतना तीखा दंश जितना भारत ने झेला है उतना संसार के किसी देश ने नहीं झेला। शीश काटकर कर उनका पर्वत खड़ा करना हमलावरों में स्पर्धा थी। सामूहिक दमन कितनी क्रूरता से भरा होगा इसका अनुमान भारत में हुये नारियों के जौहर और पुरुषों के साके से ही लगाया जा सकता है। सामूहिक नरसंहार और दमन केवल तुगलकों, खिलजियों, मुगलों और गजनी के आक्राताओं द्वारा ही नहीं किये अंग्रेजी काल में भी सामूहिक नर संहार हुये हैं, दमन हुआ सामूहिक लूट हुईं हैं। गाँव के गाँव जलाये गये हैं। यदि हम केवल 1857 की क्रांति के दमन के समय हुये अंग्रेजी अत्याचारों की बात करें तो कानपुर, मेरठ, लखनऊ, दिल्ली झाँसी, काल्पी, नागपुर आदि दर्जनों स्थानों पर सामूहिक नरसंहार हुये।

भोपाल के समीप गढ़ी अंबापानी में तो सामूहिक नर संहार के बाद सेना को पूरे क्षेत्र में सामूहिक लूट और दमन का आदेश दे दिया गया था। यह ऐसी घटनाओं की प्रतिक्रिया ही थी कि देश एक साथ उठ खड़ा हुआ और भारत राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम में जुट गया। यह समाज के हर वर्ग, हर समूह एवं हर क्षेत्र का व्यक्ति अपने राष्ट्र गौरव की पुनर्स्थापना के लिये आगे आया। यह राष्ट्र स्वाभिमान दमन के अतिरेक की ही प्रतिक्रिया था कि समाज का वह समूह जिसे अंग्रेजों ने भारत राष्ट्र की जड़ों से काटकर अपनी अंग्रेजियत में ढालने का प्रयास किया था उनमें भी भारी प्रतिक्रिया हुई और वे अपने व्यक्तिगत भविष्य के सुनहरे सपनों का त्याग करके राष्ट्र सेवा के लिये खुलकर मैदान में आ गये । भारत चिकित्सक वर्ग को इसी श्रेणी में माना जाना चाहिए।

आज सैकड़ों सुविधाएँ हैं फिर भी मेडिकल की पढ़ाई कितनी कठिन है। तब आज से सौ, सवा सौ और डेढ़ सौ वर्ष पुराने समय की चिकित्सीय शिक्षा की कल्पना की जा सकती है। फिर भी मेडिकल की डिग्री पूरी करने के बाद भी पूरा जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित करने के उदाहरण केवल भारत में मिलते हैं।यूँ तो भारत में चिकित्सीय ज्ञान विश्व का सबसे प्राचीन है। संसार की आधुनिकतम चिकित्सा पद्धतियों की नानी माँ भारतीय चिकित्सा पद्धति है फिर भी भारत में आधुनिक चिकित्सा का पहला महाविद्यालय "कलकत्ता मेडिकल कालेज" की स्थापना 1935 में हुई । इस मेडिकल कालेज की स्थापना के पीछे अंग्रेजों की मंशा भारतीय जनों का कोई रोग निवारण नहीं था।

वे भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान परंपरा को समाप्त करना चाहते थे। इसलिये इस नये मेडिकल कालेज का शीर्ष नियंत्रण चर्च के हाथ में था। इसमें प्रतिदिन एक "प्रेयर" ब्रिटिश शासन के प्रति समर्पण की भी होती थी। इस मेडिकल कालेज में प्रवेश के लिये भी परिवारों की पृष्ठभूमि देखी जाती थी। फिर भी इस मेडिकल कालेज के चौथे बैच से भारत राष्ट्र के स्वाभिमान की सुगबुगाहट होने लगी थी। लेकिन 1857 की क्रांति के बाद तो मानों आंतरिक भावों को पंख लगे । और खुलकर भारत राष्ट्र की स्वतंत्रता की बात होने लगी। यूँ तो 1857 से लेकर 1947 तक भारत में चिकित्सीय संसार से संबंधित सहस्रों स्वतंत्रता सेनानियों का वर्णन मिलता है। जो भारतीय पद्धति के चिकित्सक थे, उनकी गणना तो असंख्य है।

पर इस आधुनिक चिकित्सा पद्धति से एम बी बी एस, एम डी या इससे भी बड़ी विशेषज्ञ डिग्री लेकर "डाक्टर" बनकर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ने के उदाहरण भी शताधिक हैं । इनका उल्लेख संघर्ष की प्रत्येक दिशा में मिलता है । अहिंसक आदोलन में, क्रांतिकारी आंदोलन में, आजाद हिन्द फौज में, स्वदेशी के प्रचार में और भारत राष्ट्र के भविष्य को ध्यान में रखकर व्यक्ति निर्माण, समाज निर्माण और राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर पहुँचाने का महा अभियान आरंभ करने में भी । यदि हम स्वाधीनता संघर्ष की इन विभिन्न धाराओं के लिये अपना जीवन समर्पित करने वाले एक चिकित्सकों के नाम की चर्चा करें तो हम देखेंगे कि इन सब ने अपने अपने क्षेत्र में इतिहास बनाया है ।

स्वदेशी के लिये समर्पित डाक्टर सुन्दर राव ठाकरे

भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के आख्यानों का अध्ययन करें तो हमें एक विसंगति मिलती है । वह यह कि जिन भी विभूतियों के चिंतन में अपने संघर्ष में भारत राष्ट्र के सांस्कृतिक गौरव को प्राथमिकता दी उनका उल्लेख न के बराबर ही मिलता है। कुछ तो अपरिचय के महासागर में खो गये। ऐसे एक महान राष्ट्रसेवी हैं डाक्टर सुन्दर राव ठाकरे जिन्होंने अहमदाबाद मेडिकल कॉलेज से मेडिकल डिग्री ली और पूरा जीवन स्वदेशी प्रचार में समर्पित कर दिया । वे किशोर वय से स्वदेशी आंदोलन में जुड़े और पूरा जीवन उसी के लिये समर्पित रहे । उन्होंने 1906 में स्वदेशी आंदोलन चलाया जब गाँधी जी पदार्पण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नहीं हुआ था ।

अपना जीवन स्वदेशी के लिये समर्पित करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का जन्म 1892 में गुजरात के महसाणा जिले के अंतर्गत लक्ष्मीपुर कस्बे में हुआ था । यद्धपि उनका परिवार कोंकण के पालीगाँव का रहने वाला था । पिता श्रीपाद ठाकरे मेहसाणा आये । यहीं इन्होंने विवाह किया और यहीं बस गये। उनके दो पुत्र हुये। बड़े विनायक राव और छोटे सुन्दर राव । आरंभिक शिक्षा मेहसाणा में हुई और मेडिकल की पढ़ाई के लिये अहमदाबाद चले गये । भारत में स्वदेशी आंदोलन 1905 में आरंभ हुआ था । यद्यपि इसके सूत्र अमर गीत वंदेमातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1886 में दिये थे। किन्तु इसका विस्तार 1905 में हुआ। तब अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक आधार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये बंगाल का विभाजन घोषित कर दिया था। बंगाल विभाजन का विरोध हुआ और स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा जो 1911 तक चला।

डाक्टर सुन्दर राव ठाकरे तब किशोर वय में थे और मेहसाणा रहकर विद्यालयीन पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने उन्होंने अप्रैल 1906 में विद्यार्थियों को एकत्र किया और विदेशी वस्त्रों की होली चलाई और स्वदेशी वस्तुएं ही उपयोग करने की शपथ ली। पुलिस ने लाठी चार्ज करके तितर वितर किया । मेडिकल की पढ़ाई करने वे अहमदाबाद के मेडिकल कालेज के छात्र बने। पर पढ़ाई के दौरान भी उनका स्वदेशी अभियान जारी रहा । पढ़ाई पूरी करने वे काँग्रेस के संपर्क में आये उन्हें गाँधीजी का चरखा और खादी अभियान पसंद आया । उन्होंने भी आजीवन खादी पहनने का संकल्प ले लिया । उनकी पहली गिरफ्तारी 1921 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के दौरान पूना में हुई । यह गिरफ्तारी डाक्टर की डिग्री मिलने बाद हुई ।

लेकिन स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ खिलाफत आंदोलन को जोड़ना डाक्टर सुन्दर राव को पसंद न आया। उनका मानना था कि खलीफा पद्धति किसी पंथ विशेष की निजी है और उसका भारत से कोई लेना देना नहीं है । इसीबीच मालाबार में भयानक मारकाट हो गयी। उन्हें 1926 में स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या पर गाँधी जी की प्रतिक्रिया पसंद न आई और वे काँग्रेस से अलग होगा। पर स्वदेशी और खादी के संकल्प के लिये जीवन भर समर्पित रहे। वे पहले कर्नाटक जाकर अस्पताल में नौकरी करने लगे और फिर मेहसाणा की अपनी समस्त संपत्ति भाई विनायक राव और उनके परिवार को सौंपकर मध्य प्रदेश के धार आकर बस गये। धार उनकी पत्नि शाँताबाई दिघे का मायका था। यहाँ उन्होने अपना चिकित्सालय खोला और समाज सेवा में जुट गये। सुप्रसिद्ध राजनेता कुशाभाऊ ठाकरे इन्ही के पुत्र थे।

डाक्टर केशव हेडगेवार : राष्ट्रसेवा के लिये लाखों सेनानी तैयार करने वाले अद्भुत शिल्पी

डाक्टर केशव हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ। माता रेवती बाई और पिता बलिराम पंत हेडगेवार थे । परिवार की पृष्टभूमि राष्ट्र और संस्कृति के मान विन्दुओं के प्रति समर्पण की रही इसलिये बचपन से उनके मन में भारत की दासता को मुक्त करने का भाव था । बालक केशव का हृदय के लिये कितना समर्पित था इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनकी शाला नील सिटी हाई स्कूल में अंग्रेज अधिकारी निरीक्षण को आया तो वंदेमातरम के उदघोष से स्वागत किया था । इसलिये उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया । तब आगे पढ़ाई के लिये उन्हें यवतमाल और पुणे जाना पड़ा । उनका जीवन बचपन से एक प्रकार से आत्मनिर्भर रहा । जब वे मात्र बारह वर्ष के थे तब उनके माता पिता की मृत्यु महामारी में हो गई थी । उनके चाचा ने आगे की शिक्षा का दायित्व संभाला ।

विद्यालयीन पढ़ाई पूरी करने बाद वे मेडिकल की पढ़ाई करने कलकत्ता गये । जून 1916 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एलएमएस परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद, उन्होंने एक वर्ष की अप्रेंटिसशिप पूरी की और 1917 में एक चिकित्सक के रूप में नागपुर लौट आए । पढ़ाई के दौरान वे बंगाल में युवकों के बीच स्वाभिमान संचार करने वाली अनुशीलन समिति से जुड़ गये और राष्ट्र जागरण की गतिविधियों में सक्रिय रहे । गीत वंदेमातरम उन्होंने सुना हुआ था । पढ़ाई के साथ उन्होंने बंकिम बाबू के अन्य साहित्य का भी अध्ययन किया ।

नागपुर लौटकर वे काँग्रेस से जुड़कर स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय हो गये । किन्तु उनका सोच व्यापक था । उनके भाषणों में लोकमान्य तिलक, सावरकर जी, आर्य समाज आदि का उल्लेख होता था । काँग्रेस में डाक्टर हेडगेवार पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा जो पारित न हो सका । गाँधी जी के आव्हान पर 1921 के असहयोग आंदोलन में जेल गये । काँग्रेस में यह उनकी लोकप्रियता ही थी कि जब फरवरी 1922 में रिहा हुये तब पं मोतीलाल नेहरू उनके स्वागत के लिये आये। किन्तु काँग्रेस द्वारा असहयोग आंदोलन में खिलाफत आंदोलन को जोड़ने की उन्होंने खुलकर आलोचना की और काँग्रेस नेताओं से उनके मतभेद बढ़ गये।

1922 से 1925 के बीच देश के अनेक स्थानों पर संगठित हिन्सा हुई। मालाबार की भांति देश के अन्य भागों में भी हिंसा का एक ही रूप था । असंगठित समाज पर गिरोहबंध हमले और लूट। अंग्रेजों की पुलिस समाज की रक्षा ही न कर पा रही थी । तभी उनके मन में युवाओं में संस्कार, संगठन और राष्ट्रभाव की जाग्रति के लिये संगठन बनाने का विचार उठा और 27 सितंबर 1925 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन किया । संघ की स्थापना सामाजिक, राष्ट्रीय और सामाजिक मूल्यों की स्थापना और रक्षा के लिए हुई थी । आज अंतराष्ट्रीय स्वरूप लेकर भी संघ अपने मूल्य सिद्धांत पर अडिग है ।

डाक्टर जी ने संघ की स्थापना अवश्य की पर उन्होंने काँग्रेस से नाता न तोड़ा। वे 1921 के आंदोलन में भी जेल गये । यद्यपि संघ सीधे अपने नाम से आंदोलन में नहीं था पर संघ के स्वयं सेवक बढ़ चढ़कर आंदोलनों में हिस्सा लेते थे । 1931 से लेकर 1942 के विभिन्न आँदोलनों में संघ के स्वयं सेवकों ने हिस्सा लिया । 1942 के आंदोलन में अंग्रेजी पुलिस के गोली चालन में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के महाकौशल बड़ी संख्या में संघ के स्वयं सेवक बलिदान हुये ।

डॉक्टर बनते ही हेडगेवार जी को ब्रह्मदेश से नोकरी आमंत्रण मिल गया। पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया और राष्ट्र सेवा में जुट गये और आजीवन उसी कार्य में लगे रहे । न रुके न थके और न झुके । अंततः 51 वर्ष की आयु में 21 जून 1940 को इस संसार से विदा हुये । विदा उनका शरीर हुआ लेकिन से आज लाखों-लाख राष्ट्र सेवियों के हृदय में निवास करते हैं ।

डा विधान चंद्र राय : डाक्टरी के साथ स्वतंत्रता संग्राम

डाक्टर विधान चंद्र राय की गणना बंगाल के अग्रणी स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में होती है । बे बंगाल के पहले मुख्यमंत्री थे । उनका नाम चिकित्सीय दुनियाँ बहुत आदर से लिया जाता है और उनकी जन्मतिथि 1 जुलाई को ही भारत में "डाक्टर्स डे" के रूप में मनाया जाता है । वे गाँधी जी के अनुयायी बने और अहिंसक आंदोलन से जुड़े ।

उनका जन्म 1 जुलाई 1882 को खजांचीरोड बांकीपुर, पटना, बिहार में बंगाली परिवार में हुआ था । उस समय बंगाल बिहार और उड़ीसा एक ही प्रांत हुआ करता था । परिवार ब्रह्मसमाजी था । पिता प्रकाशचंद्र राय डिप्टी मजिस्ट्रेट थे, उनकी आरंभिक शिक्षा पटना में हुई और बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण कर वे १९०१ में कलकत्ता आये । यहाँ से एम. डी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें अपने अध्ययन का व्यय भार स्वयं वहन करते थे । छात्रवृत्ति के अतिरिक्त अस्पताल में नर्स कार्य करके वे अपना निर्वाह करते थे । मेधावी इतने कि एल.एम.पी. के बाद एम.डी. परीक्षा दो वर्षों की अल्पावधि में उत्तीर्ण कर कीर्तिमान स्थापित किया। फिर उच्च अध्ययन के निमित्त इंग्लैंड गए । छात्र जीवन में वे अनुशीलन समिति के संपर्क में आ गये थे । यह समिति बंगाल के युवाओं में स्वाभिमान जागरण का काम कर रही थी । इस कारण उनका आवेदनपत्र अस्वीकृत हो गया था । बड़ी कठिनाई से प्रवेश पा सके। दो वर्षों में एम. आर. सी. पी. तथा एफ. आर. सी. एस. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं ।

स्वदेश लौटकर डाक्टर विधान चंद्र राय ने सियालदह में अपना निजी चिकित्सालय खोला । और स्वाराज्य पार्टी से जुड़ गये । यहाँ से उनकी राजनैतिक और सामाजिक यात्रा आरंभ होती है । वे देशबंधु चित्तरंजन दास के प्रमुख सहायक बने और १९२८ में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन की स्वागत समिति के वे महामंत्री बने । और सक्रिय आदोलनों में हिस्सा लेने लगे।

उन्होंने 1931 के असहयोग आंदोलन और 1942 के "अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन" आंदोलन में हिस्सा लिया और गिरफ्तारी हुई । उन्हें स्वतंत्रता के तुन्तीबाद उत्तर प्रदेश में राज्यपाल पद का प्रस्ताव आया जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया । 1948 में वे बंगाल के मुख्यमंत्री बने और 1 जुलाई 1962 में अपने निधन तक वो इस पद पर बने रहे ।वे जो भी आय अर्जित करते थे वह सब दान कर दिया करते थे। उनकी इसी निस्वार्थ श्रद्धांजलि देने के लिए 1 जुलाई को उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि को नेशनल डॉक्टर्स डे के रूप में मनाया जाता है ।

डाक्टर लक्ष्मी सहगल : आजाद हिन्द फौज में महिला ब्रिगेड बनाई

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चौथी धारा आजाद हिन्द फौज की है। यहाँ भी एक अद्भुत डाक्टर का नाम उल्लेखनीय है। जिन्होंने रानी लक्ष्मी बाई ब्रिगेड बनाई। और अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिये पाँच सौ महिलाओं को भर्ती किया । इनमें अधिकांश महिलाओ ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

उनका जन्म 24 अक्टूबर 1914 को तमिलनाडू के एक परंपरागत परिवार में हुआ। उन्होंने बचपन से अंग्रेज सैनिकों और अफसरों द्वारा भारतीयों का शोषण देखा इससे स्वाधीनता के लिये कुछ करने का भाव मन में जागा। बचपन से छोटी बड़ी सामाजिक गतिविधियों में लेते हुये मद्रास मेडिकल कालेज से डाक्टर की उपाधि प्राप्त की और सिंगापुर चलीं गईं। सिंगापुर में 2 जुलाई 1943 को उनकी भेंट नेताजी सुभाषचंद्र बोस से हुई । डॉ. लक्ष्‍मी उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुईं और एक घंटे की भेंट के बाद ही वे आजाद हिन्द फौजसे जुड़ गईं । और आजाद हिन्द फौज में 'रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट' अस्तित्व में आ गई।

22 अक्तूबर, 1943 में डॉ. लक्ष्मी इस रेजिमेंट में 'कैप्टन' बनीं । फिर उन्हें 'कर्नल' का पद भी मिला। जो एशिया में किसी महिला को पहली बार मिला था । नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जब आजाद हिन्द सरकार बनाई तो उसमें डॉ. लक्ष्मी पहली महिला केबिनेट सदस्य बनीं । द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद वे बंदी बना लीं गईं । 1947 में भारत की स्वतंत्रता की तैयारी के बीच ही वे रिहा हो गयीं । 1947 में विवाह करके वे कानपुर आ गईं और जीवन भर कानपुर में रहीं । 23 जुलाई 2012 को 98 वर्ष की आयु में उन्होंने संसार से विदा ली।

क्रांतिकारी सुनीति चौधरी : जेल से लौटकर डाक्टर बनीं

स्वाधीनता आंदोलन में डाक्टर की डिग्री लेकर राष्ट्र और समाज के लिये अपना जीवन समर्पित कर देने के उदाहरण तो अनेक हैं पर क्रांतिकारी आंदोलन में एक नाम ऐसा भी है जिन्हे पहले काला पानी का कारावास मिला फिर वे देश की प्रख्यात डाक्टर बनीं । यह नाम है डाक्टर सुनीति चौधरी का। उनका जन्म 22 मई 1917 को हुआ । वे अभी स्कूल की विद्यार्थी थीं कि उन्होंने मात्र 14 वर्ष की आयु में अपनी साथी शाँति घोष के साथ मिलकर २४ दिसम्बर १९३१ को मजिस्ट्रेट बी जी स्टीवेंसन उनके कार्यालय में घुसकर गोली मारी।

दोनों बालिकाओं ने मिलने की अनुमति मांगी और कमरे में पंहुचते ही गोली चला दी। निशाना अचूक था, स्टीवेंसन वहीं मर गया। दोनों वीर बालाएं गिरफ्तार कर ली गयीं । २७ फ़रवरी १९३२ को उन्हें आजीवन कारावास की सजा घोषित कर कालापानी भेज दिया गया । इधर पुलिस ने परिवार पर अत्याचार किये जिसमें एक भाई की मौत हुई।

परिवार विवरण गया । अंततः 6 दिसंबर,1939 को द्वितीय विश्व-युद्ध के पहले आम माफ़ी की वार्ता के अंतर्गत वे रिहा हुईं । तब सुनीति 22 वर्ष की हो गई थीं । जेल से रिहा होकर उन्होंने पहले अपनी आजीविका के कयी काम आरंभ किये और जोरशोर से पढ़ाई आरंभ की । बंगाल के आशुतोष कॉलेज से प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और 1944 में मेडिसिन एंड सर्जरी में डिग्री के लिए कैम्पबेल मेडिकल स्कूल में प्रवेश लिया।

डाक्टरी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद क्रांतिकारी प्रद्योत कुमार घोष से विवाह कर लिया। विवाह के बाद चंदननगर बस गयीं और शीघ्र ही ख्याति प्रतिष्ठित डॉक्टर के रूप में हो गई । स्वतंत्रता के बाद डॉ. सुनीति घोष को कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों राजनैतिक दलों की ओर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया पर उनकी रुचि राजनीति में नहीं थी वे पूरी तरह समाज की सेवा को समय देना चाहतीं थीं । और 12 जनवरी, 1988 को 71 वर्ष की आयु इस क्रांतिकारी महिला ने संसार से विदा ले ली ।

Posted By: Navodit Saktawat

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