मनुष्य के जीवन में रूपांतरण की प्रक्रिया को समझने और उनका अनुपालन करने के बाद अनेक समस्याओं का समाधान स्वत: हो जाता है। विचारकों का मानना है कि क्रोध की ऊर्जा को रूपांतरित कर मनुष्य खुद में करुणा का भाव पैदा कर सकता है। वासना भी संयम में परिवर्तित हो सकती है। व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर सकता है। व्यक्ति अपने सद्प्रयासों से दुष्प्रवृत्ति को श्रेष्ठ आचरण में बदल सकता है।

इस दुनिया में जो ज्ञानीजन हैं, वे दु:ख में सुख देख लेते हैं, गम में भी खुशी तलाश लेते हैं और अपने सद्प्रयासों के सहारे पतझड़ में मधुमास पा लेते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम कठिन परिस्थितियों में भी आनंदमय जीवन जीने का तरीका ढूंढें। हमारी उत्पत्ति ही आनंद से हुई है। आज के इस दौड़-धूप भरे जीवन में परमात्मा से यही प्रार्थना करें कि हे प्रभु, अपने कानों से हम हमेशा अच्छा सुनें और अपनी आंखों से अच्छा देखें। मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है। यह शरीर भी प्रभु कृपा से ही मिलता है।

कोई कितना भी ज्ञानी क्यों न हो, बड़े से बड़ा ध्यानी क्यों न हो, मेरा मानना है कि हर एक को प्रभु की शरणागति स्वीकार करनी ही पड़ती है। संयम साधने के लिए, चिंतन-मनन करने के लिए और प्रज्ञाबुद्धि को स्थितप्रज्ञ बनाने के लिए उस परमात्मा की कृपा की आवश्यकता पड़ती ही है। इंद्रियों को और अपने मन-बुद्धि को वश में करने के लिए भी प्रभु की कृपा नितांत आवश्यक है। इससे बड़े से बड़ा दु:ख भी कम लगने लगता है। व्यर्थ के विवाद-प्रतिवाद को आपसी प्रेम में, भाईचारे में रूपांतरित करने का प्रयास करें। दूसरों के दोष, दुर्गुणों को भी प्रसन्न्तापूर्वक देखें और सहन करें, तो हम कई बड़ी कठिनाइयों से बच जाते हैं।

अपने संकल्प बल को जाग्रत कर प्रभु की कृपा और करुणा से हम पापकर्मों से छुटकारा पा सकते हैं। बस, बात परिवर्तन की है, रूपांतरण की है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है कि विषय-भोग रूपी घी से कभी भी कामनाओं की अग्नि नहीं बुझेगी। यदि हम स्वयं में थोड़ा परिवर्तन कर सकें और प्रभु की भक्ति में अपने मन को लगा सकें तो ये सारी कामनाएं स्वत: जलकर भस्म हो जाएंगी।

-महर्षि ओम

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