प्रेरणा कुमारी: अकसर ऐसा कहा जाता है कि मीडिया में खबरों में तथ्य बताने के बजाय इन्हें विशेष दृष्टिकोण से दिखाया जाता है या खबरों से जोड़-तोड़ की जाती है, इस पर आपका क्या कहना है?

अनिल सौमित्र : ऐसा आज से नहीं हो रहा है। देश, काल एवं परिस्थिति के अनुसार खबरों में परिवर्तन और खबरों एवं तथ्यों में विचारों या संदेश के घालमेल जिसे हम जोड़-तोड़ कहते हैं, वह आज से नहीं आजादी से पहले से होता रहा है। उस समय समाचार कम होते थे, विचार ज्यादा होते थे। बाद में विचार और समाचार दोनों को अलग करने की कोशिश की गई। इस जोड़-तोड़ या समाचार से दृष्टिकोण झलकने की बात करें तो प्रत्येक व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है। इस दृष्टिकोण का विचारों में प्रकट होना उचित है, लेकिन यदि समाचार इस तरह प्रस्तुत की जाए कि संबंधित व्यक्ति का विचार, उसका दृष्टिकोण या उसका एजेंडा समाचार में परिलक्षित हो अथवा संदेश या जानकारी को किसी आग्रह-पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर प्रस्तुत किया जाए तो ऐसा जोड़-तोड़ समाज, पाठक-दर्शक या श्रोता वर्ग किसी के भी हित में नहीं है। इसलिए समाचारों में यदि समाचार वाहक के पूर्वाग्रहों, आग्रहों या विचारों से प्रेरित होकर किसी तरह की जोड़-तोड़ या विषयांतर या तथ्यात्मक फेरबदल होते हैं तो यह समाचारों में दोष या विसंगति के कारण बनते हैं। ऐसा होना लोकहित में नहीं है। इसलिए पत्रकारिता के शिक्षक और संस्थान यह आग्रह करते हैं कि समाचारों में ऐसी जोड़-तोड़ नहीं होनी चाहिए। समाचार में तथ्यों को बिल्कुल भी तोड़ा मरोड़ा नहीं होना चाहिए। तथ्य और जानकारी संवाददाता या संपादक के विचारों को एक तरफ रखकर किसी स्रोत के माध्यम से शामिल किए जाने चाहिए। समाचारों में विचार शामिल किए जाने पर, समाचार विषयनिष्ठ बन जाते हैं हालांकि इन्हें वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। साथ ही इनमें संदर्भ भी बताया जाना चाहिए। इसलिए मीडिया में काम करने वाले सभी लोगों को इन सभी विषयों पर ध्यान देना चाहिए। उन्हें समाचारों में तथ्यपरक एवं वस्तुनिष्ठ होना चाहिए और अपनी तरफ से कोई बात नहीं जोड़नी चाहिए। विचार और समाचार दोनों को अलग-अलग रखना ही इसका हल है। विचारों की अभिव्यक्ति इनके लिए विशेष रूप से चिह्नित कॉलमों या कार्यक्रमों से ही होनी चाहिए।

प्रेरणा कुमारी : खबरों के लिए सोशल मीडिया के बढ़ते प्रचलन से संपादकीय संस्था धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है। ऐसे में मीडिया के विश्वसनीयता संकट को आप कैसे देखते हैं?

अनिल सौमित्र : ऐसा समझें कि खबरें दो तरह की हैं, एक मनोरंजन प्रधान और दूसरी गंभीर विमर्श से संबंधित खबरें। मनोरंजन प्रधान खबरों में विश्वसनीयता बड़ा विषय नहीं हैं लेकिन राजनीतिक, आर्थिक या वैश्विक घटनाक्रमों से संबंधित खबरों में विश्वसनीयता का बड़ा संकट दिख रहा है। इस संकट से जूझने के लिए दो-तीन उपाय हैं। इनमें से सबसे पहले मीडिया की जिम्मेदारी है। मीडिया में माध्यम और स्रोत दोनों की विश्वसनीयता अति आवश्यक है। माध्यम और स्रोत की शुचिता से मात्र पाठकों या श्रोताओं पर ही नहीं बल्कि हमारी समग्र सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दूसरा उपाय संपादन व्यवस्था का है। मजबूत संपादन व्यवस्था होने से रिपोर्टर को पता रहता है कि उसके ऊपर भी एक व्यवस्था है। साथ ही स्रोत के माध्यम से जानकारी, आंकड़े या तथ्य आदि दिए जाने पर उसका उल्लेख करने से मीडिया समूह की विश्वसनीयता बढ़ती है।समाचार जगत से जुड़े हम सभी लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए। संपादक संस्थान समाचार-सूचनाओं की पूरी व्यवस्था में धर्म की तरह है। यदि संपादक व्यवस्था कमजोर होती है तो समाचार का क्षेत्र अराजक हो जाएगा और यह अराजकता किसी के लिए लाभदायक नहीं है। जहां तक डिजिटल मीडिया का प्लेटफार्म है, उस पर खबरों को दो तरह के माध्यम हैं। एक तो स्थापित समाचार समूहों या प्रतिष्ठित सकारी एजेंसियों एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के डिजिटल प्लेटफार्म हैं, दूसरे कमोबेश कम ज्ञात समूहों या व्यक्तिगत रूप से भी खबरें देने वाले प्लेटफॉर्म हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि पाठक-दर्शक-श्रोता किन खबरों पर भरोसा करते हैं। डिजिटल मीडिया में भी लोग उन्हीं खबरों पर भरोसा करते हैं जिन्हें किसी स्थापित एजेंसी, समाचार समूह या सरकारी एजेंसी द्वारा प्रसारित किया जाता है। यदि अब लोग कमोबेस संदिग्ध स्रोतों द्वारा प्रसारित जानकारी पर भी भरोसा करने लगे हैं या उसे शेयर आदि करने लगे हैं तो यह चिंताजनक विषय है। समाचार समूहों के लिए भी यह जरूरी है कि वे भविष्य में नए उभरने वाले प्रत्येक प्लेटफार्म में संपादक तत्व की प्रधानता को अनिवार्य रूप से शामिल करें।

प्रेरणा कुमारी : डिजिटल मीडिया की बढ़ती पहुंच के चलते मीडिया की ताकत अखबारों - समाचार चैनलों के बजाय वैश्विक डिजिटल कंपनियों के हाथों में सिमट रही है, आप इसे कैसे देखते हैं?

अनिल सौमित्र : स्वामित्व को लेकर चर्चा काफी समय से चल रही है। आज हमारे प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सभी की डिजिटल डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। हमारे सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने हालांकि काफी तरक्की की है और उसमें तेजी से विकास भी हो रहा है, फिर भी अभी हम इस मामले में पश्चिमी और यूरोपीय देशों से पीछे हैं। इस तरह से आज हमारे देश में सर्च इंजन जैसे एग्रीगेटरों या वीडियो सामग्री दिखाने वाली यू ट्यूब जैसी वेबसाइट्स आदि करीब-करीब दूसरे देशों का एकाधिकार है। भारत में इस क्षेत्र में भी आत्म-निर्भरता हासिल करने के प्रयास चल रहे हैं। भविष्य में हम देखेंगे कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों और समाचार एग्रीगेटर इत्यादि के मामले में भी हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे और इनके कई संकेत अभी से मिल रहे हैं।

प्रेरणा कुमारी : वैश्विक डिजिटल कंपनियों और मीडिया समूहों की ताकत में संतुलन लाने के लिए ऑस्ट्रेलिया ने “द न्यूज़ मीडिया बारगेनिंग कोड” कानून पारित किया है। क्या भारत में भी ऐसे कानून की जरूरत है?

अनिल सौमित्र : ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका में बनाए गए ऐसे कानूनों में देशकाल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन किए जाते हैं। हमें भारत की अपनी परिस्थितियों और वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार कुछ दृष्टि से कानून बनाने की जरूरत है। फेसबुक-ट्विटर जैसी कंपनियों के पास भारत की दृष्टि से विभिन्न संवेदनशील सूचनाएं उपलब्ध रहती हैं लेकिन पहले उस पर भारत सरकार कोई सुस्पष्ट कानून या नियम नहीं था। अब इस समस्या का निदान हुआ है। कोई भी कंपनी जब किसी देश में व्यवसाय करती है तो उसे संबंधित देश के कानून और विधि का भी पालन करना पड़ता है। भारत को भी अपनी जरूरतों के अनुसार कानूनी प्रावधान निर्धारित करने चाहिए। तेज़ी से बदलती परिस्थितियों के चलते पुराने कानून आज अधिक प्रभावी नहीं होंगे।

प्रेरणा कुमारी : पेड न्यूज़ के पीछे होने वाले लेनदेन और इसमें छिपे कदाचार अदालत में साबित करना बेहद मुश्किल है। ऐसे में पेड न्यूज का क्या हल है?

अनिल सौमित्र : पेड न्यूज में बेहद मुश्क्लि और जटिल मामला है । कौन सी खबर पेड न्यूज़ है, इसे तय करना आसान नहीं है। आजकल एडवर्टोरियल का चलन बढ़ रहा है जिसमें संपादकीय विषय और विज्ञापन के विषय अर्थात विज्ञापन और संपादकीय दोनों को एक साथ मिलाने की बात कही जा रही है। ऐस में किसी खबर से आर्थिक लाभ लिया गया है और किस जानकारी को जनसंपर्क करते हुए समाचार में शामिल किया गया है, इसे कानून के दायरे में स्थापित करना बेहद जटिल और चुनौती पूर्ण काम है। मेरा मानना है कि इसमें मीडिया समूहों को स्व-नियमन अपनाना चाहिए। समाचारों की दुनिया में भारत के मूल्यों और संपादक तत्व को शामिल करने से इस समस्या का समाधान हो सकता है।

प्रेरणा कुमारी : नई शिक्षा नीति से मीडिया शिक्षण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

अनिल सौमित्र : शिक्षा के अन्य क्षेत्रों की तरह नई शिक्षा नीति से मीडिया शिक्षण भी दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़ेगा। नई शिक्षा नीति में ऐसे विभिन्न प्रावधान हैं जो जनसंचार एवं मीडिया शिक्षा से संबंधित हैं। भविष्य में जनसंचार शिक्षा पत्रकारिता या उच्च शिक्षा तक ही सीमित नहीं रहेगी बल्कि यह स्कूल शिक्षा का हिस्सा बनेगी। इसके स्कूली पाठ्यक्रमों के हिस्सा बनने से स्कूल स्तर पर मीडिया अनुदेशकों एवं तकनीकी लोगों की जरूरत बढ़ेगी। जैसे-जैसे मीडिया शिक्षा का दायरा बढ़ेगा, इसे पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले भी बढ़ते जाएंगे। नई शिक्षा नीति में अध्ययन-शिक्षण में डिजिटल माध्यमों एवं आईटी की भूमिका को स्वीकार किया गया है। आधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे हम मीडिया-जनसंचार शिक्षा की पहुंच को दूरस्थ क्षेत्रों तक ले जा सकते हैं। शिक्षण कार्यों में डिजिटल या प्रौद्योगिकी की भूमिका को बढ़ावा मिलेगा।

प्रेरणा कुमारी : पत्रकारिता में आज कड़ी प्रतिस्पर्धा है और प्रौद्योगिकी में बेहद तेजी से बदलाव हो रहे हैं ऐसे में पत्रकारिता को पेशे के रूप में अपनाने के इच्छुक युवाओं का आप क्या मार्गदर्शन करेंगे?

अनिल सौमित्र : पत्रकारिता क्षेत्र को अभी तक हमने काफी सीमित रूप से समझा है। यदि हम पत्रकारिता या जनसंचार की बात करें तो यह काफी व्यापक क्षेत्र है। इस क्षेत्र में अनुवाद एवं प्रेलखन भी शामिल हैं। प्रलेखन में भी आगे श्रव्य, दृश्य या मुद्रित जैसे प्रलेखन के तीन क्षेत्र हैं। इस तरह प्रलेखन अपने आप में एक बड़ा क्षेत्र बन जाता है। इसके अलावा ट्रांसक्रिप्शन का क्षेत्र भी मीडिया में शामिल है। ऐसे में अगर समग्र रूप से देखें तो मीडिया जनसंचार शिक्षा का छोटा सा आयाम है। इसके अलावा जनसंपर्क का भी एक बड़ा क्षेत्र है। आज सारी संस्थाओं को जनसंपर्क अधिकारी और कॉर्पोरेट संचार अधिकारी जैसे पदों पर लोगों की जरूरत है। अनुवाद की बात करें तो विदेशी भाषाओं के साथ-साथ हमारे पास विभिन्न भारतीय भाषाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में अनुवाद क्षेत्र में विविध संभावनाएं हैं।

यह जरूरी है कि युवा अपनी मानसिकता में बदलाव लाएं। इससे जुड़े क्षेत्रों का लगातार विस्तार हो रहा है। इन क्षेत्रों को समझकर तदनुसार प्रशिक्षण देना मीडिया शिक्षण संस्थानों का काम है। 25 वर्ष पहले जनसंचार शिक्षा में भाषायी पत्रकारिता और अंग्रेजी पत्रकारिता दो ही प्रमुख विषय थे और दूरदर्शन, रेडियो और प्रिंट जैसे तीन मुख्य माध्यम थे। आज समय काफी बदल गया है। अब विज्ञापन, जनसंपर्क और न्यू मीडिया जनसंचार के विषय बन चुके है। अब मोबाइल पत्रकारिता का समय आ गया है। शिक्षार्थियों से यह भी अपेक्षित है कि वह पहले किसी पसंदीदा मुख्य विषय का अध्ययन करें, फिर जनसंचार का शिक्षण लें ताकि उनके पास विषयों से संबंधित विशेषज्ञता भी हो। कुल मिलाकर इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं।

Prerna Kumari

Journalist

Posted By: Navodit Saktawat

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