देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण की विकट स्थिति किसी से छिपी हुई नहीं है। स्विस वायु गुणवत्ता प्रौद्योगिकी कंपनी आईक्यूएयर की 2021 विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट बताती है कि देश की राजधानियों में से दिल्ली विश्व का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। वायु गुणवत्ता सूचकांक के आंकड़े भी इसके सूचक हैं कि दिल्ली के हवा में सांस लेना हानिकारक नहीं बल्कि जानलेवा है। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रदूषण रोकने के लिए सरकार को कड़े और प्रभावी कदम उठाने चाहिए, परंतु दिल्ली में बिल्कुल इसके उलट हो रहा है। प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई के मामले में भी प्रदूषण के वास्तविक कारणों का समाधान करने के बजाय मात्र हिंदू त्‍योहारों पर हमला किया जा रहा है। इसी कड़ी में दिल्ली सरकार ने दीवाली के आसपास पटाखे चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। सरकार के एक निर्णय से दीवाली मनाने का परंपरागत तरीका खत्म हो गया। पटाखे के कारोबार में लगे लोग करोड़ों का नुकसान झेलने के लिए विवश हो गए और पटाखे बनाने वाले उद्यमों पर ताले लटकने की नौबत आ गई लेकिन क्या इससे दिल्ली को साफ हवा मिल पाएगी।

अभी तक हमारे पास ऐसा एक भी सरकारी या गैर-सरकारी विश्वसनीय अध्ययन नहीं है जिसमें प्रदूषण में पटाखों की हिस्सेदारी स्पष्ट की गई हो। ज्यादातर अध्ययनों में पाया गया है कि वाहन, औद्योगिक गतिविधियां और धूल-मिट्टी दिल्ली के प्रदूषण के बड़े कारक हैं। पंजाब-हरियाणा में पराली फूंकने से भी प्रदूषण होता है लेकिन इसका प्रभाव एक-दो महीनों तक ही सीमित रहता है। प्रदूषण में पटाखों की हिस्सेदारी नगण्य है। ऐसे में प्रदूषण के वास्तविक कारणों को छोड़कर सिर्फ और सिर्फ दीवाली में पटाखों पर प्रतिबंध लगाना समझ से परे हैं। सरकार से इस कदम से ऐसा लगता है कि सरकार प्रदूषण के बजाय हिंदू आस्थाओं से लड़ना चाहती है।

पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी दिल्ली में सभी तरह के पटाखों के उत्पादन, भंडारण, बिक्री और उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। इस बार दिल्ली में पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर भी प्रतिबंध रहेगा। आइए अब इस प्रतिबंध के जमीनी पहलुओं पर विचार करें।

1. सबसे पहले सवाल इस प्रतिबंध के समय का है। बारिश के दिनों के अलावा दिल्ली पूरे वर्ष में कभी भी साफ हवा में सांस नहीं लेती है। अगर सरकारी विभागों ने यह निर्धारित कर लिया है कि पटाखे दिल्ली के प्रदूषण के मुख्य कारक हैं तो इस प्रतिबंध का शिकार हर बार दीवाली ही क्यों होती है। आखिर पूरे वर्ष के लिए ही पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगा दिया जाता। ऐसा तो नहीं है कि दीवाली पर प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे न्यू ईयर में ऑक्सीजन छोड़ने लगेंगे। अगर दीवाली पटाखों के बिना मनाई जा सकती हैं तो वर्ष के बाकी दिनों में भी पटाखों की क्या जरूरत है?

2. देश के पटाखा निर्माण केंद्र शिवकाशी में आतिशबाजी उद्योग से जुड़ी 1,000 संगठित इकाइयों में लगभग तीन लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध से इन तीन लाख लोगों के लिए रोजगार का संकट बन गया है। इस तरह सरकार धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंततः आजीविका; इन तीनों अधिकारों का हनन कर रही है। यह बात समझ से परे है कि सरकारें पटाखों के बारे में कोई सुस्पष्ट और सुसंगत नीति क्यों नहीं बना पाती। पटाखे यदि प्रकृति और पर्यावरण के लिए खतरा हैं तो इन सारी इकाइयों पर एक ही बार में प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता। आखिर यह सरकारों का कैसा नाटक है कि एक तरफ पटाखे निर्माताओं को पटाखे बनाने के लाइसेंस जारी किए जाते हैं और दूसरी तरह पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। यह पटाखा निर्माताओं और कारोबारियों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाए जाने का मामला है।

3. सरकारों ने कुछ वर्ष पहले हरित पटाखों को प्रोत्साहित करना शुरू किया है। ऐसा बताया गया कि अन्य पटाखों की तुलना में इनसे कम प्रदूषण फैलता है परंतु दिल्ली में हरित पटाखों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह फिर से व्यवसाय विरोधी नीति का नया उदाहरण है। पटाखा निर्माताओं और कारोबारियों को पहले नई प्रौद्योगिकी अपनाने पर विवश किया गया और फिर जब उन्होंने अपनी पूंजी खर्च करके हरित पटाखे बनाने के संयंत्र लगाए तो इन पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। आखिर इस विनियमन अराजकता के प्रति किसकी जिम्मेदारी है।

4. दिल्ली में प्रदूषण रोकने के लिए पूरे वर्ष सरकार की क्या कारगुजारी रही है। विभिन्न अध्ययनों से यह बात स्पष्ट हो गई है कि वाहनों का धुंआ, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण कार्य एवं घरेलू प्रदूषण दिल्ली में प्रदूषण के मुख्य कारणों में शामिल हैं। इन कारणों पर नियंत्रण करने के बजाय दिल्ली सरकार का सारा ध्यान मात्र दीवाली के पटाखों पर केंद्रित रहता है। आखिर दिल्ली सरकार बताएगी कि पिछले आठ वर्षों में दिल्ली में कितने नए पेड़ लगाए गए, वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए क्या किया गया और सार्वजनिक परिवहन बेहतर बनाने के लिए क्या किया गया। जब बसों में लोग मवेशियों की तरह ठूंसे जाएंगे तो उनके पास अपने निजी वाहन लेकर निकलने के बजाय आखिर क्या विकल्प बचेगा?

5. पंजाब-हरियाणा में जलाई जाने वाली पराली दिल्ली के प्रदूषण की मुख्य घटक है लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। पंजाब में आप सरकार के आने के बाद पराली जलाने की घटनाएं बल्कि बढ़ गई हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली अपनी रिपोर्ट में कह चुका है कि दिल्ली में प्रत्येक वर्ष होने वाली स्मॉग का कारण पटाखे नहीं हैं लेकिन जब सरकार की मंशा प्रदूषण के बजाय हिंदू त्यौहारों से लड़ने की हो तो क्या करें, हो सकता है अगले वर्ष केजरीवाल सरकार दीवाली में दीयों पर भी प्रतिबंध लगा दें।

Prerna Kumari

Journalist

Posted By: Navodit Saktawat

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