-रमण महर्षि

युद्धों में लगने वाली विपुल संपदा को यदि सिंचाई, स्वास्थ्य एवं शिक्षा व्यवस्था जैसे कामों में लगाया जा सके तो दुनिया में कितनी खुशहाली आ जाए, कितनी निश्चिंतता हो जाए? अगर युद्ध के सिद्धांत को मन में से निकाल दिया जाए और न्याय के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो आदमी भय और आशंका से सहज ही छुटकारा पा सकता है।

व्यक्तिगत जीवन की तरह ही हम यह देखते हैं कि इस दुनिया को सुंदर और समुन्न्त बनाने के लिए क्या किया जाए? इसके लिए यूं तो असंख्य योजनाएं बनती हैं, जिसमें भौतिक सुविधाओं के संवर्द्धन का ध्यान रखा जाता है। यदि इन अनेक योजनाओं को बनाने के साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखा जा सके कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की परंपराओं में समता के सिद्धांत, एकता के सिद्धांत, शुचिता के सिद्धांतों को समाविष्ट करें, तब फिर दुनिया में कोई कमी नहीं रह सकेगी। फिर जितने साधन आज हैं, उसी से बड़े मजे में हम गुजारा कर सकेंगे। संसार में अगर एकता की दिशा में हम चलने लगें तो न जाने कितनी प्रसन्न्तादायक परिस्थितियां पैदा हो जाएं। अगर दुनिया की भाषा एक हो जाए, अपनी-अपनी अलग भाषाओं के लिए लड़ाई-झगड़ा करना हम लोग बंद कर दें, तब फिर एक भाषा से ज्ञान की वृद्धि में कितनी सहायता मिल सकती है।

मनुष्य के इर्द-गिर्द समस्याएं उतनी नहीं हैं, जितनी वह स्वयं ओढ़ लेता है। वह उन्मुक्तता और आनंद को अपना व्यवहार बनाने के बजाय भय और आशंका को अपना लेता है। ऐसे में पहले तो इन नकारात्मकताओं के कारण उसका मूल स्वभाव (आत्मिक आनंद) पिघलकर नष्ट होने लगता है और उस पर समस्याओं, दिक्कतों का आवरण चढ़ने लगता है। मानव को सदैव ये प्रयास करते रहना चाहिए कि वह सहजता-सरलता का अभ्यस्त हो।